गाँधी का संदेश
हिंसा कैसे रूप हो, देती केवल घाव।
प्रेम-अहिंसा से मिले, टूटे मन को चाव॥
सत्य-अहिंसा के बिना, कैसा मानव धर्म।
इनसे ही निर्मल बने, जीवन के सब कर्म॥
बापू की उस सीख को, रखना सदा सँभाल।
सत्य रहे व्यवहार में, निर्मल हो हर चाल॥
ऊँच-नीच के भेद को, मन से दें हम त्याग।
समानता के भाव से, जग में भर अनुराग॥
गाँधी का संदेश है, मत रखना अभिमान।
सेवा को ही श्रेष्ठ चुन, यह सच्चा सम्मान॥
क्रोध बढ़े तो मौन धर, सोच समझकर बोल।
मीठे वचन मनुष्य के, दे समरसता घोल॥
भारत की धरती कहे, सत्य रहे आधार।
अहिंसा और प्रेम से, बढ़े देश का प्यार॥
बापू के आदर्श को, केवल पढ़ना व्यर्थ।
जीवन में उतरे तभी, उनका होगा अर्थ॥
— डॉ. सत्यवान सौरभ
