शाश्वत प्रेम
कृष्ण सा प्रेम पावन करूं मैं तुझे,
शाश्वत प्रेम ही मन का आधार है।
जिस्म का प्रेम पाना नहीं चाहता,
ना मुझे ऐसी भी कोई दरकार है।
ये हवस चंद लम्हों की मेहमान है,
बस जवानी जवानी की सरकार है।
मैं तुझे भूल जाऊं ये मुमकिन नहीं,
मेरी हर सांस पर तेरा अधिकार है।
याद करता हूं तुझको तो लगता है ये,
दूर मुझसे बहुत मेरा संसार है।
सोचता हूं कि मैं तुझपे कविता लिखूं,
तेरी कविता का रस यार श्रंगार है।
