गीत
इस ज़िंदगी के पट से जब सारे रंग रुख़सत हो गए,
तो मुक़द्दर ने हथेली पर चंद रंगीन गोलियाँ रख दीं।
उड़ गए सारे परिंदे ख़्वाब के, बस रेत सा मंज़र बचा,
खुशियों की रौशनी बुझ गई, दर्द का अंधेरा अंदर बचा,
कुछ नहीं है अब हथेली पर सजे इन चंद रंगों के सिवा,
जिंदगी के थपेड़े झेलने को ये संगीन गोलियाँ रख दीं।
एक कड़कड़ाती धूप सी, इक सुर्ख़ अंगारे की छाँव रही,
ज़हर में लिपटे हुए खंजर पर अब ज़िंदगी लगा दाँव रही,
आकर देखो साँस की डोरी बंधी है इन मशीनी रूहों से,
कुछ यादों ने, कुछ बीमारियों ने गमगीन गोलियाँ रख दीं।
मैं नादान तो समझा था कि रंगों से सँवरती है जिंदगी,
यह न जाना था दवाओं में क़ैद हो बिखरती है जिंदगी,
तीनों वक्त निगलता हूँ एक एक ख्वाब पानी के साथ,
शाम सी ढ़लती जिंदगी में रात सी हसीन गोलियाँ रख दीं।
देखो! आईनों में तलाश रहा “विकास” खुद का निशाँ,
रेजा रेजा हो गया है मेरी चंद ख्वाहिशों का वो आसमाँ,
खत्म होने की कगार पर खड़ा है साँसों का सिलसिला,
देकर झांसा मिठाई का चंद ज़हरगीन गोलियाँ रख दीं।
— डॉ. विकास शर्मा
