प्रश्न रहे तैयार
सच को कहने से सदा, डरता जो इंसान।
भीड़ भले सम्मान दे, खो देता पहचान।।
प्रश्न जहाँ मरने लगें, मौन जहाँ स्वीकार।
वहाँ समझ लो हो रहा, बुद्धिमता संहार।।
आँख मूँदकर मानना, भक्ति नहीं है ज्ञान।
तर्क-विवेक जहाँ नहीं, व्यर्थ वहाँ अभिमान।।
जो बात-बात हाँ करे, कैसा उसका ज्ञान।
सच्चा साथी है वही, रखे प्रश्न कर ध्यान।।
चापलूसी की छाँव में, सूख गया विवेक।
आज झूठ के सामने, फीका पड़ता नेक।।
सत्ता हो या साधु हो, प्रश्न रहे तैयार।
जहाँ सवालों की कमी, वहीं बढ़े अंधकार।।
भीड़ चलाए बुद्धि को, सोच हुई बेकार।
अपने मन से सोचिए, यही मनुज का सार।।
तर्क छोड़ जो व्यक्ति बस, करता जय-जयकार।
धीरे-धीरे खो देता, अपना ही अधिकार।।
सच कड़वा हो तो उसे, सुनने का रख धीर।
झूठ भले मीठा लगे, करता सदा अधीर।।
अंधभक्ति के फेर में, मत खो देना मान।
पूज रहे हो तुम जिसे, पूछो उसे प्रमाण।।
चमचे केवल स्वार्थ में, करते मीठी बात।
संकट में जो साथ दे, वह है सच्चा साथ।।
प्रश्न पूछना दोष कब, प्रश्नों से हो ज्ञान।
जो उत्तर से भागता, उसका कैसा मान।।
तर्क जहाँ मजबूत हो, सच रहता मजबूत।
झूठ स्वयं गिरता सदा, चाहे लाख हों दूत।।
नारे केवल भीड़ को, करते हैं तैयार।
सोच तर्क की बदलती, समाज का व्यवहार।।
अंधविश्वास की जड़ें, काटे ज्ञान-कुठार।
तर्क-विवेकी दीप से, मिटे घोर अंधियार।।
— डॉ. प्रियंका सौरभ
