सपा-कांग्रेस को वही मिल रहा है जिसके लिये वह डिजर्व करती है
भारतीय राजनीति में तुष्टिकरण और वोट बैंक की सियासत कोई नई बात नहीं है, लेकिन वर्तमान दौर में यह बहस एक नए चरम पर पहुंच चुकी है। हाल के दिनों में देश की राजनीति में जिस तरह के घटनाक्रम देखने को मिले हैं, उसने विपक्षी दलों, विशेषकर कांग्रेस की नीतियों और नीयत पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों और आम जनता के एक बड़े वर्ग का मानना है कि कांग्रेस आज उस चौराहे पर खड़ी है जहां वह वही काट रही है जो उसने बोया है। तुष्टिकरण की राजनीति में हद से आगे बढ़ जाने का आरोप झेल रही कांग्रेस पर यह लांछन लग रहा है कि वह बहुसंख्यक समाज की भावनाओं की अनदेखी करके और कुछ विशेष वर्गों को रिझाने के चक्कर में देश के स्वाभिमान तक से समझौता करने को तैयार दिखती है। राहुल गांधी के नेतृत्व में पार्टी की नीतियों को लेकर अक्सर यह आलोचना होती है कि राष्ट्रहित से जुड़े संवेदनशील मुद्दों पर भी उनका रुख देश की सामूहिक भावना के विपरीत नजर आता है।
इस पूरे विमर्श को हाल ही में हुई एक बेहद संवेदनशील अंतरराष्ट्रीय घटना ने और हवा दे दी है। दुबई से इजरायल जा रहे एक विमान को हाईजैक करके 09/11 जैसी भयानक त्रासदी को दोहराने की साजिश रची गई थी। इस विमान को एक हिंदुस्तानी पायलट स्मित मच्छार उड़ा रहे थे। कैप्टन स्मित मच्छार ने जिस अदम्य साहस, सूझबूझ और जांबाजी का परिचय दिया, उसने न केवल सैकड़ों बेगुनाह यात्रियों की जान बचाई, बल्कि दुनिया को एक और भीषण आतंकी हमले से भी महफूज रखा। अपनी जान पर खेलकर देश का नाम रोशन करने वाले इस जांबाज पायलट की तारीफ पूरी दुनिया में हुई और हर भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा हो गया। देश की जनता उम्मीद कर रही थी कि दलगत राजनीति से ऊपर उठकर हर राजनीतिक दल इस नायक की सराहना करेगा, लेकिन इस मोर्चे पर कांग्रेस आलाकमान की रहस्यमयी खामोशी ने हर किसी को हैरान और आक्रोशित कर दिया। जब पूरा देश कैप्टन स्मित मच्छार के शौर्य को सलाम कर रहा था, तब कांग्रेस की यह चुप्पी आम लोगों को खटकने लगी। ऐसा प्रतीत हुआ कि पार्टी को शायद इस बात का डर था कि एक भारतीय नायक की खुलकर तारीफ करने से उसका एक खास वोट बैंक नाराज न हो जाए।
इस मामले में सियासत तब और गरमा गई जब उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के बड़े नेता और पार्टी के रणनीतिकारों में शामिल इमरान मसूद का एक विवादास्पद बयान सामने आया। इमरान मसूद ने कैप्टन स्मित मच्छार की इस ऐतिहासिक जांबाजी और बहादुरी को भारतीय जनता पार्टी द्वारा प्रायोजित एक “इवेंट” करार दे दिया। देश की सुरक्षा और एक सैनिक या पायलट के शौर्य को राजनीतिक इवेंट बताना न केवल उस बहादुर कप्तान का अपमान है, बल्कि देश की सुरक्षा एजेंसियों और राष्ट्र की अस्मिता पर भी चोट है। इमरान मसूद का यह बयान कांग्रेस की उस मानसिकता को उजागर करता है जिसमें देश के गौरव को भी शुद्ध रूप से चुनावी नफा-नुकसान के चश्मे से देखा जाता है। यूपी विधानसभा चुनाव के मुहाने पर खड़े इस समय में कांग्रेस अपनी इस कथित तुष्टिकरण की नीति का प्रयोग कर राजनीतिक जमीन तलाशने की कोशिश कर रही है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि जनता अब इन चालों को समझने लगी है।
कांग्रेस की इस अति-सक्रिय तुष्टिकरण की राजनीति ने न केवल भाजपा को हमलावर होने का मौका दिया है, बल्कि खुद को मुसलमानों का सबसे बड़ा हमदर्द बताने वाले समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव के माथे पर भी चिंता की लकीरें खींच दी हैं। दरअसल, उत्तर प्रदेश की राजनीति का इतिहास गवाह है कि जो मुस्लिम मतदाता आज समाजवादी पार्टी का सबसे मजबूत वोट बैंक माना जाता है, वह कभी पारंपरिक रूप से कांग्रेस का वफादार कोर वोटर हुआ करता था। बाबरी मस्जिद विध्वंस और उसके बाद के घटनाक्रमों के बाद यह वोटर कांग्रेस से छिटककर सपा और बसपा की तरफ मुड़ गया था। अब जब कांग्रेस प्रियंका गांधी और राहुल गांधी के नेतृत्व में दोबारा उसी पुराने वोट बैंक को हासिल करने के लिए हर हद पार करने को आमादा दिख रही है, तो अखिलेश यादव को अपनी राजनीतिक जमीन खिसकने का डर सता रहा है। यही वजह है कि सपा प्रमुख को भी कांग्रेस की यह आक्रामक मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति रास नहीं आ रही है, क्योंकि वे जानते हैं कि अगर मुस्लिम मतों का बिखराव हुआ तो इसका सीधा फायदा भाजपा को ही मिलेगा।
अगर अतीत के पन्नों को पलटकर देखें तो कांग्रेस और समाजवादी पार्टी दोनों का इतिहास ऐसी घटनाओं से भरा पड़ा है जहां हिंदुओं पर होने वाले अत्याचारों और हमलों पर इन दलों ने पूरी तरह चुप्पी साधे रखी, जबकि दूसरे पक्ष से जुड़े छोटे से छोटे मुद्दे को भी एक बड़ा बतंगड़ बना दिया। 1990 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव का अयोध्या में कारसेवकों पर गोली चलाने से लेकर 2013 के मुजफ्फरनगर दंगे इस दोहरे मापदंड की सबसे बड़ी और खौफनाक मिसाल हैं। जब मुजफ्फरनगर में दंगे हुए उस समय राज्य में समाजवादी पार्टी की सरकार थी और अखिलेश यादव मुख्यमंत्री थे। मुजफ्फरनगर में एक लड़की से छेड़खानी के विरोध में शुरू हुआ विवाद देखते ही देखते भयानक सांप्रदायिक दंगों में बदल गया। इस दंगे में बहुसंख्यक समाज के लोगों को निशाना बनाया गया, हजारों लोगों को अपने घरों से पलायन करना पड़ा और बड़े पैमाने पर जान-माल का नुकसान हुआ। आरोप लगते हैं कि तत्कालीन सपा सरकार ने प्रशासनिक मशीनरी के हाथ बांध दिए थे ताकि एक विशेष वर्ग के उपद्रवियों पर सख्त कार्रवाई न हो। पीड़ित हिंदुओं की चीखें लखनऊ और दिल्ली के गलियारों में बैठे हुक्मरानों तक नहीं पहुंचीं। कांग्रेस, जो उस समय केंद्र की सत्ता में थी, उसने भी इस त्रासदी पर केवल राजनीतिक रोटियां सेकने का काम किया और दंगों के असली कारणों पर पर्दा डालते हुए बहुसंख्यक समाज को ही कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की।
यह चुप्पी सिर्फ मुजफ्फरनगर तक सीमित नहीं रही है। कश्मीर में 90 के दशक में कश्मीरी पंडितों के साथ हुए अमानवीय नरसंहार, उनकी जमीनों पर कब्जे और उन्हें अपने ही देश में शरणार्थी बना देने की ऐतिहासिक त्रासदी पर कांग्रेस ने दशकों तक चुप्पी साधे रखी। संसद से लेकर सड़क तक कभी भी कश्मीरी हिंदुओं के हक में वैसी आवाज नहीं उठाई गई जैसी किसी अन्य अल्पसंख्यक समुदाय के छोटे से विवाद पर उठाई जाती है। इसके विपरीत, जब भी किसी दूसरे पक्ष से जुड़ा कोई मामला सामने आता है, तो इन दलों का रवैया पूरी तरह बदल जाता है। बाटला हाउस एनकाउंटर जैसी संवेदनशील घटना इसका एक और बड़ा उदाहरण है। जब दिल्ली पुलिस के जांबाज अधिकारी मोहन चंद शर्मा आतंकियों से लड़ते हुए शहीद हो गए, तब कांग्रेस के शीर्ष नेताओं ने आतंकियों के मारे जाने पर आंसू बहाए और इस मुठभेड़ को फर्जी बताने की कोशिश की ताकि एक विशेष समुदाय में उनकी पकड़ मजबूत बनी रहे। देश की सुरक्षा से जुड़े एक सफल ऑपरेशन को भी वोट बैंक की वेदी पर चढ़ा दिया गया।
इसी तरह छोटी-छोटी आपराधिक घटनाओं को भी अक्सर सांप्रदायिक रंग देकर देश और दुनिया में यह नैरेटिव बनाने की कोशिश की जाती है कि भारत में एक खास वर्ग असुरक्षित है। दादरी की घटना हो या फिर लिंचिंग के कुछ अन्य चुनिंदा मामले, कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने हमेशा इन पर राजनीतिक बवाल खड़ा किया, लेकिन जब बंगाल में चुनाव के बाद हिंदुओं पर हिंसक हमले होते हैं या फिर केरल और कर्नाटक में बहुसंख्यक समाज के कार्यकर्ताओं की चुन-चुनकर हत्या की जाती है, तो इन सेकुलर दलों के नेताओं के मुंह पर ताला लग जाता है। तुष्टिकरण की इस सियासत का ही परिणाम है कि आज देश की जनता राजनीतिक दलों के इस दोहरे चरित्र को पूरी तरह भांप चुकी है। कैप्टन स्मित मच्छार की जांबाजी पर कांग्रेस की खामोशी और इमरान मसूद का आपत्तिजनक बयान यह साबित करने के लिए काफी है कि सत्ता की ललक में यह दल देश के गौरव को भी छोटा दिखाने से बाज नहीं आ रहे हैं, जिसका खामियाजा उन्हें चुनावों में भुगतना पड़ रहा है। ऐसे में यही लगता है कि सपा और कांग्रेस को वही मिल रहा है जिसके लिये वह डिजर्व करती है।
— संजय सक्सेना
