एक ही खेत से दोहरी पैदावार: कृषि और सौर ऊर्जा का संगम
कृषि ग्रामीण भारत की रीढ़ है, जबकि सौर ऊर्जा स्वच्छ बिजली के एक महत्वपूर्ण स्रोत के रूप में उभर रही है। परंपरागत रूप से खेती और सौर ऊर्जा उत्पादन के बीच भूमि के उपयोग को लेकर प्रतिस्पर्धा रही है। सौर ऊर्जा संयंत्रों के लिए बड़े भू-भाग की आवश्यकता होती है, जिनका उपयोग अन्यथा फसलें उगाने के लिए किया जा सकता है। लेकिन अब एग्रीवोल्टिक्स (Agrivoltaics) नामक एक अभिनव तकनीक कृषि और सौर ऊर्जा को एक ही भूमि पर एक साथ विकसित करने का अवसर प्रदान करती है। इस प्रणाली में ऊँचाई पर लगाए गए सौर पैनलों के नीचे या उनके बीच फसलें उगाई जाती हैं और साथ ही बिजली भी पैदा की जाती है।
इस अवधारणा से एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है: क्या भारतीय किसान कृषि उत्पादन को नुकसान पहुँचाए बिना एक ही खेत से अनाज और सौर ऊर्जा, दोनों प्राप्त कर सकते हैं?
### एग्रीवोल्टिक्स क्या है?
एग्रीवोल्टिक्स वह प्रणाली है, जिसमें एक ही भूमि पर कृषि उत्पादन और सौर फोटोवोल्टिक तकनीक का एक साथ उपयोग किया जाता है। सौर पैनलों को उचित ऊँचाई और दूरी पर स्थापित किया जाता है, ताकि उनके नीचे या बीच में खेती की जा सके। इस प्रणाली के अंतर्गत सब्जियाँ, पशुओं के लिए हरा चारा, औषधीय पौधे और आंशिक छाया में उगने वाली कुछ फसलें पैदा की जा सकती हैं।
पारंपरिक सौर ऊर्जा पार्कों में कृषि गतिविधियाँ कम हो सकती हैं, लेकिन एग्रीवोल्टिक्स का उद्देश्य खेती और ऊर्जा उत्पादन को साथ-साथ जारी रखना है। भारत जैसे देश में, जहाँ कृषि खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण आजीविका के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, यह तकनीक विशेष रूप से उपयोगी साबित हो सकती है।
### भारतीय किसानों के लिए संभावित लाभ
इस प्रणाली का सबसे बड़ा लाभ किसानों की आय के दो स्रोत विकसित करना है। किसान कृषि उपज बेचकर और सौर बिजली से भी आमदनी प्राप्त कर सकते हैं। स्वामित्व और समझौते की शर्तों के अनुसार बिजली को विद्युत ग्रिड में बेचा जा सकता है अथवा सिंचाई पंपों और अन्य कृषि कार्यों के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।
सौर पैनल आंशिक छाया भी प्रदान करते हैं। गर्म और शुष्क क्षेत्रों में यह छाया कुछ फसलों को अत्यधिक गर्मी से बचाने तथा मिट्टी की नमी बनाए रखने में मदद कर सकती है। हालाँकि, इसका लाभ फसल की किस्म, स्थानीय जलवायु, पैनलों की ऊँचाई, उनके बीच की दूरी और पौधों तक पहुँचने वाली धूप पर निर्भर करता है।
एग्रीवोल्टिक्स पानी के अधिक कुशल उपयोग में भी सहायक हो सकता है। कुछ परिस्थितियों में मिट्टी से पानी का वाष्पीकरण कम होने के कारण नमी अधिक समय तक बनी रह सकती है। हालाँकि, पैनलों के कारण वर्षा का पानी कुछ स्थानों पर अधिक और कुछ स्थानों पर कम गिर सकता है। इसलिए जल निकासी और पानी के वितरण का उचित प्रबंधन आवश्यक है।
### क्या फसलों की पैदावार प्रभावित होगी?
इस तकनीक की सबसे बड़ी चुनौती बिजली उत्पादन और कृषि उत्पादकता के बीच संतुलन बनाए रखना है। पौधों को प्रकाश संश्लेषण, विकास और अनाज बनने के लिए पर्याप्त सूर्यप्रकाश की आवश्यकता होती है। अत्यधिक छाया के कारण विशेष रूप से अधिक धूप चाहने वाली फसलों की पैदावार घट सकती है।
इसलिए सभी खेतों और फसलों के लिए एक ही प्रकार की व्यवस्था उपयुक्त नहीं होगी। फसलों का चयन अत्यंत महत्वपूर्ण है। पत्तेदार सब्जियाँ, कुछ चारा फसलें और छाया सहन करने वाले पौधे उचित परिस्थितियों में अच्छी तरह विकसित हो सकते हैं। इसके विपरीत, गेहूँ, धान और अन्य अधिक धूप चाहने वाली फसलों के लिए विशेष सावधानी आवश्यक है।
पंजाब में गेहूँ और धान प्रमुख फसलें हैं। इसलिए यहाँ बड़े पैमाने पर इस तकनीक को अपनाने से पहले स्थानीय परिस्थितियों में वैज्ञानिक परीक्षण किए जाने चाहिए। शोधकर्ताओं को कई फसल मौसमों के दौरान पैदावार, अनाज की गुणवत्ता, पानी की खपत, बिजली उत्पादन और किसानों के लाभ का मूल्यांकन करना चाहिए।
### चुनौतियाँ और व्यावहारिक समाधान
ऊँचे सौर पैनल लगाने के लिए प्रारंभिक निवेश काफी अधिक हो सकता है। किसानों को पैनलों के नीचे ट्रैक्टर, कंबाइन हार्वेस्टर और अन्य कृषि मशीनें चलाने में भी कठिनाइयाँ हो सकती हैं। इसलिए पैनलों की ऊँचाई और व्यवस्था तय करते समय कृषि उपकरणों, फसलों की ऊँचाई, जल निकासी और नियमित कृषि गतिविधियों का ध्यान रखना चाहिए।
सरकारी सहायता, सस्ती वित्तीय सुविधाएँ, सहकारी स्वामित्व और नवीकरणीय ऊर्जा कंपनियों के साथ साझेदारी इस तकनीक को अधिक किसानों तक पहुँचाने में मदद कर सकती है। कृषि विश्वविद्यालयों और अनुसंधान संस्थानों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप मॉडल विकसित करके प्रायोगिक परियोजनाएँ शुरू करनी चाहिए।
किसानों को बिजली की कीमत, रखरखाव के खर्च, भूमि के स्वामित्व और उपकरणों की मरम्मत संबंधी जिम्मेदारियों के बारे में स्पष्ट समझौते भी मिलने चाहिए। छोटे किसानों को पूँजी की कमी के कारण इस तकनीक के लाभों से वंचित नहीं रहना चाहिए।
### टिकाऊ भविष्य की ओर
एग्रीवोल्टिक्स भारत की कृषि परंपरा को स्वच्छ ऊर्जा के लक्ष्यों से जोड़ने का एक नया अवसर प्रदान करता है। यह किसानों की आय के स्रोत बढ़ाने, भूमि का अधिक कुशल उपयोग करने और कम कार्बन उत्सर्जन वाली बिजली पैदा करने में योगदान दे सकता है। हालाँकि, इसकी सफलता वैज्ञानिक योजना और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार तकनीक अपनाने पर निर्भर करेगी।
आगे बढ़ने के लिए पहले चुनिंदा क्षेत्रों में प्रायोगिक परियोजनाएँ शुरू की जानी चाहिए। पारंपरिक खेती और एग्रीवोल्टिक्स के अंतर्गत होने वाली पैदावार की तुलना की जानी चाहिए तथा आर्थिक और पर्यावरणीय लाभ प्रमाणित होने पर ही इसका विस्तार किया जाना चाहिए।
खेती का भविष्य शायद भोजन और बिजली में से किसी एक को चुनने पर निर्भर न हो। उचित तकनीक, उपयुक्त फसलों और किसान-केंद्रित नीतियों के माध्यम से एक ही खेत से दोहरी पैदावार प्राप्त की जा सकती है। इससे ग्रामीण आजीविका मजबूत होगी और भारत को स्वच्छ तथा टिकाऊ ऊर्जा के भविष्य की ओर बढ़ने में मदद मिलेगी।
— डॉ. विजय गर्ग
