राजनीति

सहकारिता और ग्रामीण विकास

हमारा भारत एक कृषि प्रधान देश है और इसकी लगभग 65 प्रतिशत आबादी आज भी गांवों में निवास करती है। गांवों की समृद्धि के बिना देश की समृद्धि की कल्पना कदापि नहीं की जा सकती। ग्रामीण जीवन में पहले भी चुनौतियाँ थीं और आज भी हैं। गरीबी, बेरोजगारी, छोटे किसानों की समस्या, बाजार की कमी, कर्ज का बोझ, शिक्षा का अभाव आदि। इन सभी समस्याओं का एक सशक्त समाधान है – सहकारिता। सहकारिता का सही अर्थ है ‘साथ मिलकर काम करना’। जब गांव के लोग अपने समान हितों के लिए एकजुट होकर, आपसी सहयोग से कोई संगठन बनाते हैं तो उसे सहकारी समिति कहते हैं। सहकारिता का मूल मंत्र ही है – ‘एक सबके लिए और सब एक के लिए’।

भारत में सहकारिता आंदोलन की शुरुआत वर्ष 1904 ई. में सहकारी साख समिति अधिनियम से हुई थी। इसका उद्देश्य साहूकारों के शोषण से किसानों को बचाना था। आजादी के बाद पं. जवाहरलाल नेहरू ने सहकारिता को ग्रामीण विकास का मुख्य आधार बनाया। वर्ष 1958 ई. में राष्ट्रीय विकास परिषद ने प्रस्ताव रखा कि हर गांव में सहकारी समिति होनी चाहिए। सबसे बड़ा उदाहरण है – गुजरात का अमूल। वर्ष 1946 ई. में कुछ किसानों ने मिलकर एक छोटी दुग्ध सहकारी समिति बनाई, आज वह दुनिया की सबसे बड़ी डेयरी सहकारी संस्था है। आपको बता दें कि इसी मॉडल ने भारत में श्वेत क्रांति ला दी।

ग्रामीण क्षेत्रों में सहकारिता के प्रमुख प्रकार –

  1. कृषि साख सहकारी समितियां – इनका कार्य गांव के किसानों को कम ब्याज पर बीज, खाद, खेती के लिए ऋण उपलब्ध कराना होता है।
  2. दुग्ध सहकारी समितियां – गांव के पशुपालकों से दूध इकट्ठा करके शहरों में बेचना। इससे बिचौलिया खत्म होते हैं और किसानों को पूरा दाम मिलता है।
  3. विपणन सहकारी समितियां – किसानों की फसल को सही दाम पर बाजार तक पहुँचाती हैं। जैसे इफको।
  4. बुनकर और शिल्प सहकारी समितियां – गांवों के बुनकरों, कुम्हारों, बढ़ई व अन्य हाथ के कलाकारों के सामान को बाजार उपलब्ध कराना आदि।
  5. आवास और उपभोक्ता सहकारी समितियां – सस्ते दामों पर रोजमर्रा की चीजें उपलब्ध कराती हैं।

सहकारिता से ग्रामीण विकास व लाभ –

  1. साहूकारों से मुक्ति । 2. रोजगार सृजन । 3. महिला सशक्तिकरण । 4. एकता और सामाजिक समरसता । 5. तकनीक और ज्ञान का प्रसार आदि।

हालांकि वर्तमान में सहकारिता के लिए चुनौतियां भी बहुत हैं। समितियों में राजनीति घुसकर सहकारिता के विकास में बाधा बन जाती है। भ्रष्टाचार, प्रबंधन की कमी, जागरूकता का अभाव, बेईमानी की नीयति, आलस्य आदि सहकारी समितियों के लिए खतरा है।

सहकारिता केवल एक आर्थिक व्यवस्था नहीं है, बल्कि एक जीवन दर्शन है। यह ग्रामीण भारत को आत्मनिर्भर बनाने का सबसे सस्ता और टिकाऊ मॉडल है। जब तक गांव का किसान, मजदूर व महिला हाथ नहीं मिलाएंगे तब तक भारत आत्मनिर्भर नहीं बन सकता। आत्मनिर्भर भारत का सपना अधूरा ही रहेगा। अतः स्कूलों में सहकारिता की शिक्षा दी जाये, सहकारिता को राजनीति से दूर रखा जाये।

सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने एक नारा दिया है – ‘सहकार से समृद्धि’। इसके साथ ही उन्होंने नवीन योजनाओं को भी प्रारम्भ किया है।
जैसे – दुनिया की सबसे बड़ी अनाज भंडारण योजना। अब सहकारी उत्पादों को विदेश में बेच सकते हैं। डिजिटल प्रक्रिया में तकनीकी सुधारों पर बड़ा कार्य किया गया है।

युवाओं व महिलाओं के लिए 1. युवा सहकार योजना, 2. स्वयं शक्ति सहकार योजना। महत्वपूर्ण योजनाएं हैं।

कुल मिलाकर अंत में कहा जा सकता है कि सहकारिता ही वह विकास का पुल है जो गांवों को शहरों से और गरीब को अमीर से, परंपरा को आधुनिक तकनीक से जोड़ सकता है और जोड़ भी रहा है।

— मुकेश कुमार ऋषि वर्मा

मुकेश कुमार ऋषि वर्मा

नाम - मुकेश कुमार ऋषि वर्मा एम.ए., आई.डी.जी. बाॅम्बे सहित अन्य 5 प्रमाणपत्रीय कोर्स पत्रकारिता- आर्यावर्त केसरी, एकलव्य मानव संदेश सदस्य- मीडिया फोरम आॅफ इंडिया सहित 4 अन्य सामाजिक संगठनों में सदस्य अभिनय- कई क्षेत्रीय फिल्मों व अलबमों में प्रकाशन- दो लघु काव्य पुस्तिकायें व देशभर में हजारों रचनायें प्रकाशित मुख्य आजीविका- कृषि, मजदूरी, कम्यूनिकेशन शाॅप पता- गाँव रिहावली, फतेहाबाद, आगरा-283111

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