बाल कविता

मुन्नी चलती डगमग डगमग

मुन्नी चलती डगमग-डगमग

नन्हे-नन्हे क़दम बढ़ाकर
मुन्नी चलती डगमग-डगमग।
हंसती है तो घर, खुशियों से
करने लगता जगमग जगमग।

मम्मी की आवाज़ सुने तो
झटपट उनकी ओर लपकती
पापा से बातें करती तो
कम से कम सौ बार अटकती।

भैया जब टॉफ़ी दिखलाता
तो खुश होकर चहक पड़े वह
गुस्सा होने पर, टपकाने
लगती आंसू बड़े-बड़े वह।

रोना-हंसना, शोर मचाना
नखरे करना उसका काम
दिनभर गिरती-उठती रहती
थकने का ना लेती नाम।

मम्मी-पापा, भैया सबकी
घर में बड़ी दुलारी मुन्नी
अगर रूठती,गाल फुलाती
लगे बहुत ही प्यारी मुन्नी।
– शादाब आलम

3 thoughts on “मुन्नी चलती डगमग डगमग

  • स्वर्णा साहा

    सुन्दर कविता शादाब जी.

  • विजय कुमार सिंघल

    वाह वाह ! बहुत खूबसूरत कविता, आलम जी. इसी प्रकार लिखते रहिये.

  • गुरमेल सिंह भमरा लंदन

    बहुत सुन्दर कविता , इस ननी सी उम्र में कितनी सुन्दर लगती हैं यह परीआं .

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