गीतिका/ग़ज़ल अजय अज्ञात 08/04/2018 ग़ज़ल राहों में कभी खार बिछाती है ज़िंदगी फूलों के कभी हार सजाती है ज़िंदगी मुर्गे कफस को उड़ना सिखाती है Read More
गीतिका/ग़ज़ल अजय अज्ञात 11/06/2017 ग़ज़ल आज इस वातावरण के हम हैं ज़िम्मेदार ख़ुद इस क्षरित पर्यावरण के हम हैं ज़िम्मेदार ख़ुद दौड़ते रहते हैं हरदम Read More
गीतिका/ग़ज़ल अजय अज्ञात 25/04/201725/04/2017 ग़ज़ल मेरे कदमों में अगर आवारगी होती नहीं मंज़िले मक़सूद भी हासिल कभी होती नहीं जिस्मे मखमल को कभी मैंने छुआ Read More
गीतिका/ग़ज़ल अजय अज्ञात 24/04/2017 ग़ज़ल बेसबब मुस्कुरा रहा है कोई देखो ग़म को चिढ़ा रहा है कोई अपनी मर्ज़ी से आ रहा है ना अपनी Read More