कब बरसोगे ?
डबडबी आँखों से… कृषक निहारे कर दे मेघा तू … अब तो बौछारें कब बरसोगे ? सूखी हैं फसलें… सूखे
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Read Moreभ्रष्टाचार के विरोध में नेता जी का अनशन जारी था और भ्र्ष्टाचार से त्रस्त जनता तन-मन-धन से उनके साथ खड़ी
Read Moreचंचल रोमांच से भरपूर इठलाती हिलौरे मारतीं, अनवरत… नदी और नारी जब भी बड़ीं… रोकीं गईं । कभी … बाँध
Read Moreदशानन की तरह.. ओढ़ अनेकानन खुद का अस्तित्व छुपा जाते हो तुम क्या जतलाना चाहते हो ? दिल में छुपा
Read Moreमर्यादा की बेड़ियाँ… तोड़ती सड़ी-गली परम्पराएँ… पीछे छोड़ती । सदियों से बिछे हुए… जाल हटाती तोड़ चक्रव्यू… नये ख्वाब सजाती।
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