कविता- दग्ध हृदय
तन ने जितनी सही यातना और यन्त्रणा मन पाया। दोनों ने दिल को मथ -मथकर, क्रोध अग्नि को उपजाया।। हृदय
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Read Moreसूर्य की प्रथम रश्मि शैशव काल में लुढ़कते कदमों से चल पड़ती है बिना गन्तव्य सोचे कभी तेज कभी मंद
Read Moreसदियों से मकड़जाल में फँसाये रखने की हुनर रखते थे। अमरबेल की तरह सहारे को ही चूसकर निष्पाण करने का
Read Moreपरिवर्तन का जोश भरा था, कुर्बानी के तेवर में। उसने केवल कीमत देखी, मंगलसूत्री जेवर में।। हम खुशनसीब हैं कि
Read Moreहे अमानुषों! बनकर आँधी बार – बार झपटे हो…… मैं दीपक हूँ नहीं बुझा था नहीं बुझूँगा चाहे जितना जोर
Read Moreकल तक माता के आँचल में, बैठ सभी सुख पाते थे । भूखे नंगे लावारिस भी, जीवन जीने आते थे
Read Moreचमन के फूल हम सारे, हमारा देश न्यारा है | हमारी भूमि में शामिल, परम इतिहास प्यारा है || हिमालय
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