ग़ज़ल
ज़िंदगी कतरा-कतरा पिघलती रही शाम ढलनी ही थी शाम ढलती रही कुछ ना कहा मैंने लब सिल लिये आँखों के
Read Moreप्राण पंछी है विकल, असह्य मेरी वेदना मौन मुखरित है प्रिये, अकथ्य मेरी वेदना नीर नैनों में भरे मैं,समुद्र तट
Read Moreकाश तुम हो सकते, मेरे……….. ज़रा से, नहीं पूरे तो भी गम नहीं, बस………. ज़रा से, यूँ ही चलता रहता,
Read Moreइस मार्मिक चित्र पर कुछ पंक्तियाँ कहने का प्रयास किया है:- सजल नयनों से वृषभ कहें, स्वामी तुम क्यों मुख
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