ग़ज़ल
राजनीति साज़िशों की कब समझ में आएगीचालबाज़ी शोरिशों की कब समझ में आएगी किस लिये टकराव है ये आज इन्सानों
Read Moreखिड़की की सलाखों से देखा, ज़मीन पर मैले-कुचैले चिथड़ों में लिपटा वह पिंजर, निहायत ही कमज़ोर शरीर कमज़ोर, आँखें धँसी
Read Moreजीवन की पगडंडियों पर उम्र बिताते ‘क्या खोया क्या पाया’ जब एक प्रश्न चिह्न बनकर सामने आता है तो लेखा-जोखा
Read Moreपरदेसी है वो कोई भटकता है शहर में गांवों को याद करके सिसकता है शहर में मिलना बिछड़ना यह तो
Read Moreमुझे भा गई, मेरे साक़ी ग़ज़ल कि है सोमरस की पियाली ग़ज़ल पिरोकर वो शब्दों में अनुभूतियाँ मेरी सोच को
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