सरोजों का उभरना भी !
सरोजों का उभरना भी, सूर्य के ओज से होता; सरोवर का हृदय मंथन, उसे उद्गार से भरता ! समाधित जल
Read Moreसरोजों का उभरना भी, सूर्य के ओज से होता; सरोवर का हृदय मंथन, उसे उद्गार से भरता ! समाधित जल
Read Moreरहा गन्तव्य सबका एक, प्रश्न करते अनेकानेक; बहे बूँदों सरिस धारा, रहे फिर भी मनोहारा ! समय की धार सब
Read Moreतरोताज़ा सुघड़ साजा, सफ़र नित ज़िन्दगी होगा; जगत ना कभी गत होगा, बदलता रूप बस होगा ! जीव नव
Read Moreलय प्रलय से बहुधा परे, वे विलय करते विचरते; हर हदों को वे नाख़ते, हर हृदय डेरा डालते ! हर
Read Moreमन ज्ञात है अज्ञात को, अज्ञात ना कुछ ज्ञात को; चलता है पर अज्ञात सा, रचता जगत अनजान सा !
Read Moreअज्ञान में जग भासता, अणु -ध्यान से भव भागता; हर घड़ी जाता बदलता, हर कड़ी लगता निखरता ! निर्भर सभी
Read Moreसुर सुहाने उर रूहाने, आनन्द धारा ले चले; अज्ञात को कर ज्ञात मग, कितनी विधाएँ दे चले ! विधि जो
Read Moreसुलगा हुआ जग लग रहा, ना जल रहा ना बुझ रहा; चेतन अचेतन सिल-सिला, पैदा किया यह जल-जला । तारन
Read Moreछलका रहा होगा झलक, प्रति जीव के आत्मा फलक; वह मूल से दे कर पुलक, भरता हरेक प्राणी कुहक ।
Read Moreहर एक पल कल-कल किए, भूमा प्रवाहित हो रहा; सुर छन्द में वह खो रहा, आनन्द अनुपम दे रहा ।
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