गीत “सिमटकर जी रही दुनिया”
नज़ारों में भरा ग़म है, बहारों में नहीं दम है, फिजाएँ भी बहुत नम हैं, सितारों में भरा तम है
Read Moreनज़ारों में भरा ग़म है, बहारों में नहीं दम है, फिजाएँ भी बहुत नम हैं, सितारों में भरा तम है
Read Moreसावन सूखा बीत न जाये। नभ की गागर रीत न जाये।। कृषक-श्रमिक भी थे चिन्ताकुल। धान बिना बारिश थे व्याकुल।।
Read Moreगीत सुनाती माटी अपने, गौरव और गुमान की। दशा सुधारो अब तो लोगों, अपने हिन्दुस्तान की।। खेतों में उगता है
Read Moreकहीं कुहरा, कहीं सूरज, कहीं आकाश में बादल घने हैं। दुःख और सुख भोगने को, जीव के तन-मन बने हैं।।
Read Moreरूप कितने-रंग कितने। बादलों के ढंग कितने।। कहीं चाँदी सी चमक है, कहीं पर श्यामल बने हैं। कहीं पर छितराये
Read Moreदेवालय का सजग सन्तरी, हर-पल राग सुनाता है। प्राणवायु को देने वाला ही, पीपल कहलाता है।। इसकी शीतल छाया में,
Read Moreलड़की लड़का सी दिखें, लड़के रखते केश। पौरुष पुरुषों में नहीं, दूषित है परिवेश।। — देख जमाने की दशा, मन
Read Moreजिन्दगी आगे बढ़ेगी कब तलक काठ की हाँडी चढ़ेगी कब तलक लहर आयेगी बहा ले जायेगी सब रेत में मूरत
Read Moreसूरज की भीषण गर्मी से, लोगो को राहत दे जाता।। लू के गरम थपेड़े खाकर, अमलतास खिलता-मुस्काता।। डाली-डाली पर हैं
Read Moreसमय के साथ हम भी कुछ, बदल जाते तो अच्छा था। नदी के घाट पर हम भी, फिसल जाते तो
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