अनुबंध
मेरे नीरस जीवन का प्रणय हो तुम रस छंदों में लिपटा हुआ अंतर्द्वंद हो तुम विभक्ति हूँ मैं तुम्हारी अर्धचंद्र
Read Moreजब हमारी संस्कृति ही हमारी पहचान है फिर क्यों नववर्ष के कैलेंडर को परेशान हैं माना कि ये सब अंग्रेजों
Read Moreप्रेम से न किसी का वास्ता पैसा ही सबसे बड़ा रिश्ता हार जाता है सच्चा रिश्ता अहम जिंदगी का फरिश्ता
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