कोैन ईश्वर है कोैन नहीं

पूज्य शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती जी के बयान में कितनी सच्चाई है इसके विवाद में न पड़ते हुये इतिहास के पन्नों पर यदि दृष्टि डाली जाये तो पता चलता है कि सच्चाई कुछ और ही है। श्रीमद्भगवत गीता को ही लें तो भगवान श्रीकृष्ण सातवें अध्याय के सोलहवें श्लोक में कहते है- ‘‘चतुुर्विद्या भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन। आर्तो जिज्ञासुरर्थाथी ज्ञानी च भरतर्षभ।।
अर्थात-हे अर्जुन उत्तम कर्म करने वाले अर्थाथी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी ऐसे चार प्रकार के भक्तजन मुझको भजते हैं। तथा
‘‘तेषां ज्ञानी नित्युक्त एक भक्तिर्विशिष्यते। प्र्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः।।’’
हे अर्जुन उपरोक्त चारों में से नित्य मुझमें एकीभाव से स्थित अनन्य प्रेम भक्ति वाला ज्ञानी भक्त अति उत्तम है क्योंकि मुझको तत्व से जानने वाले ज्ञानी को मैै अत्यन्त प्रिय हॅूं और वह ज्ञानी भी मुझे अत्यन्त प्रिय है। और फिर कहते हैं कि-
‘‘उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्। आस्थितः स हि युक्तात्मा मामे वानुत्तमां गतिम्।।’’
वे सभी उदार हैं परन्तु ज्ञानी तो साक्षात मेरा स्वरूप ही है ऐसा मेरा मत है क्योकि वह मद्गत मन बुद्धि वाला ज्ञानी भक्त अति उत्तम गति स्वरूप मुझमें ही अच्छी प्रकार स्थित है।
पूज्य तुलसीदास जी ने भी रामचरिचत मानस में कहा है कि- ‘‘जे जानहि ते देइ जनाई, जानहि तुमहि तुमहि होइ जाई।’’ भक्त प्रहलाद के विश्वास को कि- कण-कण मे भगवान है को मर्यादित कर खम्भे से नरसिंह रूप में प्रगट होकर भक्त का मान बढ़ाया, स्वामी रामकृष्ण परम हंस ने नरेन्द्र को मृर्ति मे माॅं काली के दर्शन कराये। माता सीता जब वाटिका के अन्दर स्थापित मन्दिर में अपनी मनोकामना लेकर जाती हैं तो तुलसीदास जी कहते हैं-
बिनय प्रेम बस भई भवानी, खसी माल मूरति मुस्कानी।
सादर सियंॅं प्रसाद सिर धरेऊ, बोलीं गौरि हरषु हियॅं भरेऊ।।
सुन सिय सत्य असीस हमारी, पूजहिं मन कामना तुम्हारी।। …
मन जाहि राच्यो मिलहि सो बर, सहज सुन्दर सांवरो।….
अब सवाल यह है कि महानता मूर्ति की हैं अथवा आस्था और विश्वास की। मूर्ति साक्षात देवी के रूप में प्रगट होकर सीताजी को वरदान तक देती है। इस कलयुग में भी कई किमदन्तियों में पत्थर की मूर्ति को भगवान के रूप में प्रकट होने की घटनाओं का वर्णन मिलता है। यहाॅ पर दो चोैपाइयों का वर्णन समाचीन लगता हैं ‘‘जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरति देखी तिन्ह तैसी’’ तथा ‘‘जेहि पर जाकर सत्य सनेहू, सो तेहि मिलै न कछु सन्देहू ।।’’ आगे तुलसीदास जी यहाॅं तक कहते है – ‘‘जड़ चेतन जग जीव जत,सकल राम मय जान।।’’ सीय राम मय सब जग जानी’’ इतना ही नहीं आगे कहते हैं- ‘‘करहुुं प्रणाम जोर जुग पानी।’’ सवाल यह है कि तुलसीदास जी से अधिक विचारवान क्या आज और कोई दूसरा है। कोैन ईश्वर है कोैन नहीं इसका सहज रूप से जान लेना बहुत सुगम नहीं है। (राजेन्द्र, विश्व संवाद केन्द्र लखनऊ)