धर्म-संस्कृति-अध्यात्मब्लॉग/परिचर्चा

किस ऑफ़ लव

“किस ऑफ़ लव”
“वेश्यावृति को क़ानूनी मान्यता”
“फिल्मों,इंटरनेट आदि पर अश्लीलता”
“लिव-इन-रिलेशनशिप”
“रेव पार्टी”
“समलेंगिकता आदि को समर्थन ”
“हिन्दू देवी देवताओं के बारे में अनैतिक टिप्पणी”

kissoflove

यह सभी व्यभिचारी सोच के कुछ रूप हैं जिनका आज की पढ़ी लिखी जमात में समर्थन करना आधुनिकता का, विकास का, ऊँची सोच का प्राय: बन गया गया हैं। सदाचार, चरित्र रक्षा, पति-पत्निव्रता आदि विचारों का पालन, यम-नियम एवं ब्रह्मचर्य आदि के पालन को पुराने ज़माने की सोच बताना, जंगलीपन बताना, दकियानूसी बता कर उसका विरोध करना इसी विकृत मानसिकता का प्रतीक बन गया हैं। यथेच्छाचार (at one’s pleasure) एवं
उच्छृंखलता (Licentiosness) को हमारे देश पर कुछ युवाओं के माध्यम से लागु करना एक सोची समझी साजिश हैं। आप सभी जानते हैं कि कोई भी कार्य बिना नियम के अगर किया जाये तो उस कार्य के पूर्ण होने की सम्भावना भी न के बराबर हैं अपितु उसमें हानि की संभावना भी अधिक हैं। एक उदहारण लीजिये आप सड़क पर गाड़ी तभी चला सकते हैं जब आप यातायात के नियमों का यथोचित पालन करे। अगर आप स्वेच्छा से गाड़ी चलाने की सोचे तो आप कितनो को टक्कर मारेगे, कितनों को हस्पताल भेजेंगे। आप स्वयं सोचिये। जीवन में किसी भी कार्य को लीजिये आपको एक नियम से ही उस कार्य को करना पड़ेगा तभी वह कार्य पूर्ण होगा। इसी सिद्धांत को सरल भाषा में स्वामी दयानंद ने कहा था-मनुष्य सामाजिक नियम का पालन करने के लिए परतंत्र हैं जबकि कर्म करने के लिए स्वतंत्र हैं। व्यभिचार का समर्थन करने वाले यह भूल जाते हैं कि समाज में एकाएक बढे बलात्कार के पीछे यही प्रदूषित वातावरण हैं जिसे वे आधुनिकता के नाम पर परोस रहे हैं। जो लोग भारतीय संस्कृति और प्राचीन परम्पराओं को दकियानूसी और पुराने ज़माने कि बात कहते हैं वे वैदिक विवाह व्यवस्था के आदर्शों और मूलभूत सिद्धांतों से अनभिज्ञ हैं। हमारे प्राचीन ऋषि व्यभिचार के भयानक परिणामों से परिचित थे इसीलिए उन्होंने सदाचारी बनने का उपदेश दिया था।

अंत में यही कहना चाहता हूँ कि सदाचारी बने न कि व्यभिचारी ।

डॉ विवेक आर्य

2 thoughts on “किस ऑफ़ लव

  • विजय कुमार सिंघल

    बहुत अच्छा लेख. खुलेपन के नाम पर कुसंस्कृति को बढ़ावा देना विनाशकारी है. अगर इसको शीघ्र न रोका गया तो भयंकर परिणाम सामने आयेंगे.

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