आत्मकथा : मुर्गे की तीसरी टांग (कड़ी 33)

सिर की मंडी में हमारी शाखा का नाम था ‘ध्रुव प्रभात’ और हमारे मुख्य शिक्षक थे श्री मुरलीधर जी ओझा। वे लोहे के एक कारखाने के स्वामी थे और बहुत कर्मठ स्वयंसेवक थे। शाखा में वे तरह-तरह के खेल खिलाया करते थे और गीत आदि गवाते थे। वे अन्य बहुत सी बातें भी बताया करते थे, जो मेरी बुद्धि के अनुसार ही थोड़ी-बहुत समझ में आती थीं। वहीं मैंने संघ की प्रार्थना कंठस्थ की। कक्षा 9, 10 और 11 में पढ़ने तक मैं प्रायः नियमित रूप से शाखा जाता रहा। मेरे ममेरे भाई श्री मदन गोपाल गोयल भी प्रायः नित्य शाखा जाते थे। इसी बीच एक बार जयपुर हाउस, लोहामंडी में संघ का नया कार्यालय माधव भवन बन रहा था। वहाँ श्रमदान करने के लिए बारी-बारी से विभिन्न शाखाओं के लोग आया करते थे। हमारी शाखा के स्वयंसेवक भी एक दिन वहाँ श्रमदान करने गये थे, जिनमें मैं भी था। मैंने अपनी क्षमता के अनुसार वहाँ गिट्टियाँ तोड़ी थीं। बाद में भी एक-दो बार मैं बिना बुलाये ही श्रमदान करने गया था। इसी तरह एक बार मैं दशहरे के पथ संचलन में भी शामिल हुआ था, जिसको तत्कालीन सरसंघचालक श्री बाला साहब देवरस ने सम्बोधित किया था।

मेरे शाखा जाने में व्यवधान तब आया जब आपात्काल लगने पर सभी शाखाएँ बन्द हो गयीं, मुरलीधर जी गिरफ्तार कर लिये गये और हमारे मामाजी भूमिगत होने के कारण बच गये। बाद में मुरलीधर जी 20-सूत्री कार्यक्रम के लिखित समर्थन का सहारा लेकर छूटे, परन्तु शाखा दोबारा प्रारम्भ नहीं हो पायी। तब तक मैं बी.एससी. में पढ़ने लगा था। आपात्काल में छात्र संघर्ष समिति के नाम से भूमिगत साप्ताहिक समाचार पत्र निकलता था। किसी तरह मुझे उसकी प्रति प्राप्त हो जाती थी और मैं उसे खूब पढ़ा करता था। उसमें ऐसे समाचार छपते थे, जो समाचारपत्रों या सरकार द्वारा दबा दिये जाते थे। उदाहरण के लिए, एक बार किसी कालेज में हुई वादविवाद प्रतियोगिता का समाचार छपा था, जिसका विषय था ‘आपात्काल देश के लिए लाभदायक है’। समाचार में बताया गया था कि जिन 15 छात्रों ने इस प्रतियोगिता में भाग लिया था, उनमें से केवल 1 छात्र इसके समर्थन में बोला था और अन्य 14 छात्र आपात्काल के विरोध में बोले थे।

मैं शाखा भले ही नहीं जाता था, परन्तु संघ से मेरा सम्पर्क दृढ़ होता गया। कई बार दोपहर को अपने सेंट जाॅह्न्स कालेज से लौटते समय मैं राजामंडी के पुराने संघ कार्यालय में चला जाता था। वहाँ बड़े मामाजी व्यवस्था प्रमुख थे और कार्यालय के भंडार की पुस्तकों तथा अन्य सामग्री की रक्षा और व्यवस्था का दायित्व वे ही सँभाला करते थे। संघ कार्यालय जाकर मैं प्रायः पांचजन्य, राष्ट्रधर्म आदि राष्ट्रवादी समाचार पत्र और पत्रिकायें पढ़ा करता था और कभी-कभी मामाजी से कोई पुस्तक लेकर भी पढ़ा करता था। इससे मेरे राष्ट्रवादी विचारों को परिपक्वता प्राप्त हुई। आगरा में पढ़ने की अवधि में मेरा संघ से मात्र इतना ही सम्पर्क रहा।

जब मैं दिल्ली में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में पढ़ने गया, तो वहाँ संघ की शाखा नहीं थी। संघ के जो लोग थे, उन्हें कम्यूनिस्टों ने बदनाम कर दिया था। दूसरे वर्ष अन्य बहुत से स्वयंसेवक वहाँ प्रवेश लेकर आये, जिनमें प्रमुख थे- हरे कृष्ण जेना, संजय सत्यार्थी, नरेश भोक्ता, महेश उपाध्याय, सिन्धु कुमार झा, कमलेश्वर जी, नरेश चौधरी आदि। ये सभी समर्पित स्वयंसेवक थे। इनके आने पर स्वाभाविक रूप से विद्यार्थी परिषद का कार्य सुचारु रूप से चलने लगा और सायं शाखा भी प्रारम्भ की गई।

हमारी शाखा लगाने के लिए पास में ही स्थित आई.आई.टी. से श्री दुर्ग सिंह जी चौहान आया करते थे। ये काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से शिक्षित थे और महामना मालवीय मिशन के भी सक्रिय कार्यकर्ता थे। वे बाद में उ.प्र. तकनीकी विश्वविद्यालय के उपकुलपति भी बने। वे नियमित आते थे और नियमित शाखा आने वालों में मैं प्रमुख था। मैं किसी उचित कारण के बिना कभी शाखा नहीं छोड़ता था। प्रारम्भ में कम्यूनिस्टों ने आपत्ति की थी कि वि.वि. परिसर में शाखा क्यों लगाते हो, हम नहीं लगाने देंगे। मैंने उन्हें चुनौती दी थी कि किसी दिन हमारी शाखा को रोककर दिखाइए, तो फिर मैं झेलम लाॅन में शाखा लगाऊँगा। झेलम लाॅन तीन छात्रावासों के बीच में स्थित एक प्रमुख और केन्द्रीय स्थान था, जहाँ छात्र अपनी थकान मिटाया करते थे। मेरे इस रवैये से किसी कम्यूनिस्ट की हिम्मत नहीं हुई कि शाखा में व्यवधान डाल सकता। शाखा की संख्या प्रायः 8-10 तो रोज ही हो जाती थी, कभी-कभी 15-20 भी हो जाती थी। वि.वि. में हमारी वह शाखा बहुत समय तक चलती रही। छात्र अशांति होने पर ही वह बन्द हुई।

हमारे विश्वविद्यालय में प्रायः प्रचारक लोग आया करते थे। एक बार श्री राम शंकर अग्निहोत्री, जो कभी पांचजन्य साप्ताहिक के सम्पादक भी रहे थे, हमारे विश्वविद्यालय में आये थे और हम स्वयंसेवकों की बैठक ली थी। कई बार हमने श्री राम जेठमलानी, श्री अरुण जेटली, रानी जेठमलानी, महेश शर्मा और एक बार श्री लालकृष्ण आडवाणी जी को भाषण देने के लिए बुलाया था। उनके कार्यक्रमों में श्रोताओं की संख्या भी अच्छी रही थी। हालांकि कम्यूनिस्ट और नक्सलवादी छात्र अनावश्यक प्रश्न पूछकर और शोर मचाकर व्यवधान डालने की कोशिश करते थे, लेकिन हमारी दृढ़ता से कार्यक्रम पूर्ण सफल होते थे। एक बार श्री नानाजी देशमुख भी हमारे विश्वविद्यालय के निकट मुनीरका में आये थे, जिनकी बैठक में हम सभी शामिल हुए थे।

उस समय वहाँ सुरेश जी प्रचारक थे। वे मुझे बहुत मानते थे। वे यह आशा करते थे कि मैं पढ़ाई पूरी करने के बाद प्रचारक बनकर निकल जाऊँगा। परन्तु मैं जानता था कि यह कार्य मेरे वश का नहीं है। एक तो, अपनी सुनने की असमर्थता के कारण मैं संकोच करता था। दूसरी बात यह थी कि मुझे अपनी कमियों और सीमाओं का ज्ञान था। प्रचारकों को जिस निष्ठा और संयम की आवश्यकता होती है, वह मुझमें होना संभव नहीं था। इसलिए मैं नौकरी के साथ ही संघकार्य करना चाहता था।

जब मैं विश्वविद्यालय छोड़कर लखनऊ नौकरी करने गया, तो वहाँ संघ की शाखा नियमित लगती थी। मैं प्रायः रोज ही शाखा जाता था। वहीं पहली बार मैं एक पूरे दिन के कार्यक्रम में गया और प्रयाग के शीत शिविर में भी गया। इसकी कहानी आत्मकथा के अगले भाग में विस्तार से लिखूँगा।

राजनैतिक तौर पर मेरी विचारधारा जहाँ राष्ट्रवादी पार्टी भारतीय जनसंघ के निकट थी, वहीं धार्मिक विश्वासों में मैं आर्य समाज के निकट आया। प्रारम्भ में मैं अपनी माताजी के प्रभाव से देवी-देवताओं पर विश्वास रखता था, हनुमान चालीसा आदि पढ़ा करता था और मूर्ति पूजा किया करता था। लेकिन जैसे-जैसे मेरी बुद्धि परिपक्व होती गयी, वैसे-वैसे मूर्ति पूजा से मुझे चिढ़ होने लगी। इसकी पृष्ठभूमि यह है कि हमारे पितामह के बड़े भाई स्वामी शंकरानन्द जी महाराज आर्यसमाज के प्रचारक थे और लगभग 60 वर्षों तक प्रचारक रहे। पूरे 100 वर्ष की आयु में उनका देहान्त तब हुआ था, जब मैं एम.फिल. की पढ़ाई पूरी करके लखनऊ में नौकरी लगने की प्रतीक्षा कर रहा था।

लाल बाबा ज्यादातर बाहर ही कश्मीर, नैनीताल, हलद्वानी, जोधपुर, अजमेर आदि स्थानों पर रहते थे और बीच-बीच में गाँव भी आते थे। वे जब भी गाँव आते थे, तो हम उनके पास बहुत बैठा करते थे। हम तो अबोध थे, परन्तु गाँव के दूसरे लोगों के सामने वे प्रायः मूर्ति पूजा आदि की निरर्थकता समझाते थे तथा पंडे-पुजारियों-पुरोहितों द्वारा आम हिन्दुओं को ठगे जाने का रोचक और व्यंग्यात्मक वर्णन किया करते थे। धीरे-धीरे हमारी समझ में भी यह सब आने लगा। हालांकि हमारे परिवार पर उनका प्रभाव बहुत कम था, क्योंकि सभी खुलकर मूर्ति पूजा करते थे और सत्य नारायण की कथा, श्राद्ध, ब्रह्मभोज आदि कराया करते थे, जिनके वे घोर विरोधी थे।

जब मैं अपने कानों की चिकित्सा के लिए कानपुर गया था, तो वहाँ भाई साहब डाॅ. सूरजभान जी के पास आर्यसमाज की बहुत सी पुस्तकें थीं। हमारे पूरे खानदान में ये भाईसाहब ही सबसे अधिक आर्यसमाजी थे, क्योंकि वे आर्यसमाजी विधि से दैनिक हवन नियमित किया करते थे, जिसमें मैं भी भाग लेता था। वैसे वे और उनके परिवारी सुविधा के अनुसार मूर्ति पूजा भी कर लेते थे। वहाँ मैं लगभग 2 माह रहा। वहाँ रहते हुए मैंने उनके पास उपलब्ध लगभग सभी धार्मिक पुस्तकें पढ़ डालीं, जिनमें मुख्य थीं- स्वामी दयानन्द सरस्वती की जीवनी और महात्मा आनन्द स्वामी सरस्वती के प्रवचनों की कई पुस्तकें। इनको पढ़कर मेरे धार्मिक विचारों को स्पष्ट दिशा मिली और मूर्ति पूजा की निरर्थकता मेरे सामने स्पष्ट हो गई। बाद में मैंने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ भी कई बार पढ़ा है, जिससे मेरे मन में वैदिक धर्म का स्वरूप पूरी तरह स्पष्ट हो गया है। वैसे मैं आर्यसमाज नामक संस्था से कभी औपचारिक रूप से जुड़ा नहीं रहा।

अपने पूरे खानदान में भाईसाहब डा. सूरजभान के अलावा मुझे और मेरे एक भतीजे डा. मुकेश चन्द को ही पूरी तरह वैदिक धर्मी कहा जा सकता है। बाकी लोग अपने सुविधा के अनुसार सनातन धर्मी और वैदिक धर्मी बनते रहते हैं अर्थात् ‘गंगा गये तो गंगादास, जमुना गये तो जमुनादास।’ हमारे एक ताऊ श्री कोमल प्रसाद जी भी आगे चलकर पक्के आर्यसमाजी हो गये थे। मेरे मूर्ति पूजा विरोधी विचार मेरे घर-परिवार में सबको मालूम हैं और एक प्रकार से मैं लाल बाबा से भी ज्यादा उग्र मूर्तिपूजा विरोधी हूँ। प्रारम्भ में मैं मूर्ति पूजकों की बहुत खिल्ली उड़ाया करता था, परन्तु अब मैं मूर्तिपूजा का विरोध तो करता हूँ, लेकिन उनकी खिल्ली नहीं उड़ाता।

आजकल मेरी हालत यह है कि मैं अपनी पत्नी और बच्चों के साथ बड़े-बड़े मन्दिरों में जाता हूँ, परन्तु कभी मूर्ति को सिर नहीं झुकाता। मैं लाखों की भीड़ देखता हूँ और बड़े-बड़े भव्य श्रृंगार और झाँकियाँ देखता हूँ, परन्तु कभी भी मुझे मूर्तियों में रंचमात्र भी श्रद्धा नहीं होती, बल्कि घोर वितृष्णा ही होती है कि इतनी भीड़ मूर्खताओं में फँसी हुई है। मैं दो-तीन बार वैष्णो देवी की यात्रा पर भी गया हूँ, परन्तु दर्शनों के लिए नहीं, बल्कि केवल भ्रमण और प्राकृतिक सौंदर्य का आनन्द लेने के लिए। पुराणों को मैं कहानी की पुस्तकों से अधिक महत्व नहीं देता। हालांकि रामायण, महाभारत आदि को मैं नियमित पढ़ता हूँ और उनके महान् चरित्रों श्रीराम, श्रीकृष्ण, भक्तवर हनुमान्, भगवान परशुराम, भीष्म, युधिष्ठिर आदि से बहुत प्रभावित हूँ तथा उनसे कुछ सीखने का प्रयास करता हूँ।

(जारी…)

परिचय - डाॅ विजय कुमार सिंघल

नाम - डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’ जन्म तिथि - 27 अक्तूबर, 1959 जन्म स्थान - गाँव - दघेंटा, विकास खंड - बल्देव, जिला - मथुरा (उ.प्र.) पिता - स्व. श्री छेदा लाल अग्रवाल माता - स्व. श्रीमती शीला देवी पितामह - स्व. श्री चिन्तामणि जी सिंघल ज्येष्ठ पितामह - स्व. स्वामी शंकरानन्द सरस्वती जी महाराज शिक्षा - एम.स्टेट., एम.फिल. (कम्प्यूटर विज्ञान), सीएआईआईबी पुरस्कार - जापान के एक सरकारी संस्थान द्वारा कम्प्यूटरीकरण विषय पर आयोजित विश्व-स्तरीय निबंध प्रतियोगिता में विजयी होने पर पुरस्कार ग्रहण करने हेतु जापान यात्रा, जहाँ गोल्ड कप द्वारा सम्मानित। इसके अतिरिक्त अनेक निबंध प्रतियोगिताओं में पुरस्कृत। आजीविका - इलाहाबाद बैंक, डीआरएस, मंडलीय कार्यालय, लखनऊ में मुख्य प्रबंधक (सूचना प्रौद्योगिकी) के पद से अवकाशप्राप्त। लेखन - कम्प्यूटर से सम्बंधित विषयों पर 80 पुस्तकें लिखित, जिनमें से 75 प्रकाशित। अन्य प्रकाशित पुस्तकें- वैदिक गीता, सरस भजन संग्रह, स्वास्थ्य रहस्य। अनेक लेख, कविताएँ, कहानियाँ, व्यंग्य, कार्टून आदि यत्र-तत्र प्रकाशित। महाभारत पर आधारित लघु उपन्यास ‘शान्तिदूत’ वेबसाइट पर प्रकाशित। आत्मकथा - प्रथम भाग (मुर्गे की तीसरी टाँग), द्वितीय भाग (दो नम्बर का आदमी) एवं तृतीय भाग (एक नजर पीछे की ओर) प्रकाशित। आत्मकथा का चतुर्थ भाग (महाशून्य की ओर) प्रकाशनाधीन। प्रकाशन- वेब पत्रिका ‘जय विजय’ मासिक का नियमित सम्पादन एवं प्रकाशन, वेबसाइट- www.jayvijay.co, ई-मेल: jayvijaymail@gmail.com, प्राकृतिक चिकित्सक एवं योगाचार्य सम्पर्क सूत्र - 15, सरयू विहार फेज 2, निकट बसन्त विहार, कमला नगर, आगरा-282005 (उप्र), मो. 9919997596, ई-मेल- vijayks@rediffmail.com, vijaysinghal27@gmail.com