विज्ञान

संस्कृत पर एक ठो

सबसे पहले तो विद्वानों से क्षमा-याचना, क्योंकि यह लेख ऐसे विषय पर है, जिसकी कामचलाऊ जानकारी भी लेखक के पास नहीं है. अत्यंत खेद और शर्म के साथ मैं यह स्वीकार करता हूँ कि मुझे संस्कृत नहीं आती, पर अब मैं संस्कृत सीखने जा रहा हूँ और आशा करता हूँ कि एक साल के अंदर मैं संस्कृत भाषा समझने, लिखने, पढ़ने और बोलने में समर्थ हो जाऊँगा, पर अभी तो संस्कृत पर ही लिख सकता हूँ, संस्कृत में नहीं.

संस्कृत भाषा आजकल विवादों के केन्द्र में है. केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा परिषद् और किसी जर्मन संस्था के बीच शायद 2011 में कोई समझौता हुआ था, जिसके बाद राष्‍ट्रीय शिक्षा-नीति के त्रिभाषा फार्मूले के अंतर्गत जर्मन भाषा को हिन्दी और अंग्रेज़ी के समकक्ष एक भाषा का दर्जा दे दिया गया, छात्र जिनमें से कोई दो भाषाएँ पढ सकते थे. शिक्षा-मंत्री सुश्री स्मृति ईरानी ने एक समिति द्वारा दिये गये निष्कर्ष के आधार पर यह निर्णय किया कि वह समझौता राष्‍ट्रीय शिक्षा-नीति की मूल भावना के विपरीत था, और उस समझौते को तत्काल प्रभाव से रद्द करते हुए सभी केन्द्रीय विद्यालयों में जर्मन के स्थान पर संस्कृत पढ़ाने का आदेश दिया. बस-बवाल हो गया.

देश के धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवी केन्द्रीय सरकार के इस साम्प्रदायिक और प्रतिगामी निर्णय से आहत हैं. उन्होंने इस सम्बंध में एक दावा भी दायर कर दिया है. उनके अनुसार संस्कृत क्योंकि हिन्दुओं के पूजा-पाठ और कर्मकांडों की भाषा है, अतः साम्प्रदायिक है, और क्योंकि संस्कृत में लिखा गया अधिकांश साहित्य भारत में इस्लामी आक्रमणों के पूर्व का है, अतः उसको पढने से छात्र देश की ‘गंगा-जमुनी’ संस्कृति का परिचय प्राप्त करने से वंचित रह जायेंगे, अतः संस्कृत एक प्रतिगामी भाषा है. अदालत इन बातों पर क्या और कब निर्णय देगी, यह देखना दिलचस्प होगा. मेरे विचार से तो अदालत से हमारे इन उत्साही मित्रों को केवल इतनी ही राहत मिल सकती है कि सरकार का फैसला अगले सत्र से लागू किया जाय, पर यह इस लेख का विषय नहीं.

हमारे इन धर्मनिरपेक्ष मित्रों की तर्क-पद्धति ने बहस को देश में शिक्षा के उद्देश्यों की ओर मोड़ दिया है. इनका कहना है कि पाठ्यक्रम में जर्मन भाषा को शामिल करने के बाद उच्च शिक्षा के लिये जर्मनी जाने वालों की संख्या में 114% वृद्धि हुई है, जो सरकार के इस फैसले के बाद रुक जायेगी, और इस प्रकार जर्मन भाषा की पढाई रोक देने से (यद्यपि एक वैकल्पिक विषय के रूप में जर्मन भाषा के अध्ययन पर कोई रोक नहीं है) हज़ारों भारतीय विद्यार्थियों का भविष्य अंधकारमय हो गया है. यह बात कुछ इस तरह कही जा रही है मानो भारतीय शिक्षा-पद्धति का उद्देश्य ही छात्रों को जर्मनी भेजना हो! और जैसे जर्मन भाषा को तीन प्रमुख भाषाओं में से निकाल देना ही काफी न हो, उसकी जगह पर संस्कृत जैसी भाषा को रखकर आग में घी डालने जैसा काम किया गया है. आखिर संस्कृत पढ़कर छात्र करेंगे क्या?! यह बात कुछ इस तरह कही जा रही है जैसे संस्कृत पढने से आधुनिक और प्रायौगिक ज्ञान के दरवाज़े इन छात्रों पर हमेशा के लिये बंद हो जायेंगे, और संस्कृत पढने और कुछ न पढने में बहुत मामूली सा अंतर है!

इस तर्क-पद्धति का निहितार्थ यह है कि संस्कृत पढने से (और जर्मन न पढने से) शिक्षा के उद्देश्य पूरे नहीं होते.

अब हमारे समक्ष यक्ष-प्रश्न यह है कि शिक्षा का मूल उद्देश्य क्या है, और संस्कृत पढने से किस प्रकार हम इस मूल उद्देश्य से भटकने का खतरा उठा रहे हैं? अगर शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य डिग्री लेना और डिग्री मिलने के तुरंत बाद (जर्मनी में या कहीं भी) एक नौकरी हथिया लेना है, अगर क्षमा, दया, वीरता, साहस, मेहनत और ईमानदारी जैसे सिद्धान्तों और सिद्धांतनिष्ठ जीवन के लिये स्वेच्छा से कष्ट उठाने को तैयार रहने जैसे गुणों का शिक्षा से कोई सम्बंध न हो, तो शायद हमारे बुद्धिजीवी मित्र ठीक कह रहे हैं, पर क्या वास्तव में शिक्षा का यही उद्देश्य है, जो हमारे यह मित्र हमें बता रहे हैं? फिर संस्कृत तो अंग्रेज़ी और जर्मन की तरह मात्र एक भाषा है, और किसी भाषा को जानने अथवा न जानने से किसी की नौकरी प्राप्त कर लेने की क्षमता कैसे प्रभावित हो जाती है? अंग्रेज़ी के बारे में एक धारणा है कि भारत में भी अच्छी नौकरी पाने के लिये व्यक्ति के लिये अंग्रेज़ी का ज्ञान आवश्यक है, पर केवल अंग्रेज़ी के ज्ञान के बल पर किसी को नौकरी पा लेते शायद ही देखा गया हो. यदि कोई एक अच्छा अकाउन्टैन्ट है, तो अंग्रेज़ी कमज़ोर होने के बावजूद अकाउन्टैन्ट की नौकरी उस व्यक्ति को मिलने की संभाव्यता उस व्यक्ति से हमेशा ज़्यादा रहेगी, जो अंग्रेज़ी बहुत अच्छी जानता हो, पर अकाउन्टेन्सी में कमज़ोर हो. अगर अंग्रेज़ी जानने वाला एक अच्छा अकाउन्टैन्ट हो सकता है, तो संस्कृत (या जर्मन) जानने वाला एक अच्छा अकाउन्टैन्ट क्यों नहीं हो सकता?

यह एक साधारण प्रश्न है, पर हमारे धर्मनिरपेक्ष मित्रों को इतने विस्तार में जाकर चीज़ों को देखने की फुर्सत नहीं है. वह तो संस्कृत भाषा में लिखे गये कुछ ‘सुभाषितानि’ के आधार पर शायद यह निष्कर्ष निकाल रहे हैं कि यह सब पढ़कर छात्र खामखा दान, विनय, गुरुजन का सम्मान, सत्य, मितव्ययिता आदि फालतू बातों के चक्कर में प़ड जायेंगे, और नौकरी पाने के लिये चालाकी जैसे आवश्यक गुणों जिन्हें अंग्रेज़ी के एक शब्द स्मार्टनेस द्वारा व्यक्त किया जा सकता है, को अर्जित करने से वंचित रह जायेंगे, और वर्तमान युग में जीवन के अयोग्य होकर रह जायेंगे. अब इस तर्क के समक्ष प्रणिपात हो जाने के अतिरिक्त और क्या किया जा सकता है?

संस्कृत भाषा के विरोधियों के द्वारा एक तर्क यह दिया जाता है कि संस्कृत पढ़कर व्यक्ति कर्मकाण्ड कराने वाला पुरोहित या ज्योतिष विद्या की दुकान चलाने वाला ही बन सकता है, और क्योंकि यह धंधे पुरातनपन्थियों के बीच ही लोकप्रिय हैं, और आधुनिक काल में इन धन्धों का बाज़ार सीमित ही रह जायेगा, अतः संस्कृत पढ़ना-पढ़ाना बेकार है. खेद का विषय है कि यह तर्क अपनी जगह बिल्कुल ठीक है.

यद्यपि इस देश में स्वतंत्रता के बाद से ही धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था ही राज्यारूढ़ रही है, तथापि सरकारों ने संस्कृत पढ़ने पर काफी प्रोत्साहन दे रखे हैं. देश में अनेक ऐसे संस्थान हैं, जहाँ रहकर संस्कृत की पढ़ाई लगभग मुफ्त की जा सकती है. लोग इन संस्थानों में पढ़ते भी हैं, पर इनसे निकलने वालों में बहुमत मन्त्रों के अपेक्षाकृत सही उच्चारण कर सकने वाले कर्मकाण्डी पुरोहितों का ही दीख पड़ता है. ध्यान से देखा जाय तो इसमें भी संस्कृत भाषा का कोई दोष नहीं है, और मामला देश की शिक्षा-व्यवस्था से ही जुड़ा हुआ है. अगर पढ़ने का उद्देश्य ही यथाशीघ्र जीविकोपार्जन की व्यवस्था कर लेना है, और संस्कृत के छात्र भी इसी उद्देश्य को लेकर पढाई करते हैं, तो ऐसी पढाई से और उम्मीद भी क्या की जा सकती है? अगर हमारे बहुसंख्यक तकनीकी संस्थान घटिया इंजीनियर और घटिया डॉक्टर पैदा कर रहे हैं, तो संस्कृत संस्थान यदि कामचलाऊ संस्कृतज्ञ पैदा कर रहे हैं, तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है? दोष तो व्यवस्था का है.

संस्कृत के पक्ष में खड़े लोगों का मत है कि यद्यपि इस्लामी आक्रमणों में बहुत सारा अमूल्य संस्कृत साहित्य नष्ट हो गया, पर अभी भी जो ग्रंथ मौजूद हैं, उनमें मनुष्यमात्र की ज्ञानपिपासा को शांत करने के लिये पर्याप्त ज्ञान उपलब्ध है; कुछ अति उत्साही लोगों द्वारा यह भी कहा जाता है कि पश्चिमी देशों ने परमाणु बम जैसे आविष्कार हमारे संस्कृत भाषा के ग्रंथों में उपलब्ध जानकारियों के आधार पर ही किये हैं. ऐसे लोगों का उत्साह निस्संदेह प्रणम्य है, पर इनसे यह पूछा जाना चाहिये कि पिछले 60-65 सालों में हमारे देश के संस्कृत के विद्वानों ने अपने ग्रंथों को पढ़कर ऐसा कोई चमत्कारी आविष्कार क्यों नहीं किया? दोष यहाँ भी व्यवस्था का है. हमारी शिक्षा-व्यवस्था शिक्षार्थी को ज्ञान का मार्ग दिखाने के स्थान पर केवल पाठ्यक्रमों को पूरा करने और महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर रटा देने पर ही केन्द्रित रही है- यही कारण है कि हमारे विश्वविद्यालयों में शोध का स्तर अत्यंत दयनीय है.

अगर संस्कृत के ग्रंथों में ज्ञान का अपार भंडार हो भी, तब भी यह भंडार इस व्यवस्था से बाहर निकलने वाला नहीं है. स्वामी भारती कृष्णतीर्थ जी ने 1960 के आसपास ऋग्वेद की कुछ ऋचाओं में गणित के कुछ सूत्र छिपे होने की खोज की थी. यह ऋचाएं पहले भी विद्यमान थीं, पर उनमें गणित के सूत्र स्वामी जी को ही दिखे. शिक्षा का उद्देश्य वस्तुतः इसी दृष्टि का विकास करना है, और यदि हमारी शिक्षा-व्यवस्था का सरेखण (alignment) इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये होता, तो वैदिक गणित जैसे अनेक आविष्कारों का मार्ग प्रशस्त होता. और यदि ऐसा होता, तो ज्ञान की खोज में मेधावी छात्र संस्कृत पढने के लिये स्वतः प्रेरित होते. परंतु जबतक ऐसा नहीं होता, तबतक चाहे जर्मन के स्थान पर संस्कृत पढ़ाई जाय चाहे गणित के स्थान पर- कोई फर्क नहीं पड़ने वाला.