इतिहास

जानिए कौन थे चमार और कैसे बने हेय

चमार शब्द चर्मकार से बना है , चर्मकार यानि चमड़े का कार्य करनेवाले । हिन्दू धर्म में चमड़े का कार्य किसको करने को दिया है यह मनुसमृति के अध्याय 10के 36 वें श्लोक में निर्देश दिया गया है किसे चमड़े का काम करना चाहिए
‘ घिग्वणाना चर्मकार्य ‘
अर्थात- जो समुदाय धिक्कारने का पात्र है उसे चर्मकार्य करना चाहिए
इसी प्रकार मनुस्मृति के 11वें अध्याय के 138वें श्लोक में चर्मकार को जीनकर से संबोधित किया गया है जिसका अर्थ बौद्व या जैन भिक्खु । क्यों की संस्कृत में चमड़े का काम करने वाले के लिए पहले से ही शब्द ‘ पदुकासंघात’ है , तो उसे चर्मकार शब्द क्यों प्रयोग करना पड़ा?

दरसल हिन्दू धर्म में बौद्धों को धिक्कारिया समझा गया है , जैसे मूर्खो के लिए एक बुद्धू शब्द का प्रयोग होता है जो की बुद्ध शब्द से बना है । बुद्ध का अर्थ होता है ज्ञानी / चेतन , पर बुद्ध को अपमानित करने के लिए बुद्ध से बुद्धू बना दिया गया , बुद्धू यानि मुर्ख ।
बौद्ध धर्म में भिक्खु श्रेष्ठ होते हैं और वे सर मुंडवा के यानि केश रहित रहते हैं , इसी केश रहित भिक्खु जो बौद्ध धर्म में समान्नित समझा जाता उसकी को अपमानित करने के लिए हिन्दू धर्म में बाप मरने पर मुंडन करवाने का विधान कर दिया । यानि केश रहित होने का अर्थ होता था बाप मरना ।

इन सबका कहने का अर्थ यह है की हिन्दु धर्म में धिक्कारने योग्य बौद्धों को समझा गया .
इसका एक और उदहारण और बताता हूँ । बौद्धों में चीवर या चावर धारी बौद्ध भिक्खु होते हैं जो श्रेष्ठ समझे जाते हैं बौद्ध धर्म में । जब भारत से बौद्ध धर्म को नष्ट किया जाने लगा तो जो अमीर बौद्ध थे वे या तो देश छोड़ के चले गए या दूर दराज के इलाको में बस गए । पर जो गरीब बौद्ध थे वे अपने स्थान पर ही रह गए । उनको बाद में घृणा के कारण उन्हें धिक्कारने वाला समझा गया और चीवर/ चावरधारियों से चमार शब्द का सम्बोधन किया जिसे मरे हुए पशुओ को उठाने उन्हें खाने और चमड़े उतारने का काम दिया गया । फिर उसके बाद हिंदू धर्म में उनकी स्थिति और नीचे और नीचे करते चले गए ।

– केशव

परिचय - संजय कुमार (केशव)

नास्तिक .... क्या यह परिचय काफी नहीं है?

7 thoughts on “जानिए कौन थे चमार और कैसे बने हेय

  1. चमार का वास्तविक शब्दार्थ चर्म अर्थात मनुष्य की खाल की चिकत्सा का ज्ञान रखने वाला चिकत्सा विशेषज्ञ होता है। चर्मकार अर्थ भी हो सकता है। जो भी व्यक्ति चर्म से सम्बंधित ज्ञान रखे वा कार्य करे वह चर्मकार वा चर्म ज्ञान वा चिकित्सा विशेषज्ञ। मनुस्मृति में मध्यकाल में स्वार्थी लोगो ने भारी प्रक्षेप किये हैं, अतः मनुस्मृति का वर्तमान स्वरुप किसी को भी स्वीकार्य नहीं हैं। कृपया विशुद्ध मनुस्मृति से प्रमाण देने की कृपा करें। बुद्धू शब्द बुद्धिहीन के लिए प्रयोग किया जाता है। बुद्धू शब्द को भगवन बुध से जोड़ना आपके अपने घर की खोज है। इस तोड़ मरोड़ के लिए बधाई स्वीकार करें। सन्यास लेते समय केश मुंडाए जाने का वैदिक विधान है। आजकल भी यह परंपरा जारी है। स्वामी दयानंद ने सन्यास के समय केश मुंडाए थे। तब उनके पिता जीवित थे। शरीर त्याग के समय भी उन्होंने शौरकर्म कराया। क्या तब उनके पिता की मृत्यु हुई थी ? शब्दों को तोड़ मरोड़ कर मूर्खो वा अज्ञानियों को तो मूर्ख या बुद्धू बनाया जा सकता है, समझदारों को नहीं। हमारे अनुसूचित जाति के बन्धुवों की दुर्दशा मुस्लिम गुलामी के काल में सर्वाधिक हुई क्योंकि वह अपने धर्म में बने रहे, धर्मान्तरित नहीं हुए। मेरा इन बन्धुवों वा इनके सभी पूर्वजों को सादर प्रणाम है।

    1. मनमोहन जी , जिस बात का मुझे गियान नहीं उस के परमाण देना तो मेरे लिए गलत होगा लेकिन जैसा आप ने कहा है कि कुछ लोगों ने अपने मकसद के लिए या लोगों पर अपना परभाव काएम रखने के लिए धर्म को तरोड़ मरोड़ कर लोगों को परोसा . धर्म कोई भी बुरा नहीं होता , धर्म लोगों को अछे बुरे का फरक समझाता है यानी बुराई से दूर रहने को बताता है . सुआमी दया नन्द जी के बारे में मुझे आप से ही पता चला कि उन्होंने जो गलत फैह्मिआं थी उन को दूर करने के लिए ही संगर्ष किया . हिन्दू धर्म बहुत पुराना धर्म है और इस में कुछ गलत बातें ऐड हो जाना मामूली बात है , सिख धर्म तो बिलकुल नया धर्म है जिस की नींव ही वैह्मों भरमों को दूर करना थी और सब जातों को इक्कठा करना था , लेकिन इस में भी कुछ गलत बातें आ गई हैं , तो हिन्दू धर्म जैसे इतने पुराने धर्म में गलत बातें ऐड हो जाना बहुत मामूली बात है . इस लिए धर्म को दोष देना सही नहीं है , जरुरत है इस को सुधारने की . एक बात और , कि हम अपने धर्मों के बारे में खुलाम्खुला नुक्ताचीनी कर सकते हैं लेकिन आप कोई भी लफ्ज़ इस्लाम के बारे में कह कर देखें वोह मार देने तक तियार हो जाते हैं , सलमान रुश्दी को ही देखें तो अभी तक उस की जान महफूज़ नहीं है . बुराइआन हैं हमारे समाज में जिस का कुछ ज़िकर मैंने अपनी कहानी १३ में कर रहा हूँ जो थर्सडे को भेजूंगा . लेकिन इस में आप फरक देखेंगे कि जो बुराइआन मैं लिख रहा हूँ उस में से पंजाब में ९०% ख़तम हो गई हैं , इस का कारण एजुकेशन पंजाब में बहुत तेज़ी से उनत हुई . जिन चर्मकारों से छूना भी वर्जित था वोह अब एक दुसरे की शादिओं में जाते हैं और लड़के लद्किआन इक्कठे पड़ते हैं और अच्छी अच्छी नौक्रिओं पे लगे हुए हैं . यहाँ तो चर्मकारों के लड़के लद्किआन जट्टों और ब्राह्मणों के बच्चों से शादिआन कर रहे हैं जो बिलकुल नॉर्मल हो गिया है और मेरा याकिन है एक दिन भारत में भी हो जाएगा और यह ही हिन्दू धर्म की एकता का कारण बनेगी .

      1. मुझे लगता है कि मेरे भावों को आप प्रसंग के अनुरूप समझ नहीं पाये। मैंने मनुस्मृति में प्रक्षेपों की बात लिखी है। कोई विद्वान या साधारण व्यक्ति मूल लेखक के भावों के विपरीत यदि अपना नाम छुपा कर अपनी अनुचित बाते उसके ग्रन्थ में प्रविष्ठ करता है तो क्या वह स्वार्थी नहीं कहा जायेगा और यह तोर मरोड़ नहीं है? यह तो अति निंदनीय कार्य है। आप इसे ऐसे समझिए कि किसी ने शुद्ध धार्मिक विचारों का ग्रन्थ बनाया। वह मर गया। वर्षों बाद यदि कोई उसमे अन्धविश्वास वा अन्य अनुचित बाते उसकी पुस्तक में मिला दे उसे आप इसे कार्य को क्या कहेंगे ? मैं नहीं समझता कि भगवन बुद्ध के नाम को विकृत कर बुद्धू शब्द बनाया गया है। यह बुद्धिहीन शब्द का अशिक्षित लोगो दवारा प्रयोग है। इसे मैं शब्दों की तोड़ मरोड़ मानता हूँ. यह कार्य समाज में वैमनष्य पैदा करने के लिए लोग करते हैं। लेखक ने कहा है कि बौद्ध भिक्षुकों को अपमानित करने के लिए हिन्दुओं ने बाप के मरने पर बाल कटवाने की परम्परा आरम्भ की। यह भी अनुचित है। वैदिक धर्म वा संस्कृति जो की २ अरब साल पुरानी है उसमे ८ वर्ष की आयु में गुरुकुल में भर्ती करते समय बालक का मुंडन कराया जाता था। आज भी यह परंपरा चल रही है। सन्यासी भी सर मुंडाते है। उन्हें भी बाल रखने का विधान नहीं है। अतः बाप के मरने पर ब्रह्मचारियों वा सन्यासियों का अनुकरण होता है। सिर पर अधिक बालों का होना विद्याध्ययन में बाधक है। इसे बौद्धों के विरुद्ध हिन्दू भावना कहना बुद्धि का दिवालियापन है। यह निश्चित ही शब्दों व विचोरों की तोर मरोड़ है। आशा है कि आप मेरे विचों को समझ सकेंगे। धन्यवाद।

    2. मनमोहन जी का विश्लेषण ज्यादा तर्क संगत लगता है, पर फिर इस बात का भय भी है कि कहीं केशव जी द्वारा ब्राह्मण होने के नाते दिगभ्रमित करने वाला न करार कर दिया जाऊँ । अतैव मैं अपनी एक कविता जो कभी नवनीत में छपी थी, यहाँ लाने का प्रयास करूँगा ।

  2. आपके लेख से सहमत नहीं हुआ जा सकता. ‘चंवर’ की तुक ‘चमार’ से मिलाना दूर की कौड़ी है. इसका कोई आधार नहीं है. हमारे गाँव में चावलों को ‘चामर’ कहा जाता है. क्यों न यह माना जाये कि चावल उगाने का कार्य करने वालों को ‘चमार’ कहा गया था?
    आपके सारे नहीं तो अधिकांश लेख इसी प्रकार निरर्थक होते हैं, जो समाज में भेदभाव की खाई बढ़ाते हैं.

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