इतिहास

अल्मोड़ा प्रकार की जनजातीय मुद्राएँ

शुंग काल में उत्तर भारत के हिमालयीय क्षेत्रों में अनेक स्थानीय शासकों का आविर्भाव होने लगा था जो अपने कबीलाई भागों के स्वतंत्र शासन का निर्भीक होकर सत्ता-सञ्चालन करने लगे| उन्होंने अपनी जनतान्त्रिक शासन–प्रणाली स्थापित करके मुद्राएँ प्रचलित कीं| इनमें राजन्य, शिवि, त्रिगर्त, औदुम्बर, यौधेय व अल्मोड़ा के शासक प्रमुख थे जिनके इतिहास का मुख्य स्रोत मुद्राएँ Documents ही हैं|

उत्तराखंड राज्य में कुमायूँ मंडल के अंतर्गत अल्मोड़ा जनपद से वर्ष १८८९ ई० में तीन प्राचीन शासकों की मुद्राएँ प्राप्त हुईं जो वर्तमान में ब्रिटिश संग्रहालय, लंदन में संग्रहीत हैं| कालान्तर में दिसम्बर १९७५ ई० में इसी प्रकार की १३ मुद्राएँ अल्मोड़ा के कत्यूर घाटी क्षेत्र से प्राप्त हुईं और उक्त मुद्राएँ सम्प्रति राजकीय संग्रहालय, अलमोड़ा में सुरक्षित हैं| सुप्रसिद्ध मुद्राविद ज़ान एलन ने इन राजाओं का शासनकाल द्वितीय शताब्दी ई०पू०से लेकर प्रथम शताब्दी ई०पू०निर्धारित किया है तथा इन्हें अलमोड़ा प्रकार की जनजातीय मुद्राओं की श्रेणी के अन्तर्गत अध्ययन की सुविधा हेतु वर्गीकृत किया है| विवेच्य लेख में उक्त शासकों की मुद्राओं के मुद्राशास्त्रीय स्वरूप पर प्रकाश डालने का प्रयास किया गया है| IMG_20150607_000038_1

प्रथम शासक शिवदत्त की मुद्राएँ रजत निर्मित व गोलाकार हैं तथा इनका औसत भार २१ ग्राम है| मुद्रा के अग्रभाग पर मध्य में सर्पिलाकार रेखा अंकित की गयी है| वेष्टिनी के भीतर वृक्ष तथा उसके सम्मुख वृषभ प्रदर्शित किया गया है और ब्राह्मी लिपि में परिधि की ओर ‘शिवदतस’ [शिवदत्त] लेख उत्कीर्ण है| पृष्ठभाग पर चार बाणों की गुम्फित आकृति तथा उनके मध्य में नन्दिपद चिह्न के ऊपर त्रिकोण शीर्षयुक्त दंड बना हुआ है|

द्वितीय शासक शिवपालित की मुद्राएँ रजत निर्मित व गोलाकार हैं तथा इनका औसत भार १८ ग्राम है| मुद्रा के अग्रभाग पर मध्य में अस्पष्ट भद्दी मानवाकृति उत्कीर्ण की गयी है| वेष्टिनी के भीतर वृक्ष तथा उसके सम्मुख वृषभ का अंकन हुआ है तथा परिधि की ओर ब्राह्मी लिपि में ‘शिवपालित’ लेख उत्कीर्ण है| पृष्ठभाग पर चार बाणों के गुम्फित चित्र के मध्य में नन्दिपद चिह्न के ऊपर त्रिकोण शीर्षयुक्त दंड की आकृति अंकित है|

तृतीय शासक हरिदत्त की मुद्राएँ भी रजत निर्मित व गोंलाकार हैं तथा इनका औसत भार २० ग्राम है| मुद्रा के अग्रभाग पर मध्य में सर्पिलाकार रेखा अंकित की गयी है| वेष्टिनी के भीतर वृक्ष और उसके सामने वृषभ अंकित किया गया है और परिधि की ओर ब्राह्मी लिपि में ‘हरिदतस’ [हरिदत्त] लेख उत्कीर्ण है| पृष्ठभाग पर चार बाणों के गुम्फित चित्र के बीच में नन्दिपद चिह्न के ऊपर त्रिकोण शीर्षयुक्त दंड की आकृति उत्कीर्ण है|

उपर्युक्त रजत मुद्राएँ हिन्द–यवन शासकों के अर्ध द्र्ख्म सिक्कों के भार–मान की हैं तथा बनावट भी उनकी मुद्राओं से बहुत मिलती–जुलती है| इस प्रकार ये मुद्राएँ मौर्योत्तर कालीन इतिहास की महत्त्वपूर्ण पुरातात्विक साक्ष्य रही हैं| कालान्तर में हिन्द–यवनों के आक्रमण के फलस्वरूप उक्त संघीय राजव्यवस्था का अस्तित्व पूर्णतया समाप्त हो गया|

वेद प्रताप सिंह

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परिचय - वेद प्रताप सिंह

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