गीत/नवगीत

जय जनतंत्र हमारा

शत-शत वंदन अंतस तल से
जय जनतंत्र हमारा
अभिमान पुंज, अधिकार प्रदाता
पावन पूजित गंगा
दीप्त, सुशोभित वैश्विक पटपर
गौरव’पूर्ण तिरंगा
दिनकर वर बरसाता, हिमकर नेह लुटाता
कल-कल वैदिक धारा
शत-शत वंदन भारत माँ का
जय जनतंत्र हमारा

जय हो, जय हो, जय हो
जन-गण की जय हो

*कुमार गौरव अजीतेन्दु

शिक्षा - स्नातक, कार्यक्षेत्र - स्वतंत्र लेखन, साहित्य लिखने-पढने में रुचि, एक एकल हाइकु संकलन "मुक्त उड़ान", चार संयुक्त कविता संकलन "पावनी, त्रिसुगंधि, काव्यशाला व काव्यसुगंध" तथा एक संयुक्त लघुकथा संकलन "सृजन सागर" प्रकाशित, इसके अलावा नियमित रूप से विभिन्न प्रिंट और अंतरजाल पत्र-पत्रिकाओंपर रचनाओं का प्रकाशन