गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

इंसानियत इंसान के हाथों कतल होती रही,
नफरतों के बीज दुनिया किस कदर बोती रही

बैठी रही सरकार बस कानों में डाले ऊंगलियाँ,
हैवानियत हंसती रही, मासूमियत मरती रही

हम तरसते ही रहे पानी की इक-इक बूँद को,
अपने हिस्से की नदी जाने किधर बहती रही

बजाई खूब तालियाँ तमाशाईयों की भीड़ ने,
घर मेरा जलता रहा और रोशनी होती रही

नींद ना आई अमीरी को नर्म बिस्तर पे और,
मुफलिसी आराम से फुटपाथ पर सोती रही

सिसकियाँ भरता रहा कल आसमां में माहताब,
मेरे गम में रात खुद भी रात भर रोती रही

असर कैसा है ना जाने माँ के आशिर्वाद में,
उम्र भर तकलीफ मुझको छूने से डरती रही

— भरत मल्होत्रा।

One thought on “ग़ज़ल

Leave a Reply