कहानी – रक्तदान

यह मेरी पहली नौकरी है. नौकरी के साथ साथ ६ महीने की इंटर्नशिप करनी है. मेरे साथ दस बारह लडकियां और भी हैं. सब अलग अलग शहरों में स्नातक की डिग्री कर के आई हैं. हमारी शिक्षिका हैं डा. शारदा करकरे. वरिष्ठ एवं तेजस्वी. ऊंचा क़द ,गंभीर आवाज़ और निर्मल व्यवहार. कुछ भी हो जाए माथे पर शिकन नहीं. चट्टान की तरह अडिग व्यक्तित्व. काम ज्यादा बात कम.

हम सभी उन्हें शारदा मैम पुकारते हैं. कुछ नियम हैं इस विभाग के जो सबके लिए सामान्य हैं. निर्धन हो या धनवान सबको मानने ही पड़ते हैं. शारदा मैम अपने सिद्धांतों पर अडिग रहती हैं. ऐसा ही एक नियम है रक्तदान के सम्बन्ध में — जो भी मरीज़ अस्पताल से रक्त लेगा उसे उसकी भरपाई रक्त से ही करनी होगी. उसका कोइ रिश्तेदार उसी मात्र में अपना खून दे वापिस अस्पताल के कोष को. इस प्रकार अस्पताल का रक्तकोष कभी खाली नहीं होता.

शारदा मैम की दलील है की रक्त बेचा नहीं जाएगा. जो लोग पैसे से रक्त खरीद कर मरीज़ को बचाना चाहते हैं वह बाहर से रक्त खरीदें. वर्षों से यही व्यवस्था चली आ रही है. शारदा मैम के रहते विभाग का रक्तकोष सदा सुचारू रूप से भरा रहता है.

पट्टियों ,रूई , सफाई के उपकरण आदि पर भी यही नियम लागू होता है मगर इन चीजों के बगैर चल जाता है. पैसा वसूल करके सामान बाहर से खरीदा जा सकता है. मगर रक्त जैसी वस्तु किसी केमिस्ट के तो मिलेगी नहीं.

विभाग में पैर रखते ही इन नियमों का खुलासा कर दिया गया. हम नई डाक्टरनियों को विशेष रूप से आगाह कर दिया गया. मैम्म की डांट से सब घबराते थे मगर उनकी बात बेहद पते ठिकाने की होती थी. मेरी नज़रों में उनका रूतबा बहुत ऊंचा था.

मेरे पहले तीन केस कुछ ठीक नहीं बैठे. मैं बेहद नर्वस हो जाती थी अतः शारदा मैम्म ने एक दिन मुझे बुलाकर अच्छी खासी झाड पिलाई. उनका कहना था कि आत्मविश्वास के बिना किसी का भी उपकार नहीं किया जा सकता. जब तक आप हरेक से प्रभावित होते रहेंगे अपने आपको कमतर समझते रहेंगे. पहले अपनी शक्तियों को गिनो और उनकी सारिणी बना लो. फिर उनको अपने कार्यक्षेत्र में इस्तेमाल करो. दूसरों की सफलताओं के बारे में सोंचना छोड़ दो.

उस दिन से मैं बहुत सतर्क रहती हूँ. मेरी सतर्कता के साथ ही शारदा मैम्म की पैनी दृष्टि मुझपर कुछ और गड़ गयी है.खासकर जहां मरीजों के साथ पेश आने का सवाल हो. दरअसल नए नए डाक्टरों को किस तरह मरीज़ चला जाते हैं इसका अच्छा अनुभव था उनको. मेरी जुबान लड़खड़ा जाती थी. मेरी भावनाएं एकदम तरोताजा थीं. जीवन की भयावहता को इतने पास से देखने का अवसर पहली बार मिला था. इसलिए भी दिल में दया का सागर उमड़ा पड़ता था. शारदा मैम्म की कठोरता अक्सर खल जाती थी. इसके बावजूद मेरा काम परिष्कृत होता गया. शारदा मैम्म मुंह पर किसी की तारीफ़ तो कभी भी नहीं करती थीं , मगर मैं देख रही थी कि कई पेंचीदा केस वह मेरी ओर खिसका रहीं थीं. हर रोज़ एक नया चैलेंज.

उस दिन सोमवार था. सुबह सुबह एक कम उम्र की युवती , कीर्ति दिखाने आई. अपनी अठारह वर्ष की उम्र से कहीं कम वह नज़र आई. रंग एकदम पीला. कृशकाय देह. चेहरे पर गहरी उदासी और हताशा. उसके साथ उसकी भाभी उसे दिखाने आईं थीं. भाभी गहने , साड़ी आदि से समृद्ध नज़र आईं. जैसे ही वह बोलने लगी उसके पति व देवर ने मेरा दरवाज़ा ठेलकर अन्दर पदार्पण किया. दोनों ही हट्टे कट्टे व वाचाल. बड़ा भाई उसकी भाभी का पति था. नाम था उमेश सिंह. छोटा भाई अविवाहित रहा होगा. उसने अपना नाम गणेश सिंह बताया.

समस्या यह थी कि कीर्ति का रक्तस्त्राव बंद नहीं हो रहा था. उसे तेज बुखार था. ऐसा लगता था कि वह ठीक से खा पी नहीं रही थी. भाभी ने दबी जुबान से कहा की वह व्यर्थ में घुली जाती है.

कीर्ति आने के दस मिनट बाद ही बेहोश हो गयी. मुझे ऐसा लगा कि गणेश सिंह के अन्दर आते ही उसने आँखें बंद कर लीं और एक ओर को लुढ़क गयी. उस दिन केवल नाम पता आदि फार्म पर भरवा कर मैंने उसे भर्ती कर लिया. बड़ा भाई आदेश देता हुआ बोला आप लोग जांच कर लीजिये हम लंच के बाद फिर आवेंगे. मुझे उसका रौब मारना जरा भी अच्छा नहीं लगा. मैंने नम्रता से समझाया कि
पूरी जांच करने में काफी समय लग सकता है. इसके अलावा लंच टाइम तो सभी का लंच टाइम है.

” हाँ हाँ आप लोग सरकारी प्यादे ठहरे. लंच में क्यों काम करने लगे. अभी प्राइवेट अस्पताल हो तो तुरत -फुरत भाग दौड़ करेंगे. पैसा जो चाहिए. इहाँ तो बाप का माल है. महीने पीछे तनखाह तो मिलबे करी. ”
यह छोटा भाई चमक कर बोला.
भाभी जी ने घूंघट कुछ और नीचे घसीट लिया. मैं उसकी इस बदतमीजी को सह नहीं सकी. फिर भी स्वर को संयत करके कहा , ” जांच मैं अकेले नहीं करूंगी. केवल मेरी अपनी बात होती तो मैं हाथ के हाथ रिपोर्ट दे देती. विभाग के बाकी लोग भी व्यस्त हैं. बारी आने पर ही आपकी बहन को देख पायेंगे. आप ज़रा धीरज रखें. ”
” अरे काहे का धीरज ? मरीज मरता रहे ,आप लोग छक के भोजन करिए. मुफ्त की मिठाई समोसा उड़ईये अउर का ! ”
कहकर उसने पिच्च से पान की पीक आग बुझाने वाली रेत की बाल्टी में थूक दी. बाहर जुलाई की गर्मी ,ऊपर से सांवली मांसल देह पसीने से तर बतर ; खुले बटन बुश्शर्ट ,पान रंगे होंठ ,काले काले दांत ,मूंछें और तेल चपोड़े बालों से चुहचुहाता पसीना. तिस पर सोने की मोटी चैन ‘सोने का सिक्खों वाला कड़ा और मर्सिडीस बेंज के मैडल जैसे डिजाईन की अंगूठी. मुझे अन्दर से वितृष्णा होने लगी. बहस ना करने के इरादे से मैंने बेचारगी से कहा, ” ठीक है तो आप इन्हें प्राइवेट में दिखा लीजिये. ”
बड़ा भाई समझौते के स्वर में उससे बोला, ” काहे ताव खा रहे हो गनेसी. इतनी गर्मी में बेचारी कीर्ति को इहाँ उहाँ दौड़हियो का ? ठीक है डाक्टरनी जी आप अपना काम कीजिये. ये व्रत उपास बहुते करती हैं. ऱोज सुबह शाम मंदिर जाती हैं. कमजोरी बढती जाती है पर बात नहीं सुनतीं. ”
मैंने उसे भर्ती कर लिया. वज़न ,खून , पेशाब , ब्लड प्रेशर आदि की जांच की. हाथ के हाथ खून टेस्ट करवाया. लाल रक्तकोष बेहद कम निकले. लड़की को सख्त एनीमिया था.तुरन्त इलाज ना करने से दिल को खतरा था. करीब चार बजे शाम को मैंने उसकी भाभी को अन्दर बुलवाया बात समझाने के लिए. पर छोटा भाई भी धसक कर अन्दर आ गया. दोनों बाँहें बगलों में बांधकर रौब से बोला — ” हाँ बताईये क्या मिला एक्सरे में. ”
मैंने उसकी उपेक्षा करते हुए उसकी भाभी से कहा, ” हम अभी कोइ अंदरूनी जांच नहीं कर सकते जबतक इनका ब्लड प्रेशर सामान्य नहीं हो जाता. खून की अत्यधिक कमी के कारन यह बेहद कमजोर हैं. खून चढ़ाया जाएगा. दो से चार बोतल खून चढ़ाना पड़ेगा.”
” तो चढ़ाइए. जौन खर्च आवेगा देंगे न. ” छोटे भाई ने धौंस के साथ कहा.
” इस अस्पताल में खून के बदले खून दिया जाता है. आप अपना खून दीजिये या इनके मैचिंग का खून बाहर से खरीदिये. ”
” अब बाहर कहाँ हम जावेंगे ? अस्पताल में ही रक्तकोष है न. उसी में से चढ़ाइए. हम पैसा देवेंगे कहा ना. ”
मेरी बात उस जाहिल के पल्ले नहीं पडी. अतः मैंने कीर्ति की भाभी को अन्दर ले जाकर रक्तकोष के नियम समझा दिए. वह सर झुकाए हाँ हाँ करती रही और चली गयी. कीर्ति को बुखार था. बुखार को नीचे लाना था अतः उपचार तो मैंने शुरू कर ही दिया था. रात को बड़े भाई और भाभी खाना आदि लेकर आये. कीर्ति बड़ी मुश्किल से संतरे का जूस पी पाई. भाभी बड़े स्नेह से उसकी सेवा कर रही थी. अभी तक उसके मुंह से बोल नहीं फूटा था. कीर्ति से बात करते समय भी वह इतने धीमे बतिया रही थी कि कान सुने और नाक न सुने. मैंने नर्स के माध्यम से पुछवाया कि उसने अपने पति को सब समझा दिया कि नहीं. उसके पति ने वार्ड में चिल्ला चिल्लाकर सबके सामने अस्पताल वालों की छीछालेदर की. खुल्लम-खुल्ला दोष लगाया कि हम लोग चोरी से रक्त बेचते हैं. चार बोतल मंगवाते हैं और एक चढ़ाते हैं. सब जनता का खून दिन दहाड़े चूसा जा रहा है. नई नई बित्ता – भर की छोकरियाँ आ जाती हैं , टर -टर अंग्रेजी में क़ानून छाँटने. ना तमीज ना बात. फिर पीक भरे मुंह से बोला
” हमरे बाबूजी जब गए रहे दिल्ली में , इलाज चला पिरैवट में ‘कौनों बियाधी नाहीं. बस अंत में एक चैक लिख कर दिए और शव छुडवा कर आई गए. ई तमाम झिक झिक लगाए हैं सुबह से. ये लाओ, वो लाओ. दस ठो चक्कर लगाय चुके हैं. अब इहाँ से चालीस मील पर गाँव ठहरा. कौनो आसान बात है ? बताईये ? ”
मैं अपने ऑफिस में बैठी सब सुन रही थी. सरकारी अस्पतालों का सभी सामान इतना घिस चुका होता है कि कोइ भी अच्छे घर का व्यक्ति उसे इस्तेमाल करना नहीं चाहता है. अक्सर लोग अपना नया खरीद लेते हैं और बच जाने पर दान भी कर देते हैं. ये साहब एक भी पैसा खर्चना नहीं चाहते थे हालांकि उनकी सांस से देसी शराब की बू आ रही थी. सरकारी माने मुफ्त. समर्थ हैं तो भी आनाकानी. चलिए यह भी माना. मगर रक्त जैसी चीज़ का क्या किया जाय. वह सरकारी कोष से नहीं आती. मैंने नर्स के माध्यम से कहलवाया कि किसी अच्छे रक्तकोष से पता कीजिये. वहां अक्सर रक्तदान करनेवाले घूमते रहते हैं. वह किसी को पैसा देकर ला सकते थे.
जैसे तैसे पहला दिन ख़तम हुआ. अगले दिन शारदा मैम्म ने चेक – अप किया. सब कुछ कल से आज बेहतर था. कीर्ति कुछ मुस्कुराई भी. सुबह फल भी खाया. कमजोरी के कारण उसकी भूख मर गयी थी. मैंने प्यार से पूछा कि क्या कोइ ऐसी समस्या है जो वह मुझको सुनाकर हल्का होना चाहेगी । वह शर्मा गयी और मुंह घुमा कर आँखें बंद कर लीं. धीरे धीरे नींद ने उसे आ घेरा.
सारा दिन बिताकर शाम को छोटा भाई फिर आ धमका. फिर उसने बहस करी और दो बोतल खून के पैसे निकालकर बढाए. आँखें लाल पीली करके ,ऊंची आवाज़ में वह मुझे व्यक्तिगत रूप से लांछित करने लगा.
” आप बड़ी बददिमाग हैं. आपको जीवन का कोइ तजुर्बा नहीं है. केवल किताबें चाट लेने से डाक्टर नहीं बना जा सकता. अगर हमारी बहन को कुछ हो गया तो आपको तो मैं हरगिज़ नहीं छोडूंगा. आप ही के कारन उसके प्राण जायेंगे. आप सफा सफा अपनी जीभ का पास रखने के लिए अड़ियल टैटू की तरह अड़ गयी हैं. मैं अखबार में सब छपवाऊंगा. आप होती कौन हैं मना करनेवाली. ”
हालाँकि मैं इस दैत्य के मुंह नहीं लगना चाहती थी फिर भी इतना सब क्यों सहती.
मैंने कहा , ” ऐसा है , अगर आपको अपनी बहन मरनेवाली लगती है और आप उसे हर हालत में बचाना चाहते हैं तो सीधी तरकीब है. आप अपना खून दे दीजिये। बात दो मिनट में सुलझ जायेगी. ”
” मुझे आपसे बात नहीं करनी है. आप सीधे से बड़ी डाक्टरनी को बुलाइये. ”
उसकी दहाड़ सुनकर डाक्टर करकरे बाहर आ गईं. अपने सुपरिचित शांत स्वर में उन्होंने कहा ,” सुनिए आप एक टैक्सी ले आइये. हम तब तक मरीज़ को डिस्चार्ज करते हैं. हमें दस मिनट लगेंगे आपका हीसाब बनाने में. अब जाइये. ” कहकर वह उलटे पाँव अपने कमरे में लौट गईं. उनके इशारे पर मैं भी उनके पीछे पीछे अन्दर आ गयी.
गणेश सिंह बक – झक करता रहा. मगर जब उसने अन्य उपस्थित लोगों की आँखों में उपेक्षा और उपहास देखा तो वह चला गया. बिना साइलेंसर लगाए उसका स्कूटर गगनभेदी शोर गुंजाता , पूरी बिल्डिंग की छाती धड्काता ,अस्पताल के परिसर का पूरा चक्कर काटकर बड़ी सड़क पर ओझल हो गया. ‘ थोथा चना बाजे घना ‘.
उस शाम परिचितों से मिलने के समय में उसका बड़ा भाई और भाभी फिर आये. कीर्ति की हालत पहले से अच्छी थी पर उसकी कमजोरी इतनी अधिक थी कि वह सिर्फ पांच सात मिनट तक आँखें खोल पति थी. मैंने बड़े भाई को बहुत समझा कर सुबह वाला किस्सा बताया और पूछा कि यदि आप लोगों ने प्राइवेट में दिखाने का इंतजाम कर लिया है तो हम लोग रात में ही मरीज़ को ट्रांसफर करना पसंद करेंगे. क्योंकि उसकी हालत को देखते हुए और देर इन्तजार करना खतरे से खाली न होगा. हालाँकि उसके अत्यधिक रक्तस्त्राव को हमने काबू कर लिया था मगर यह बात उसके भाई को बताकर हम उसे निश्चिन्त नहीं करना चाहते थे.
भाई शर्मिन्दा तो थे ही. कुछ अटकते हुए बोले , ” रातभर और इन्तजार कर लीजिये. कल दोपहर तक हमारा आदमी गाँव से आ जावेगा खून देने. बुलवाए हैं. फिकर की बात नहीं है. आप लोग जबरदस्ती किये हैं वरना दुई चार बोतल खून का मायने रखता है. ”
” नहीं हमने तो पहले ही कहा था कि आप खरीद लाइए चार बोतल. हम वह खून कोष में जमा कर लेंगे. और आपके मतलब का कोष में से दे देंगे. बात वाही पड़ेगी. इसमे इतना पेंच क्या है ?पर आपने कोशिश ही नहीं की. ”
” ऊ सबके वजह रहा. असल में हम बहुत व्यस्त रहे ई दुई दिन अऊर गनेसी पे छोड़ दिए. ऊ तो आप देखे रहीं कैसे रंग देखात हैं. चलिए कल तक इंतजाम हो जावेगा. गनेसी गए हैं मनई को लिवा लाने. ”
मैं आश्वस्त होकर आगे बढ़ गयी. पांच मिनट बाद कीर्ति की भाभी मेरे पीछे जल्दी जल्दी भागी आई. ” डाक्टर साब ज़रा सुनिए. ऊ पिसाब करने बाहर गए हैं तो हम आपसे कहने आईं हैं चोरी से. बात ये है कि आप किसी को बताइयेगा नहीं. ”
” हाँ हाँ. तुम बेखटके बोलो ”.
” नहीं इहाँ नहीं. आप तनिक अन्दर चलिए. ”
मैं उसे अपने ऑफिस में ले गयी. वह बेहद घबराई हुई थी. मैंने पानी पिलाया. आश्वस्त होकर वह अटक अटक कर बोली.
” जो मनई हमरे देवर लिवाय गए हैं गाँव से ,ऊ हमरे पिताजी हैं. उन्हें तो पता ही नहीं है. यह लोग तय किये हैं कि इमरजेंसी कहकर उन्हें स्कूटर पर बिठाकर ले आया जाय. कहें कि बिटिया मरनेवाली हैं. जब वह आ जायँ तब उनका खून दिलवाय देंगे. अगर राजी न हों तो हमका मइके पठाय देवेंगे. बहिनजी ई लोग महा लुच्चा लोग हैं. बड़ी मुस्किल से हमरे पिताजी हमरा गौना कराये. पाँच बरस से बियाह कराय के छोड़ दिए थे. हर बरस वार – त्यौहार दै – दै के हमरे पिताजी तंग आ गए रहे. हर बरस गौना कराने के नाम नाठ जावें. तब एक लाख रकम पर गौना कराये. — अब फिर से उन्हीं के गले में फंदा डाले गए हैं. ”
कहते कहते उसकी आँखें डबडबा आईं. फिर बोली , ” बहिन जी , दीदी के ससुराल से रोज आदमी आता है. हमरे ससुर बेटी के नाम से अलग से पैसा धेला जमा करा गए थे मरने से पहले. ऊ सब गनेसी बिजनस में लगा दिए कहते हैं. दीदी के ‘ वो ‘ चोरी छुपे खेत बजार में मिलने आते हैं. जवान देह ठहरी.. कल को कोइ ऊँच नीच हो जावेगी तो कौन मुंह दिखावेंगे. हम अपने पति को समझाए. कहा की एक लाख रुपिया लिए हो तो बहिन का बिदा कराय दो ,सो बस हमका पीट दिहिन. और जुबान बंद रखे को बोला.
हमको धौंसिया दिए कि लाख रुपैया के गुरूर करती है स्साली. इहाँ चार चार लाख वाले लैन लगाय खड़े हैं. गटई काट के गंगा जी में बोर देब बहुत चपर – चपर किये तो. सो हम का बोलीं बहिनजी. ”
भाभीजी को चुप कराके दूसरे दरवाज़े से निकाल दिया मैंने. कारण उधर बड़ा भाई वापिस आकर बहन के सिरहाने कुर्सी पर बैठा था. भाभी दो चार मिनट बाद बाहर से टहलती हुई आईं और उनसे बोलीं कि हम तो आपको बहार ढूँढने गए रहे. यहाँ बैठकर क्या कीजिएगा दीदी तो सो रही हैं. वह भी उकता रहे थे.
‘हां हां तो चलते हैं। एक बार डाक्टरनी आ जायें।’
मैंने भी समय नहीं गंवाया। टहलते-टहलते फिर सामने से गुजरी।
‘हम लोग चलते हैं अब डाॅ साहब! कल फिर हाजिर होंगे।’
‘हां ठीक है। मगर जरा दो बातों का ख्याल रखियेगा। हम लोग अठारह साल से नीचे और पचास वर्ष से ऊपर के व्यक्ति का खून नहीं ले सकते। साथ ही खून देने वाले को टी.बी. का टीका लगा होना चाहिए। सुनकर भाई साहब का चेहरा फक्क हो गया। कमजोर स्वर में ‘हां आं…’ निकला उनके मुंह से और वह चले गये।
अगली सुबह एकांत में मैंने सारी कहानी डाॅ करकरे को सुनाई। सुनकर वह विचलित हो उठीं। घबराकर बोली, ‘अभी फौरन कीर्ति की अंदरूनी जांच करो। मुझे शक था पहले से ही। मामला संगीन है। यह माहवारी का बिगड़ा हुआ चक्र नहीं है। लड़की जान से जाएगी। तुम अभी नई हो जानती हो क्या हुआ है?’
‘नहीं!’ केस मेरा था, मैं घबरा गयी।
डाॅ करकरे बोलीं- ‘ये लड़की अपने पति से मिलती रही है। दोनों में शारीरिक सम्बंध बन गये जिसके परिणाम स्वरूप यह पेट से रह गई। लगता है वही इसे किसी दाई-वाई के पास गर्भ गिरवाने ले गया। यह बुरी तरह अंदर से जख्मी हो सकती है। इसे स्ट्रेचर पर डालो और बेहोश करने का इंतजाम करो। इसके घरवालों को बाद में देख लेंगे। चिंता में घुली जा रही है, तभी खाना नहीं खा रही।’
कीर्ति को आॅपरेशन थियेटर में ले गये। डाॅ करकरे की पहचान शत प्रतिशत सही निकली। कीर्ति ने किसी दाई से गर्भ नष्ट करवाया था। गर्भ गिराने के बाद दाई ने अपने अनभ्यस्त हाथों से एक गर्भ निरोधक काॅइल उसके कच्चे गर्भाशय में फिट कर दी, ताकि भविष्य में एहतियात रहे। अपने को सुरक्षित समझकर वह पति से मिलती रही। काॅइल खिसककर नीचे लटक आया जिससे गर्भाशय का मुंह बन्द नहीं हो पा रहा था। अतः उसका रक्तस्राव माहवारी की तरह निरंतर जारी रहा। तीन चार महीने से वह इसी तरह निभा रही थी। यह सब चीर-फाड़ दाई ने बिना बेहोश किये करी थी, अतः कीर्ति जिस अमानवीय वेदना से तड़पी होगी उसकी कल्पना करने से भी मुझे झुरझुरी आ गई।
हमने तय किया कि कीर्ति का राज राज ही रखा जाये। दोनों भाई मतलबी और संवेदनाहीन थे। भाभी की कोई सुनने वाला नहीं। मां पदच्युत विधवा, उपेक्षित व लाचार। बेटी की क्या रक्षा कर पाती। घर की इज्जत के नाम पर उसे होम कर देते। कीर्ति खतरे में थी।
अगले दिन ग्यारह बजे दोनों भाई एक वृद्ध को लेकर आ धमके। मैंने देखते ही समझ लिया कि यह भाभी के पिताजी हैं। खून लेने वाले डाॅक्टर ने उन्हंें देखते ही वापस जाने के लिए कहा।
मैंने भाई को सख्त स्वर में बताया कि कीर्ति को इमरजेंसी में ले जाना पड़ा। अगर अब भी वे आनाकानी करेंगे तो सब सबूत मौजूद हैं। उन पर जानबूझकर अपनी बहन को मौत के मुंह में धकेलने का अभियोग लगाकर उनको पुलिस में दे देना पड़ेगा। अपनी शादी की कामना से अत्यधिक घोर उपवास आदि करना धर्म की आड़ में अनशन करना साबित होगा कानून के हिसाब से और जबरदस्ती उसकी शादी रोकना भी गुनाह साबित हो जाएगा।
छोटा भाई तो स्कूटर के पैडल पर एड़ मारकर वैसे ही धड़धड़ाता हुआ उड़नछू हो गया। पर बड़े भाई ने डरते डरते खून देना स्वीकार कर लिया।
दो दिन बाद डिस्चार्ज करते समय डाॅ. करकरे ने उसे बताया- ‘देखिये आपकी बहिन को ऐसे तो कोई रोग नहीं है, पर उसे माहवारी जल्दी-जल्दी होती है। एक बार का रक्तस्राव बंद नहीं होता कि अगला शुरू हो जाता है। अक्सर जवान लड़कियों के साथ ऐसा होता है। शादी के बाद बाल-बच्चे होने से यह हिसाब अपने आप ठीक बैठ जाता है।’
वह बोला- ‘हां, हम भी यही सोच रहे हैं कि चौमासा खत्म होते ही गौना कर देंगे। हमारे यहां शादी तो चौदह-पन्द्रह में हुइऐ जात है। इनकी भी हो चुकी है।’
मैंने चैन की सांस ली।

परिचय - कादम्बरी मेहरा

नाम :-- कादम्बरी मेहरा जन्मस्थान :-- दिल्ली शिक्षा :-- एम् . ए . अंग्रेजी साहित्य १९६५ , पी जी सी ई लन्दन , स्नातक गणित लन्दन भाषाज्ञान :-- हिंदी , अंग्रेजी एवं पंजाबी बोली कार्यक्षेत्र ;-- अध्यापन मुख्य धारा , सेकेंडरी एवं प्रारम्भिक , ३० वर्ष , लन्दन कृतियाँ :-- कुछ जग की ( कहानी संग्रह ) २००२ स्टार प्रकाशन .हिंद पॉकेट बुक्स , दरियागंज , नई दिल्ली पथ के फूल ( कहानी संग्रह ) २००९ सामायिक प्रकाशन , जठ्वाडा , दरियागंज , नई दिल्ली ( सम्प्रति म ० सायाजी विश्वविद्यालय द्वारा हिंदी एम् . ए . के पाठ्यक्रम में निर्धारित ) रंगों के उस पार ( कहानी संग्रह ) २०१० मनसा प्रकाशन , गोमती नगर , लखनऊ सम्मान :-- एक्सेल्नेट , कानपूर द्वारा सम्मानित २००५ भारतेंदु हरिश्चंद्र सम्मान हिंदी संस्थान लखनऊ २००९ पद्मानंद साहित्य सम्मान ,२०१० , कथा यूं के , लन्दन अखिल भारत वैचारिक क्रान्ति मंच सम्मान २०११ लखनऊ संपर्क :-- ३५ द. एवेन्यू , चीम , सरे , यूं . के . एस एम् २ ७ क्यू ए मैं बचपन से ही लेखन में अच्छी थी। एक कहानी '' आज ''नामक अखबार बनारस से छपी थी। परन्तु उसे कोई सराहना घरवालों से नहीं मिली। पढ़ाई पर जोर देने के लिए कहा गया। अध्यापिकाओं के कहने पर स्कूल की वार्षिक पत्रिकाओं से आगे नहीं बढ़ पाई। आगे का जीवन शुद्ध भारतीय गृहणी का चरित्र निभाते बीता। लंदन आने पर अध्यापन की नौकरी की। अवकाश ग्रहण करने के बाद कलम से दोस्ती कर ली। जीवन की सभी बटोर समेट ,खट्टे मीठे अनुभव ,अध्ययन ,रुचियाँ आदि कलम के कन्धों पर डालकर मैंने अपनी दिशा पकड़ ली। संसार में रहते हुए भी मैं एक यायावर से अधिक कुछ नहीं। लेखन मेरा समय बिताने का आधार है। कोई भी प्रबुद्ध श्रोता मिल जाए तो मुझे लेखन के माध्यम से अपनी बात सुनाना अच्छा लगता है। मेरी चार किताबें छपने का इन्तजार कर रही हैं। ई मेल kadamehra@gmail.com