आरक्षण पर यक्षदेव की चिन्ता

महाभारत वर्णित जलाशय के पास से गुजरते हुए मेरे भीतर अचानक धर्मराज युद्धिष्ठिर की आत्मा बरबस घुस गई I

यक्ष महाराज ने धर्मराज युद्धिष्ठिर से पुछा – भारत में आरक्षण के विषय में तुम्हारा चिन्तन क्या कहता है ? इसे समाप्त किया जाना चाहिए अथवा नहीं ?

युद्धिष्ठिर – मेरी दृष्टि में सबसे पहले तो एक विश्वसनीय आकलन करवाया जाए कि अभी तक आरक्षण से कितने लोगों ने लाभ उठाया है और वे कितने परिवारों से सम्बद्ध हैं ?

यक्ष महाराज  – अच्छा-अच्छा, इससे यह पता चलेगा कि अनुसूचित जाति और जनजाति के सार्वजनिन हित की सुविधा कहीं “परिवार केन्द्रित” तो नहीं बन चुकी है I इसके अतिरिक्त क्या किया जाए I

युद्धिष्ठिर – आइन्दा से आरक्षण का लाभ हर हालातों मे नए परिवारों के एक एक व्यक्ति को ही मिले, इसका सख्ती से पालन हो I जहां तक शिक्षा में आरक्षण का प्रश्न है, जिन विद्यार्थियों का मेडिकल, इंजीनियरिंग आदि उच्च शिक्षा के क्षेत्रों में आरक्षण के माध्यम से चयन होगा, उन्हें एक वर्ष तक विशेष कोचिंग के माध्यम से अन्य विद्यार्थियों के समकक्ष लाने के लिए तैयार किया जाए ताकि आगे की पढ़ाई वे पूर्ण आत्मविश्वास के साथ कर सकें I

यक्ष महाराज  – इस तरह तो उनका एक वर्ष वेस्ट हो जाएगा I

युद्धिष्ठिर – नहीं, यक्षदेव यह इन्वेस्टमेंट होगा I उनमें एक विशिष्ट प्रकार के आत्मगौरव का संचार होगा I उन्हें बाद में न तो आगे की पढ़ाई के लिए और न ही नौकरी में आरक्षण नामक वैसाखी की आवश्यकता महसूस होगी I

यक्ष महाराज  – आपका कथन सत्य है, तात I

युद्धिष्ठिर – इसके अतिरिक्त जिन लोगों ने आरक्षण का लाभ उठाया है और जिनकी आय 10 लाख रुपए सालाना या अधिक है, उनसे अपने बंधू बांधवों के उन्नयन हेतु समय और धन देने की अपील की जाए I कम से कम दस हजार सालाना मदद अवश्य ली जाए, अधिक देने वालों का सम्मान किया जाए I इस धन का उपयोग अनुसूचित जाति और जनजाति के बच्चों को विशेष कोचिंग और सुविधाएं देने हेतु किया जाए I

यक्ष महाराज  – निश्चित रूप से आपका यह सुझाव समरसता की दृष्टि से एक नई क्रान्ति का सूत्रपात कर सकता है I

युद्धिष्ठिर – इसके अलावा देश के उन सभी गांवों में कम से कम तीन कक्षों के स्कूलों का तुरन्त निर्माण करवाया जाए, जहां पहले से स्कूल नहीं हैं I इसके लिए प्रधानमंत्रीजी टाटा, बिरला, अडानी, अम्बानी, स्थानीय बिल्डरों, जैसे धनाढ्यों से आव्हान कर सकते हैं I इसके अतिरिक्त बड़े-बड़े साधू-संतों, दानदाताओं, समाजसेवियों, धन्ना सेठों, सामाजिक और धार्मिक संगठनों तथा निर्माताओं से भी आव्हान किया जा सकता है I उक्त सभी के सहयोग से बिना शासकीय औपचारिकताओं के ही ग्राम भारती की तर्ज पर प्रारम्भिक रूप से एकल स्कूल तुरन्त शुरू किए जा सकते हैं I एक दो सालों बाद सरकारी व्यवस्था के तहत पढ़ाई का बंदोबस्त किय जा सकता है I

यक्ष महाराज  – इससे तो केवल साक्षरता का प्रतिशत बढ़ेगा, इसका आरक्षण से क्या नाता है ?

युद्धिष्ठिर – यक्षदेव, पूरी बात तो सुनिए I

यक्ष महाराज  – क्षमा करें  धर्मराज, चलिए पूरी बात बता ही दीजिए I

युद्धिष्ठिर – इस सारी कवायद से देश के सभी बच्चों के लिए शिक्षा अनिवार्य की जा सकेगी, स्वाभाविक रूप से अनुसूचित जाति और जनजाति के सभी बच्चों को भी शिक्षा का लाभ मिलेगा I इसके अलावा आवश्यकता पड़ने पर अनुसूचित जाति और जनजाति के बच्चों के लिए विशेष कोचिंग की व्यवस्था की जा सकती है ताकि उन्हें सवर्णों के समकक्ष लाने की प्रामाणिक कोशिशों को साकार किया जा सके I

यक्ष महाराज  – भला ऐसा करने से क्या होगा ?

युद्धिष्ठिर – मनोविज्ञान का एक अकाट्य तथ्य है कि व्यक्ति के अवचेतन में यह बात सदैव विराजमान रहती है कि वह किसी वैसाखी के बलबूते इस मक़ाम तक पहुंचा है, इससे उसमें उस आत्मविश्वास का संचार नहीं हो पाता है, जो उस पद के लिए जरूरी होता है I जबकि अपने बलबूते पर आगे आए बच्चें पूरे जोश खरोश के साथ समाज में समरसता की अलख जगाने में सक्षम होंगे I

यक्ष महाराज  – सत्य वचन तात I आपके कथन का सीधा सा अर्थ यही है न कि उन्हें आरक्षण की जरूरत ही नहीं पड़ेगी I

युद्धिष्ठिर – कुछ सालों बाद आरक्षण को जारी रखने अथवा नहीं रखने पर विचार किया जा सकता है I

यक्ष महाराज – युद्धिष्ठिर, वास्तव में तुम पांडू कुल के रत्न हो I

अचानक सम्पूर्ण परिदृश्य अन्तरिक्ष में विलीन हो गया और मेरी नीन्द टूट चुकी थी I

डॉ.मनोहर भण्डारी