धुंध और धूप का रिश्ता

धुंध और धूप का रिश्ता विचित्र है
दोनों शब्द ‘ध’ वर्ण से सृजित हैं
यद्यपि दोनों का कोई मेल नहीं है
फिर भी वे मानो मित्र हैं.

 
धुंध को अपना जलवा बिखेरने देने के लिए
धूप तनिक विनम्र हो जाती है
धूप को अपने शबाब पर आने देने के लिए
धुंध रास्ता देती जाती है.

 
धुंध शिष्य है, तो धूप गुरु है
धुंध अंत है, तो धूप शुरु है
धुंध को देखकर विश्वास होता है धूप ज़रूर आएगी
धुंध सिकंदर है, तो धूप पुरु है.

 
धुंध अज्ञान है, धूप है ज्ञान,
धुंध छंटे तो चमके भान,
शनैः-शनैः गुरु धुंध-अज्ञान हटाकर
बढ़ाए शिष्य का मान-सम्मान.

 
खिड़की के शीशे या स्विमिंग पूल की ग्रिल पर
चांदी की तरह चमकती धुंध बताती है
चांदनी धुंध में नहाई है
ओस-कणों को मोती की तरह चमकाती हुई धूप दर्शाती है
आने वाली बेला भी सुहानी है.

 
धुंध से न घबराने वाले
धूप में भी सुख के सुरूर को पा जाते हैं
धूप से न घबराने वाले
धुंध में भी सुकून के सुमन खिला जाते हैं.

 
धुंध और धूप का रिश्ता विचित्र है
दोनों ‘ध’ वर्ण से निःसृत हैं
यद्यपि दोनों का रास्ता एक नहीं है
फिर भी वे मानो मित्र हैं.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।