कहानी

कहानी : कदली के फूल

वो खुद को बहुत संतुष्ट और एडवांस समझती ही नहीं,भाव-भंगिमा से व्यक्त भी करती रहती थीं ! अलका दी,सबसे बेबाक होकर मिलना,हर विषय पर एक्सपर्ट कमेन्ट देना और क्या मायका,क्या ससुराल यहाँ तक कि पडौसियों की भी कमियां निकलती रहती,लगता जैसे परनिंदा में उन्हें अपार सुख मिलता था !
अपने बचपन का बताने बैठतीं तो,” माँ ने तो मुझसे इतना बालश्रम कराया कि पूछो मत!उनके,सभी काम,छोटे भाई-बहनों को सँभालने से लेकर,खाना बनाना,उनके नवजात बच्चे के पोतड़े बदलना-धोना ..बचपन तो मैंने जिया ही नहीं !”उनकी बातें सुनकर अविश्वास होने के बावजूद उनसे सहानुभूति होती मुझे !
अलका दी की कई औलादें हुईं पर जीवित केवल एक बेटी ही रही,जिसे उन्होंने भरपूर स्वतंत्रता दी,” मैं जैसे पिसती रही और बचपन का स्वाद नहीं चखा वैसे इसे भट्टी में नहीं झोंकने वाली मैं,खूब पढ़ाऊंगी,लिखाउंगी और रसोई में तो हरगिज़ नहीं …” लिहाज़ा बेटी क्यों जाने लगी रसोई में ? पढलिख भी गयी और अच्छी नौकरी भी करने लगी ! अब सवाल जब बेटी की शादी का आया तो सारे अधिकार बेटी को दे दिए !
ना जाने कितने रिश्ते आये,आपस में बात करते वक़्त लड़की के मुह से सुनते ही,” एक ही शर्त पर शादी कर सकती हूँ कि मैं रसोई में नहीं जाउंगी !” हर लड़का बिदक जाता सोचकर कि आजके समय में जब लड़के भी किसी काम से नहीं संकोच करते तो भला ऐसी लड़की ? ना रूप ना रंग उसपर ऐसे ढंग ?….इसी तरह बिटिया हो गयी 40की और रिश्ते आने बंद।
लेकिन भूख तो भूख है चाहे पेट की हो या देह की।
देह की भूख ने तलाश लिया अपना खाना।
भले ही वह डिब्बा बंद खाना था लेकिन…
जैसा कि कहा गया है कि इश्क और मुश्क छुपाये नही छुपते।तिस पर नाजायज।
समाज कितना ही एडवांस क्यो न हो जाये,  लेकिन बिना शादी “लिव इन रिलेशन” को मान्यता न भारतीय समाज में मिली है न शायद मिलेगी।
अलका दीदी को क्या सारी काॅलोनी को भनक लग गयी थी बेटी के नाजायज सम्बन्धों की।लेकिन अब पछताये होत क्या जब चिडिया चुग गयी खेत।अलका दीदी तो बिटिया को पाश्चात्य सभ्यता का रंग चढा चुकी थी।अब तक बिटिया हाथी के दांत के समान अपनी सीमाओ का अतिक्रमण कर चुकी थी।
अलका दीदी दिल पर पत्थर रख कर भी,मन ही मन कुढ़ कर भी,
बिटिया का यह रूप सह रही थी ।वह रोज ईश्वर से मन ही मन प्रार्थना करती कि ईश्वर उन्हे इस दुनियां से उठा ले ।लेकिन किस्मत को तो कुछ और ही मंजूर था ।
बिटिया का अमान्य रिश्ता घर की देहलीज तक पहुंच गया और …
नाजायज सम्बन्धो की महक तो हवा के परो पर सवार  सबकी बाचतीच का अभिन्न हिस्सा हो गयी !
……..सब ठीक चल रहा था और ना जाने कितने दिन चलता अगर बेटी के बॉयफ्रेंड को ब्रेन स्ट्रोक ना पड़ता !बिटिया ऑफिस के काम से शहर से बाहर गयी थी सो रिश्ते के भाई-बहन की मदद लेनी ही पड़ी,घर की बात अब घर से बाहर खुल कर आ चुकी थी !दीदी की आवाज की खनक अब कुछ नरम हो चली थी,खबर मिलते ही बेटी भी आ गयी ! बेटी की नज़रों में नहीं किन्तु दीदी की नज़रों में  अपराधबोध  झलकने लगा लेकिन जल्द ही उन्होंने भावनाओं पर काबू पा लिया !
दीदी के घर का स्वामित्व धीरे धीरे पहले बेटी और फिर उसके माँसाहारी
बॉयफ्रेंड के परिवार के हाथों में जा चुका था। सदा स्वतंत्रता का पाठ पढाने वाली और बेटी को भी वही शिक्षा देने वाली,शुद्ध शाकाहारी  दीदी अब विवश थी,मांस-मच्छी पकती तो उन्हें मितली आती और वह अपना उपवास बता खाना नहीं खातीं,पर धीरे धीरे उसकी भी आदत डालनी पड़ी ! यह अलग बात है कि वो अक्सर गुनगुनाते हुए दिखाई देने की चेष्टा करती थीं लेकिन उनका असामान्य होता व्यवहार किसी की नज़र से शायद ही छुप सका हो !
बेटी और तथाकथित उसके साथी के  होते हुए भी दीदी की सूनी आँखे हरदम ख़ुशी तलाशती रहती ।कहने को वो  खुश थीं ,खुद को बूढा भी अनुभव नहीं करतीं  पर चेहरे पर पड़ती सिलवटें आवाज़ की डूबती खनक से भला क्या सच्चाई छुप सकती थी
उनकी सोच कुछ भी रही हो,मैं बदल तो नहीं सकती थी,पर चिंता अपने दोनों बेटों के बारे में ज्यादा थी जो पूरी तरह से अपनी बुआ और उनकी बेटी के विचारों से प्रभावित थे ! जब बड़े बेटे ने बातों ही बातों में एक दिन मुझसे पूछा,”शादी करना जरुरी है क्या ?”

“बिलकुल जरुरी है बेटे,एक उम्र के बाद अपना सुख-दुःख बांटने के लिए शादी तो करनी ही पड़ती है,माता पिता कब तक जिंदा रह पाते किसी के !”वही रटा रटाया वाक्य मैंने उछाल दिया बेटे पर जो कभी खुद अपनी माँ से यही प्रश्न के उत्तर में मुझे कहा गया था !भूल ही गयी कि आज के युवाओं की सोच बिलकुल बदल गयी है,वो अपनी बात रखना ही नहीं,उसे मनवाना भी जानते हैं !
“पर माँ,दीदी तो बिना शादी के रह रही हैं ना…”
उसका वाक्य पूरा हो उसके पहले ही मेरे तेवर बदल गए थे,” बेटे यह तो तुम सोचना भी मत ! क्या जरुरी है कि दीदी जो करें वो हमेशा सही हो और तुम भी ठीक वैसा ही करो ?”
बेटे को अमेरिका जाना था,शायद सोचा होगा अभी ज्यादा बहस करने से उसे अमेरिका जाने की भी अनुमति मिले ना मिले,अभी चुप रहने में ही भलाई है और शादी में अभी बहुत वक़्त है ना !
बात आई गयी हो गयी पर संदेह का बीज मेरे मन में ऐसा बो गयी कि मुझे ना दिन चैन ना रात !मुझे लगने लगा था,जब अभी भारत में रह कर बेटे की यह सोच है तो अमेरिका में रह कर तो बिलकुल ही बदल जाएगा !कभी पतिदेव पर गुस्सा आता आखिर यही सब सीखने देने के लिए बच्चों को हॉस्टल भेजा था ? यहाँ रहता तो अभी से ऐसी बहस करता ?अभी तो खुद कमा भी नहीं रहा,जब अपने पैरों पर खड़ा होगा तब क्या मेरी कोई बात सुनेगा ? और भी ना जाने क्या क्या और बहुत आगे की बात सोचती जाती और रोती जाती ! थक हार कर चुप भी हो जाती,शादी के बाद से और किया भी क्या है सिवाय चुप रहने के ? अजीब घर में ब्याह हुआ है,जहाँ बच्चों से बड़ों तक,इंसान से जानवरों तक सबकी इच्छा मायने रखती है सिवाय मेरे ! मन में तो यहाँ तक आता कि जब किसी को मेरी ना जरुरत है और ना परवाह तो भला क्यों जी रही हूँ मैं ? मन करता घर से भाग जाऊं कहीं !पर जाउंगी कहाँ ?नौकरी तो मेरी पहले ही छुड़ा दी गयी है,शायद यही सोच कर कि अगर खुद कमा-खा रही होउंगी तो मेरी नाक में नकेल डाल कर अपनी मर्जी से कैसे नचाएंगे ससुराल वाले ? मायके में पिता हैं तो पर ससुराल से भाग कर आई बेटी का स्वागत करेंगे या दस बातें और सुनकर वापिस उसी ट्रेन से बिठा बैरंग डाक की तरह भेज देंगे,और तब जो दुर्गति होगी उसकी तो कल्पना से ही मन थर्रा उठता था !
करीब दो वर्ष की पढाई पूरी करके और नौकरी लगने के छ; माह बाद वो दिन भी आया जब बेटे ने घर आने की सूचना दी,मन मयूर ख़ुशी से नाच उठा मेरा,पुरानी सभी बातें मन से धो-पोंछ कर उसकी आवभगत के लिए उसके पसंदीदा खाने बनाने में जुट गयी ! तीन साल माँ के लिए कितना लम्बा समय होता है पुत्र-वियोग का यह सिर्फ वही माँ जान सकती हैं जिनका बेटा विदेश पढने अथवा नौकरी हेतु गया हो और माँ ने पलक पांवड़े बिछा उसकी पल पल प्रतीक्षा की हो !
वो दिन भी आया जब बेटा आया,उसे सीने से लगा तीन बरसों की खोयी ख़ुशी वापिस पायी ! उसकी पढाई,घर और अमेरिका के बारे में बातें करते-सुनते तीन दिन कैसे हवा में बिना पंख के उड़ते हुए बीत गए पता ही नहीं चला !चौथे दिन उसकी बुआ का फोन आया जब मैं उसके लिए मूंग की दाल का हलवा बनाने में व्यस्त थी,ख़ुशी के आगे थकान का अनुभव भी नहीं हो रहा था ! कान बेटे के वार्तालाप सुनने में लगे थे,तभी कानों में गरम लावे की तरह शब्दों ने जला कर रख दिया,वो बुआ से कह रहा था,”माँ की पसंद की लड़की से शादी ?नो वे….” इसके आगे के शब्द कोई मायने ही नहीं रखते थे,करछली हाथ से छूट पैर के अंगूठे पर गिरी और अंगूठे का नाख़ून आधा टूट कर मुझे रोने का एक अच्छा बहाना दे गया ! पतिदेव ने गैस बंद करके मेरे अंगूठे की मरहमपट्टी शुरू कर दी थी,छोटा बेटा दवा की गोली और पानी का गिलास लिए खड़ा था,पर कोई कहाँ जानता था कि रुलाई का कारण अंगूठे की चोट नहीं वरन दिल पर लगे बेटे के शब्दों की वो चोट थी जिसका किसी के पास इलाज़ ही नहीं था !
छोटे बेटे से समय समय पर बड़े बेटे के बारे में पता चलता रहता था,उसी ने बताया कि भाई किसी एंजेला नाम की लड़की को पसंद करता है !कुछ समय के बाद दोनों बेटे पीछे पड़ने लगे कि अब सारी जिम्मेदारियां ख़त्म हो गयीं आप एक बार तो यहाँ अमेरिका आ जाओ !लेकिन किसी न किसी कारण पतिदेव टालते रहे !एक तो उनके काम का हर्जा होना उन्हें गवारा नहीं था और अमेरिका इतना पास भी नहीं कि मन ना लगे तो तुरंत वापिस आ जाओ,फिर महीनों के लिए घर खाली छोड़ कर जाना ?एक बार माँ की बरसी पर घर खाली छोड़ा था तो 4 घंटे बाद ही पडौस से मिसेज गुप्ता का फोन आ गया था कि हमारे घर के ताले टूटे पड़े हैं,बरसी तक भी कहाँ रुक सकी थी मैं ?अब दुबारा यह गलती,ना बाबा ना !
लेकिन संजोग बन ही गया जब नए किरायेदार आये अपनी एक माह की बेटी को लेकर,उनकी पत्नी सरकारी अस्पताल में डॉ थीं और मेटरनिटी लीव पर थीं छ महीने की,वहीँ बड़े बेटे के साथ रहनेवाला उसका मित्र भारत आया हुआ था,उसकी वापिसी के साथ बेटे ने टिकट भेज दी थीं !वीजा वो जाने से पूर्व ही दस वर्ष का बनवा कर गया था !साथ मिल रहा था तो “ना ” कहने का कोई कारण नहीं बचा था,सो जैसे-तैसे पतिदेव को मनाया,” तुम हमेशा चाहते थे ना कि माँ-पिताजी हमारे घर आकर कुछ दिन रहें ?ऐसे ही क्या तुम्हारे बेटे का मन नहीं होता होगा क्या ? हमें एक बार तो जाना ही चाहिए !” बात में वज़न था तो अबकी बार वो इनकार भी नहीं कर सके !
यह तो वहां जाकर लगा कि बेटे ने घुमाने के सा'”उसकी पसंद” को हमारे साथ रहने का ज्यादा से ज्यादा मौका दिया !लड़की सुन्दर है,केयरिंग है,इज्ज़त करना जानती हैसभी तो गुण हैं सिवाय इसके कि वो दूसरे देश-जाति की है! एंजेला हर तरह से एक अच्छी बहु साबित होगी एसा मुझे लगा !
ना करने का तो सवाल ही नहीं उठता था,बेटे ने हमारे सामने सगाई कर ली ! मैंने जब दीदी को बताया तो वो खुश होने के बजाय बोलीं,” जब शादी कर ले तब समझो…और खीसें निपोर दीं !” मन में दुबारा वही डर आ समाया जो उनके मन में उनकी बेटी के लिए परोक्ष रूप में ही सही,पर था जरुर और बाकी के लोगों का पता नहीं लेकिन मैं खूब समझ पा रही थी !बेटे की शादी पर हमारा अमेरिका जाना संभव नहीं हुआ,कारण बताने बैठूंगी तो एक नयी कथा बन जायेगी,हाँ दोनों बेटियों को अवश्य भेजा भाई की शादी में और ख़ुशी की उमंग में खो ना दें सो थोड़ी सी ज्वेलरी और कुछ पैसे भेजे उनकी पार्टी और खरीदारी के लिए !
दोनों ने वापिस आकर बताया की भाई भाभी ने उनका खूब ख्याल रखा,घुमाया और तरह तरह के उपहार दिए,वो दोनों हमें बहुत याद कर रहे थे !खैर,शादी पर नहीं जा सके हम पर साल भर बाद एंजेला ने जब मुझे फोन पर बताया की मैं दादी बनने वाली हूँ तब मारे ख़ुशी के मन मयूर नाच उठा,मैं दिन में भी सपने देखने लगी,मूल से ब्याज ज्यादा प्यारा होता है,शायद इसीलिए !मैं अब किसी कीमत पर रुक नहीं सकूँगी,ये समझ चुके थे सो बेटे से कह कर तुरंत अमेरिका का टिकेट कटवाया !इस बार घूमने नहीं बहु-बेटे के साथ दिन बिताने और नन्हे पोते का मुख देखने जा रही थी ! ढेर सारे नन्हे बच्चे के कपडे जो रात रात भर बैठ कर सिले थे,उसके स्वेटर,नन्हे मोज़े और तरह तरह की टोपियाँ,कोई खरगोश के लम्बे कान जैसी, मंकी केप, क्रोशिये के फुंदने वाली, और जोकर की तरह लम्बे एंटीना जैसी,जितनी तरह की मुझे आती थीं और जो सहेलियों से सीख सकती थी सब बना कर रखीं ! बेटियां चुहलबाजी करतीं,”माँ,कुछ अपने और बाबा के गरम कपडे भी रख लो वरना कहीं छोटू के कपडे ना पहनने पड़ जाएँ,” और मेरा जवाब होता,”मैंने जितने से काम चल जाए उतने कपडे रख लिए हैं,वहां मुझे घर के काम से कहाँ फुर्सत मिलेगी छोटू के स्वेटर-मोज़े बुनने की ?”
हम जिस दिन अमेरिका की धरती पर लेंड हुए,हमारा नन्हा पोता हमारे स्वागत के लिए समय से पूर्व आ चुका था !लगभग 27 घंटे घर से घर तक पहुँचने में लगे,लेकिन हम दोनों के मन इतने प्रसन्न थे,थकावट होते हुए भी,ख़ुशी के आगे बौनी लग रही थी,घर जाकर जल्दी जल्दी हाथ मुहं धोकर नाश्ता करके हम अस्पताल जाने को तैयार हो गए ! बेटे ने कहा भी,”माँ,इतनी लम्बी यात्रा से आई हो,आज आराम कर लेतीं फिर….. “पर सब्र कहाँ था ?मिलने पहुँच गए ! जब एंजेला ने नन्हे को मेरी गोदी में सौंपा तब तो मेरे पाँव ज़मीन पर पड़ ही नहीं रहे थे !एंजेला और बेटा हम दोनों की ख़ुशी को देख बहुत संतुष्ट थे !
पांच महीने कैसे हवा के पंख लगा बच्चे की और उसकी माँ की देखभाल में गुज़र गए बिलकुल भी पता नहीं चला !बच्चे के उठने से पहले मैं उठ जाती और रात उसके सोने के बाद मुझे नींद आती ! एंजेला कई बार टोकती,”आप इतना काम करोगी तो मेरी आदत ख़राब हो जायेगी और डर है कहीं आप बीमार ना पड़ जाओ !” वो नहीं जानती थी कि मैं अपने प्रवास का सारा समय पोते के साथ बिताना चाहती हूँ,ताकि भारत वापिस आने पर हरसिंगार के फूलों की तरह, झोली भर खुशियाँ समेत ले जाऊं और इन लोगों के आने तक उनकी यादों के सहारे उनकी कमी को पूरा कर सकूँ !
हमारे वापिस आने के वक़्त बेटे-बहु की आँखें नम थीं, विदाई की बेला भला किसे अच्छी लगती है फिर चाहें वो बेटी-बेटे की विदाई हो या माता पिता की !
भारत आने के बाद महीने से ज्यादा बेटे-बहु और नन्हे की यादों में डूबती-उतरती रही मैं,”अब तो करवट लेने लगा होगा?” “उसे तुम लोग रुलाते तो नहीं ?” उसकी शक्ल किस पर गयी…. आदि आदि प्रश्न लगभग रोज़ ही पूछती रहती फोन पर !एंजेला नियमित रूप से उसकी नयी खींची तस्वीर भेजती रहती और मैं ख़ुशी से भर भर उठती !
इधर बड़ी बेटी जूही के रिश्ते की बात शुरू हो गयी थी,लड़का उसी के साथ बी टेक में पढने के बाद से जॉब में था,और अब लोन लेकर अपना घर खरीद कर शादी के लिए हामी भर चूका था !दोनों के परिवार आपस में मिले और शादी तय कर तारीख निश्चित करने के लिए बेटे-बहु से उनकी सुविधा पूछी तो वो आने वाली पहली ही तारीख के लिए तैयार हो गए !प्रांशु,अरे मेरा पोता भी अब 2 वर्ष 6 महीने से ज्यादा का हो गया था उसका पासपोर्ट और वीजा बनवा कर वो शादी से 15 दिन पहले ही आ गए जिस से बहन की शादी में मदद कर सकें !एंजेला सभी के लिए उनकी मनपसंद उपहार लायी थी,पर मेरा सबसे सुन्दर उपहार तो मेरा प्रांशु था !
मैं शादी की धूमधाम नहीं कर सकी थी, यह मलाल बहुत था तो प्रांशु के आने की ख़ुशी में एक छोटी सी पार्टी रखी थी जिसमे सभी रिश्तेदारों के साथ अलका दी भी आमंत्रित थीं ! इस बार जब दीदी मेरे घर आयीं तो कुछ टूटीं सी लगी लेकिन जाहिर तौर पर बहुत मुस्कुरा रहीं थी

मैने एक दिन देखा वह सबसे छुप कर मेरे पोते को टूटकर चूम रहीं है और तू मेरा ” कदली का फूल है ” कह कर बार बार छाती से चिपका लेतीं थी ।जैसे उन्हे परमानन्द की अनुभूति हो रही हो। मुझे लगा कहीं न कहीं वह अपने ही हाथों अपने आशियाने को आग लगा चुकीं है और अब उस नरक की भट्ठी में तिल तिल जल रहीं है।

पूर्णिमा शर्मा

नाम--पूर्णिमा शर्मा पिता का नाम--श्री राजीव लोचन शर्मा माता का नाम-- श्रीमती राजकुमारी शर्मा शिक्षा--एम ए (हिंदी ),एम एड जन्म--3 अक्टूबर 1952 पता- बी-150,जिगर कॉलोनी,मुरादाबाद (यू पी ) मेल आई डी-- Jun 12 कविता और कहानी लिखने का शौक बचपन से रहा ! कोलेज मैगजीन में प्रकाशित होने के अलावा एक साझा लघुकथा संग्रह अभी इसी वर्ष प्रकाशित हुआ है ,"मुट्ठी भर अक्षर " नाम से !