गीत : गधे ही गधे

जहाँ देखिए जी गधे ही गधे हैं,
बौड़म हैं ज्यादा, और कुछ सधे हैं ।
मगर देखिएगा, गधे ही गधे हैं ।।

इलेक्शन के मौसम में, दिखते हैं ज्यादा,
स्वयं को बताती ‘लियोनी’ भी राधा ।
जो साड़ी पहन मंच से हँस रही है-
वो केवल चुनावों में करती है वादा ।

जमीनों-कमीनों के दर्जे बँधे हैं
जहाँ देखिए जी गधे ही गधे हैं ।

इलेक्शन में नेता गजब ढा रहे हैं,
गधों को गधे ही नजर आ रहे हैं ।
भाई ही भाई की चर्चा करे अब-
अजब भाईचारा भी दिखला रहे हैं ।

हो यूपी या गुजरात, सारे नधे हैं
जहाँ देखिए जी गधे ही गधे हैं ।।

नहीं खुद जो जीता तो लेकर सहारा
गधे ने पिता तक को दू-लत्ती मारा ।
विरासत पिता की गधे चर रहे हैं-
मगर ये स्वयं को समझते हैं दारा ।

उल्लू बनाने की कुछ सरहदें हैं?
जहाँ देखिए जी गधे ही गधे हैं ।।

— सुरेश मिश्र
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परिचय - सुरेश मिश्र

हास्य कवि