गधे और बंदर

इस वर्ष गर्मी कहर की थी। जालंधर की गर्मी और मच्छरों से मुकाबला, कोई करे भी तो किया करे। दफ्तर में लोगों से सर खपाना और ऊपर से बिजली की आँख मिचोली,सोचा, कुछ दिन के लिए शिमले हो आएं। अँगरेज़ भी तो गर्मिओं में शिमले चले ही जाते थे, अब तो भारत हमारा देश है, मज़े करेंगे माल रोड पर। मेरा दोस्त और उस की पत्नी शिमले में ही रहते थे और बहुत दफा उन्होंने उन के यहाँ आने के लिए आग्रह भी किया था। लो जी रब तुम्हारा भला करे, पत्नी को बताया, वोह तो मुझ से भी आगे हो रही थी और ख़रीदफ़रोख़्त शुरू हो गई। कपडे खरीदे, कैमरे टैस्ट किये और बस में सीटें रिज़र्व कर लीं और एक दिन हमारा सफर शुरू हो गया। सफर लम्बा था, थकावट तो होगी ही लेकिन उत्सुकता ज़्यादा होने के कारण सफर का पता ही नहीं चला। जब हम दोस्त के घर पहुंचे तो भीतर से मज़ेदार खानों की खुशबू आ रही थी। हंसी मज़ाक होना शुरू हो गया। मेरे दोस्त कभी मेरे क्लास फैलो हुआ करते थे और हमारी दोस्ती भी इतनी गहरी थी कि हमारा हंसी मज़ाक ख़तम होने को नहीं आता था और हमारी भाबी तो दोस्त से भी आगे थी। मेरी अर्धांगिनी भी कोई कम नहीं थी। लो जी खाना पीना भी शुरू हो गया और खाने की सिफ़तें किये जाना तो अतिथि का धर्म होता ही है। मज़े से खा रहे थे और पुरानी स्कूल कालज की बातें भी कर कर हंस रहे थे। कुछ ही देर बाद कुछ बंदर छत्तों पर आ कर बैठ गए और हमारी तरफ देखने लगे। क्योंकि हम बाहर ही बरामदे में बैठे थे, इस लिए हमें बंदरों को देख कर अजीब घबराहट सी हुई। दोस्त की पत्नी ने डंडा उठाया और उन की तरफ फेंका, सभी बंदर भाग गए। अब बंदरों की बात होने लगी। भाबी बोली, भैया ! इन से बहुत सावधान रहना चाहिए। खाने पीने की कोई चीज़ हो तो यह हाथ से छीन कर ले जाते हैं। इन से बच कर रहना।
कुछ दिन हम ने खूब मज़े किए, पिक़निकेँ कीं। एक दिन दोस्त को काम पर जाना पढ़ा। दोनों महलाएं घर रहीं और् मैं अकेला ही साइट सीइंग का मज़ा लेने चल पड़ा। कभी मेरे दादा जी शिमले में काम करते थे और वोह अंग्रेज़ों की बातें किया करते थे और बताया करते थे कि माल रोड पर अँगरेज़ मेम और साहब ही होते थे और बहुत सफाई होती थी। आज तो बस बिल्डिंगें ही अंग्रेज़ों की थीं, बस बाकी सब देसी था। कई घंटे मैं सुन्दर वादिओं का आनंद लेता रहा। अब मैं थक गया था। एक मठाई की दूकान पर ताज़ी ताज़ी जलेबीआं बन रही थीं। भूख तो लगी ही हुईं थी, जलेबीआं देख कर मुंह में पानी आ गया। कुछ जलेबीआं ली और लफाफा पकड़ कर चल पड़ा। एक पेपर स्टाल से अखबार ले ली और एक बैंच पर बैठ गया। जलेबिओं का लफाफा एक तरफ रख कर पहले मैं अखबार की सुर्खिओं पर नज़र डालने लगा। जैसे जैसे अखबार पड़ता गया, मन बेचैन सा हो गया। दो सफे देश में हुए घोटालों के बारे में ही थे। यह ऐकस घोटाला, यह वाई घोटाला, यह डिफैंस के सामान में घोटाला, यह शहीद हुए जवानों के बक्सों का घोटाला, ऐसे पता नहीं कितने घोटालों के बारे में डीटेल से लिखा हुआ था। खीझ कर पेपर एक तरफ रखने ही वाला था कि एक सफ़े पर हैड लाइन थी, देश का सब से मिहनती और ईमानदार प्रधान मंत्री “नरिंदर मोदी “, अब मैं सारी खबर पड़ने में मसरूफ हो गया। जैसे जैसे मैं पड़ता गया, मैं अखबार में ही ग़ुम हो गया। अब मेरे कानों में धीमी धीमी घंटियों की आवाज़ आने लगी। अखबार से चेहरा ऊपर उठाया तो देखा दूर कुछ गधे आ रहे थे, जिन पर ईंटें लादी हुई थीं। शिमले में गधे ! हैरान हुआ मैं उन की ओर देखने लगा। सारे गधे ऐसे लग रहा था जैसे इकठी हो कर कुछ दुल्हनें मस्त मस्त चाल में चल रही हों। उन के गले की घंटीआं और पैरों की थपक थपक बहुत मन लुभावनी लग रही थी। उन के पीछे एक उधेड़ उम्र का शख्स, जो बिलकुल सादे कपड़ों में था, मुंह में कुछ गुनगुनाता हुआ मज़े से आ रहा था। जैसे जैसे वोह नज़दीक आ रहे थे, मेरा सारा धिआन उन की ओर लग गया। जब वोह मेरे सामने से गुज़रने लगे तो एक बृक्ष पर बैठे बहुत से बंदर एक दम हंस पड़े। देखो देखो, बेवकूफ गधे जा रहे हैं, कुछ बोल रहे थे। वोह तरह तरह की शक्लें बना कर गधों पर हंस रहे थे। एक बोला, ओए बेफकूफ गधो, तुम वाकई गधे हो, इतना बोझ उठा कर चल रहे हो, ओये बेअक्लों, फेंक दो यह सारा बोझ और भाग जाओ, लेकिन तुम भागोगे नहीं, क्योंकि तुम गधे हो। हंस हंस कर सभी बंदरों की आँखों से पानी बह रहा था। एक अपने आप को कुछ समझदार कहलाने वाला बंदर बोला, ओए गधो, हमारी तरफ देखो, हम आज़ाद हैं, यहां भी मन करे, जाते हैं, खाने की कोई चिंता नहीं, खाना तो इतना मिलता है कि ज़्यादा हम बर्बाद ही कर देते हैं, कभी बृक्षों पर चढ़ जाते हैं और कभी शहर के चक्क्र लगाते हैं और घरों में भी घुस जाते हैं, किसी मालक की फ़िक्र नहीं, तुम अपने मालक के गुलाम रह कर सारी ज़िंदगी बर्बाद कर दोगे और अपने बच्चों को भी गुलाम बना कर मरोगे, मेरी मानो, फेंक दो यह बोझ और भाग जाओ, लेकिन तुम में इतनी हिम्मत ही नहीं है कि यह सब कर लोगे क्योंकि तुम गधे हो। इसी लिए तो बेफकूफ इंसानों को भी दूसरे इंसान बेवकूफ गधे कह देते हैं। सभी बंदर जोर जोर से हंसने लगे। सारे गधे बंदरों की बातें सुन रहे थे। कुछ दूर जा कर एक गधा वापस आ गया और बंदरों को बोला, बंदर भाई साहब ! आप ने ठीक ही कहा, हम गधे हैं लेकिन गधे होने पर हम को गर्व है, हम अपने मालक का हुकम मानते हैं और ईमानदारी से उस का सारा काम करते हैं, कुछ बोझ ज़्यादा भी लाद दे तो हम इंकार नहीं करते, हमारे इस बोझ के कारण हमारे मालक के बच्चों की परवरिश होती है और वोह स्कूल जाते हैं, हमारा मालक हर रोज़ हमें अच्छा खाना देता है, अगर हम में से कोई बीमार पढ़ जाए तो हमारा धियान रखता है, कभी हमारे कोई बच्चा पैदा हो तो मालक के घर मे खुशीआं होती हैं, बहुत सी इमारतों को बनाने में हम ने भी ईंटें सप्लाई की हैं, सीमैंट सप्लाई किया है, और पता नहीं कितनी जगहों पर हम ने काम किया है, जब उन इमारतों की तरफ हम देखते हैं, यहाँ हम ने काम किया था तो देख कर हमारा सीना गर्व से फूल जाता है कि देश निर्माण में हम ने भी अपना योगदान दिया है, हमारे जैसे करोड़ों लोग, जिन को तुम गधे बोलते हो, ईमानदारी से काम करते हैं, हकूमत को टैक्स देते हैं, सारे देश के काम इस टैक्स से होते हैं, अपने मालक का ईमानदारी से कहा मान कर जी जान से देश के लिए काम करते हैं, इस टैक्स से हमारे देश के जवान देश की सुरक्षा में जी जान से अपना योगदान देते हैं, हमारे देश का नाम दुनिआं में ऊंचा हो रहा है, सिर्फ इन्हीं ईमानदार गधों के कारण।
कुछ देर रुक कर वोह फिर बोला, और तुम किया करते हो ? चोरी, देश का नुक्सान ? और काम किया करते हो ? लोगों को परेशान और बर्बादी ! अरे तुम को तो इतनी अक्ल भी नहीं कि उन बिजली के खम्बों से जो तारें जाती हैं, उन में बिजली है और तुम चढ़ जाते हो टपोसीआं लगाते और करंट लगने से तारों पर ही लटक जाते हो, घरों की बिजली गुल हो जाती है और लोग तुम्हें गालिआं देने लगते हैं। बिजली तो फिर आ जाती है लेकिन तुम तो नरक में चले ही जाते हो ! डंडे ले कर लोग तुम्हें भगाते हैं लेकिन तुम्हें शर्म नहीं आती, भाई हमें अपने गधे होने पर गर्व है और हमें दुनिआं में कोई डर नहीं कि भागे भागे फिरें। सब बंदर चुप्प हो गए थे। गधा पीछे मुड़ा और अपने साथिओं से जा मिला।
अखबार से अपना सर मैंने उठाया और कुछ देर सोचता रहा। फिर जलेबीआं खाने की गरज़ से मैंने लफाफे की ओर देखा तो लफाफा वहां नहीं था। हैरान हो कर मैंने इधर उधर देखा। कौन ले गया सारी जलेबीआं ? सोच ही रहा था कि मेरी निगाह एक इमारत की छत पर पढ़ी। देखा, कुछ बंदर मेरी जलेबीआं खा रहे थे और एक दूसरे से छीनने के लिए आपस में सीना झपटी कर रहे थे। मुस्करा कर मैंने अखबार उठाई और अपने दोस्त के घर की ओर चल पढ़ा।

परिचय - गुरमेल सिंह भमरा लंदन

१९६२ में बीए फाइनल की पढ़ाई छोड़ कर इंग्लैण्ड चले गए. लन्दन में निवास कर रहे हैं. किताबें पढने और कुछ लिखने का शौक बचपन से ही रहा है। पिछले १३ वर्ष से रिटायर हैं और बोलने में कठिनाई की समस्या से पीड़ित हैं. पांच वर्ष से रेडिओ एक्सेल बर्मिंघम को कहानियाँ भेज रहे हैं. 'जय विजय' के लिए लघु कथाएँ लिखते हैं. संस्मरण लिख रहे हैं.