मुक्तक

कुछ दीप आँधियों में जलते हैं
तालाबों में ही कमल खिलते हैं
दामन बुराई का छोड़ दो तुम
हर नर में नारायण मिलते हैं

इस तरह ख्वाबों मे, वो आने लगे
गीत हम प्यार के गुनगुनाने लगे
पहले तो आते थे रातों में ही 
अब दिन में ही आके सताने लगे

सरहदों पर ये सैनिक,मरते है क्यों
ये नेता सिर्फ़ निन्दा,करते है क्यों
कब तक टुटेगी,कलाई से चूड़ियाँ
आरपार करनें से,ये डरते हैं क्यो

बेख़बर देहलवी
महासचिव
अखिल भारतीय साहित्य उत्थान परिषद्

 

परिचय - बेख़बर देहलवी

नाम-विनोद कुमार गुप्ता साहित्यिक नाम- बेख़बर देहलवी लेखन-गीत,गजल,कविता और सामाजिक लेख विधा-श्रंगार, वियोग, ओज उपलब्धि-गगन स्वर हिन्दी सम्मान 2014, पूरे भारत मे लगभग 300 कविताओं और लेख का प्रकाशन