कैसी ज़िन्दगी? (10 ताँका)

1.
हाल बेहाल
मन में है मलाल
कैसी ज़िन्दगी?
जहाँ धूप न छाँव
न तो अपना गाँव!
2.
ज़िन्दगी होती
हरसिंगार फूल,
रात खिलती
सुबह झर जाती,
ज़िन्दगी फूल होती!
 
3.
बोझिल मन
भीड़ भरा जंगल
ज़िन्दगी गुम,
है छटपटाहट
सर्वत्र कोलाहल!
 
4.  
दीवार गूँगी
सारा भेद जानती,
कैसे सुनाती?
ज़िन्दगी है तमाशा
दीवार जाने भाषा!
 
5.
कैसी पहेली?
ज़िन्दगी बीत रही
बिना सहेली,
कभी-कभी डरती
ख़ामोशियाँ डरातीं !
6.
चलती रही
उबड-खाबड़ में
हठी ज़िन्दगी,
ख़ुद में ही उलझी
निराली ये ज़िन्दगी!
 
7.  
फुफकारती
नाग बन डराती
बाधाएँ सभी,
मगर रूकी नहीं,
डरी नहीं, ज़िन्दगी!
 
8.  
थम भी जाओ,
ज़िन्दगी झुँझलाती
और कितना?
कोई मंज़िल नहीं
फिर सफ़र कैसा?
9.
कैसा ये फ़र्ज़   
निभाती है ज़िन्दगी
साँसों का क़र्ज़,
गुस्साती है ज़िन्दगी
जाने कैसा है मर्ज़!
10.
चीख़ती रही
बिलबिलाती रही
ज़िन्दगी ख़त्म,
लहू बिखरा पड़ा
बलि पे जश्न मना!
– जेन्नी शबनम (17. 9. 2017)
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