लेख– गांधी का सपना और वर्तमान स्वच्छ भारत का स्वरूप

गांधी और स्वच्छता दोनों एक- दूसरे के पर्याय हैं। ग़ांधी की दिनचर्या की शुरुआत ही स्वच्छता के कर्मों से शुरू होती थी। मगर देश का दुर्भाग्य आज़ादी के वक़्त देश की राजनीति ने केवल गांधी के नाम पर राजनीति ही की। उनके विचारों और आदर्शों को तो तिलांजलि दे दी गई। स्वच्छता समाज और देश की नैसर्गिक आवश्यकताओं में से एक है। आज़ादी के बाद देश की राजनीति ने बड़े- बड़े राजनीतिक सुधार की बात तो की, लेकिन समाज की सबसे बड़ी सामाजिक बुराई पर ध्यान न दे सके। जो समाज में उत्पन्न होने वाली समस्याओं की जननी है।
महात्‍मा गांधी के स्‍वच्‍छ भारत के स्‍वप्‍न को साकार रूप देने का अगर भगीरथ प्रयास किसी सरकारी व्यवस्था ने किया, तो उसमें अग्रणीय पंक्ति में नाम नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने किया।

1. गांधी और स्वच्छता–

गांधी के अनुसार उनका जीवन ही संदेश है। फ़िर ऐसी विराट शख्सियत के जीवन के प्रत्येक पहलू से देश और समाज कुछ न कुछ विशेष ज्ञान प्राप्त कर सकता है। वैसे तो गांधी जीवन के बहुत सारे उद्देश्य थे, लेकिन उनमें एक उद्देश्य उनका स्वच्छ भारत की परिकल्पना भी थी। तभी तो उनके दिनचर्या की शुरुआत सुबह भोर के वक़्त चार बजे से शुरू हो जाती थी। जिसमें उनका पहला काम अपने परिवेश को स्वच्छ करना रहता था। आज की स्थिति में अगर किसी ने गांधी के स्वच्छता को साकार रूप देना का काम किया है, तो वह वर्तमान में देश की मोदी सरकार है, क्योंकि उस दौर में स्वच्छता का संदेश देने के लिए अगर झाड़ू गांधी जी ने उठाया था, तो वर्तमान में मोदी सरकार भी उन्हीं के नक्शे कदम पर चलकर स्वच्छ भारत, स्वस्थ भारत की परिकल्पना को सिद्ध करने में लगी हुई है। गांधी के सपनों का स्वच्छ भारत बनाने की दिशा में मोदी सरकार ने सार्थक प्रयास किया है। जो अब अपने परिणामों से सूचित कर रही है, कि आने वाले 2019 में जब देश गांधी जी की 150 वीं जन्मजयंती मनाने के लिए एकत्रित होगा। उस समय देश गांधी के सपनों के भारत के करीब अग्रणी पंक्ति में खड़ा होगा। प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने 2 अक्‍टूबर 2014 को स्वच्छ भारत अभियान शुरू किया, और इसके सफल कार्यान्वयन के लिए देश के सभी नागरिकों से इस अभियान से जुडऩे की अपील की। वह अपील आज के दौर में अपार जनसमूह का रूप ले चुकी है। हम अपने लेख में गांधी के स्वच्छ भारत के सपनों और वर्तमान भारत की रूपरेखा के बीच तारतम्यता को लेकर आगे बढ़ते हैं।

2. गांधी व्यक्ति नहीं, विचार–

गांधी देश के समक्ष व्यक्ति नहीं, विचार के रूप में प्रतिस्थापित होने चाहिए, लेकिन उनके विचारों का सबसे अधिक दोहन उनके विचारों के लोगों ने ही किया। गांधी के विचारों को छोटा बताने की कोशिश की गई। अगर गांधी के विचारों और शिक्षा पद्धति पर ही आज़ादी के वक़्त की तत्कालीन सरकार चलती। तो आज़ादी के लगभग सात दशक बाद देश के लोगों को मूलभूत बातें सिखाने की जैसे खुले में शौच मुक्त भारत आदि बताना नहीं पड़ता। गांधी की दिनचर्या की शुरुआत ही स्वच्छता के मिशन से होती थी, लेकिन बीते कुछ समय तक की राजनीतिक और सामाजिक अकर्मण्यता ने देश को राजनीति के स्तर पर कमजोर करने के साथ स्वच्छता और अन्य सामाजिक क्षेत्रों में भी कमजोर किया । राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का मानना था कि साफ-सफाई, ईश्वर भक्ति के बराबर है और इसलिए उन्होंने लोगों को स्वच्छता बनाए रखने संबंधी शिक्षा दी थी और देश को एक उत्कृष्ट संदेश दिया था। उन्होंने ‘स्वच्छ भारत’ का सपना देखा था जिसके लिए वे चाहते थे कि भारत के सभी नागरिक एकसाथ मिलकर देश को स्वच्छ बनाने के लिए कार्य करें। महात्मा गांधी रोजाना सुबह चार बजे उठकर अपने आश्रम की सफाई किया करते थे। वर्धा आश्रम में उन्होंने अपना शौचालय स्वयं बनाया था जिसे वह प्रतिदिन साफ करते थे। जो सपना आज के दौर में मोदी सरकार के नेतृत्व में सफ़ल होता हुआ दिख रहा है।

3.महात्मा गांधी का स्वच्छता को लेकर विज़न —

महात्‍मा गांधी के स्‍वच्‍छ भारत के स्‍वप्‍न को पूरा करने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने 2 अक्‍टूबर 2014 को स्वच्छ भारत अभियान शुरू किया और इसके सफल कार्यान्वयन के लिए देश के सभी नागरिकों से इस अभियान से जुडऩे की अपील की। इसके पहले गांधी के स्वच्छ भारत को लेकर स्पष्ट विचार थे। उनके मुताबिक हाथ में झाड़ू और बाल्टी लेकर ही देश और अपने आस-पड़ोस को स्वच्छ बनाया जा सकता था। एक बार एक अंग्रेज ने महात्मा गांधी से पूछा, यदि आपको एक दिन के लिए भारत का बड़ा लाट साहब बना दिया जाए, तो आप क्या करेंगे। गांधीजी का उत्तर चौकानें वाला था, उन्होंने कहा कि वे राजभवन के समीप की गंदगी दूर करने का प्रयास करेगें। दोबारा पूछने पर भी वहीं उत्तर दिया। गांधी के इन उत्तरों से अंदाजा लगाया जा सकता है, कि गांधी जी स्वच्छता के प्रति कितने संजीदा थे। आज के दौर में उसी लग्न और संजीदगी के साथ स्वच्छ भारत का सपना देश में मोदी सरकार पूर्ण करने में लगी है। गांधी के विचार के अनुसार अगर लोग अपने हाथ में झाड़ू और बाल्टी नहीं लेंगे, तब तक आप अपने नगरों और कस्बों को स्वच्छ नही रख सकते हैं। एक बार गांधी जी ने एक स्कूल को देखने के बाद कहा था, कि आप अपने छात्रों को किताबी पढ़ाई के साथ-साथ खाना पकाना और सफाई का काम भी सिखा सके, तभी आपका विद्यालय आदर्श विद्यालय होगा। गांधी जी के विचार में आज़ादी से पहले स्वच्छता थी। इन तथ्यों से उजागर होता है, कि स्वच्छता उनकी पहली प्राथमिकता थी, लेकिन आज़ादी के तत्काल बाद उनके इस विचार को धूल-धूसर करने का षणयंत्र उनके अपनों ने ही देश में किया।

4. वर्तमान में स्वच्छ भारत के सार्थक परिणाम—

उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के कुछ गांवों की बात हो। या देश के अन्य हिस्सों की गाँव का बदलता स्वरूप गांधीजी के खुले में शौच मुक्त ग्रामीण परिवेश के सपनों को साकार करता प्रतीत होता है। बिजनौर के गांव धरमपुरा की ग्राम प्रधान ने अपनी मेहनत और लगन से गांव धरमपुरा को खुले में शौच से मुक्त करके दिखा दिया है , कि महिलाएं अगर कुछ करने की ठान लें , तो वे बड़े- बड़े सामाजिक बदलाव ला सकती हैं। गौरतलब है कि भारत की आधी से ज्यादा आबादी 2014 तक खुले में शौच करने के लिए मजबूर थी। जो कि अनेक बीमारियां जैसे डायरिया, हैजा, टाइफाइड जैसी बीमारियां का कारण बनती थी। जिसके कारण कई बार बच्चों की मौत हो जाती थी। इसके साथ
बीमारियों के अलावा खुले में शौच करने के कारण यह महिला सशक्तिकरण के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा थी, क्योंकि ग्रामीण इलाकों में लड़कियों और महिलाओं के साथ बलात्कार की घटनाएं ज्यादातर ऐसे वक्त में होती हैं जब वे शौच के लिए खेत में जाती थी। जिसमें स्वच्छ भारत अभियान के बाद कमी आई है।

5. मोदी सरकार के दृढ़ आत्मबल का परिणाम स्वच्छ भारत अभियान–

स्वच्छ भारत की शुरूआत देश के प्रधानमंत्री ने की थी। हमारे देश के प्रधानमंत्री ने 2 अक्टूबर 2014 को इसकी शुरूआत खुद झाडू उठाकर की थी, और 2019 तक भारत को स्वच्छ राष्ट्र के रूप में देखने की संकल्पना देश के सामने रखी थी। वर्तमान समय में यह अभियान अपने सकारात्मक दृष्टिकोण को लेकर गांधी के सपनों को साकार करता हुआ दिख रहा है। यह हमारी पिछली सरकारों की कमजोर राजनीतिक इच्छाशक्ति और जन सरोकार के विषय में न सोचने का ही कारण रहा है, कि जो काम स्वच्छता को लेकर आज़ादी के वक्त ही हो जाना चाहिए था। उस कार्य के लिए कर्तव्यपरायणता वर्तमान सरकार मोदी के नेतृत्व में लेकर आगे बढ़ रही है। देश की विडंबना देखिए, गांधी का राजनीतिक प्रयोग करने वाली राजनीतिक दलों ने कभी गांधी के विचारों पर ध्यान नही दिया। अगर दिया होता, तो देश को आज़ादी के सात दशक बाद यह नहीं सिखाना पड़ता, कि क्या उनके और उनके वातावरण के लिए उपयुक्त होगा। देश के नागरिकों ने इस अभियान को सफल बनाने के लिए अपना भरपूर सहयोग दे रहें हैं। महात्मा गांधी के विचारों को पूर्णतः प्रदान करने के लिए वर्तमान समय में सड़क, चौराहे,पब्लिक स्थान, रेलवे स्टेशन पर स्वच्छता काफ़ी हद तक दिखनी शुरू हो गई है। गंगा को स्वच्छ करने के लिए सरकार ने अलग मंत्रालय का निर्माण किया। यह सरकार का गांधी के उदेश्यों को पूर्ण करने का अनूठा प्रयास था। जिस उद्देश्य को प्राप्त करने में मोदी सरकार सफल भी हो रहीं है।

6. मोदी सरकार के स्वच्छ भारत अभियान के कुछ पहलू–

देश के लोगों को खुले में शौचालय से मुक्त कराने के लिए सरकार ने 2 लाख 50 हजार समुदायिक शौचालय , 2 लाख 60 हजार सार्वजनिक शौचालय और प्रत्येक शहर में ठोस अपशिष्ठ प्रबंधन की सुविधा प्रदान की है। वहीं सरकार ने शौचालय निर्माण पर 1828 करोड़ रूपये खर्च कर रही है। सरकार ने जनजागरूकता के लिए 625 करोड़ रूपये निर्धारित कर रखा है। जिसका सकारात्मक असर समाज पर पड़ता दिख रहा है। मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार ने भी मोदी सरकार से अनुप्रेरित होकर सूबे में पचास माइक्राॅन से पतली प्लास्टिक के उपयोग पर जुर्माना लगा चुकी है। इस कदम की भी सराहना होनी चाहिए, क्योंकि एक किलो प्लास्टिक जलाने से सर्वाधिक विषैली डायआक्सीजन गैसे 50 माइक्रो ग्राम तक फैलती है। इसके साथ नमामि गंगे कार्यक्रम के तहत भी शवदाहगृह का निर्माण और पेड़-पौधो को लगाने की बात कहकर स्वच्छता मिशन में महती भूमिका अदा कर रहीं है। एक बात और मोदी सरकार के नेतृत्व में देश ने सच्चे अर्थों में महात्मा गांधी के सपनों के स्वच्छ राष्ट्र के रूप में विश्वपटल पर बढ़ रहा है। जिसमें सबसे दिलचस्प बात यह है, कि गांधी के आंदोलन की भांति मोदी के स्वच्छता अभियान में भी जन समुदाय सहयोग करता दिख रहा है। फ़िर चाहे महाराष्ट के जिले सिन्धु दुर्ग को मिसाल का अनुपम उदाहरण ले। या फ़िर दूसरे राज्यों के अन्य जिलों का अनुशासनात्मक रवैये के प्रतिभूति के कारण ही स्वच्छता के सार्थक परिणाम दृष्टिगोचर हो रहें हैं। महाराष्ट्र के सिंधु दुर्ग में तो गीले और सूखे कचरे का निस्तारण कैसे आदर्श तरीके से हो। उसकी पहल चल रहीं है। वहां पर गीले कचरे से बायोगैस,खाद,सूखे कचरे से कोयला और पाॅलिथीन,बैग्स से पांच-पांच किलोमीटर की पांच सड़के बनायी गई है। इस अभियान को संयुक्त राष्ट्र के यूनाइटेड डेवलपमेंट प्रोग्राम में शामिल किया गया है। कई शहरों में यह माॅडल लागू किया जा रहा है, और कर्नाटक, छत्तीसगढ़ की सरकार भी इस दिशा में कार्यरत हैं।

सारांशतः मोदी सरकार के तत्वावधान में देश स्वच्छता के मिशन को लेकर आगे बढ़ रहा है। जो गांधी जी के सपनों के भारत निर्माण में एक चैन की भांति काम कर रहा है। जिसका सार्थक और असरदार प्रभाव पर्यावरण और समाज पर दिख रहा है। अभी गांधी के जन्मदिन की 150 वीं वर्षगांठ में लम्बा वक़्त है, तब तक देश स्वच्छता की दिशा में और आगे बढ़कर एक दिन अग्रिम पंक्ति में होगा।

परिचय - महेश तिवारी

मैं पेशे से एक स्वतंत्र लेखक हूँ मेरे लेख देश के प्रतिष्ठित अखबारों में छपते रहते हैं। लेखन- समसामयिक विषयों के साथ अन्य सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों पर संपर्क सूत्र--9457560896