गुरदई

गुरदई, सारे मुहल्ले की रौनक होती थी। उस की उम्र कितनी होगी, किसी को कभी ख्याल ही नहीं आया। उमर पूछ कर करना भी किया था, उस के मुंह और कलाइओं से ढुलकता हुआ मांस ही उस का बर्थसर्टीफिकेट था। गर्मियों के दिनों में उस की चारपाई नीम के पेड़ के नीचे होती और सर्दियों में वह गली में बैठी धूप का मज़ा लेती और गली में आने-जाने वाले लोगों से बातें करती रहती। जो भी कोई गुरदई के पास से गुज़रता, उस को बुला कर ही जाता। गुरदईये! सुना दे कोई मज़ेदार बात ! अक्सर बज़ुर्ग हंस कर उस को कहते। गुरदई ऐसा जवाब देती कि सब हँसे बगैर न रह सकते। छोकरे तो हर वक्त उस के पीछे पढ़े रहते, ओ अम्माँ ! कोई करारी गाली दे दे, दिन अच्छा बीत जाएगा। हैहा वे, तुम्हारे बाप का…. और उसी वक्त सारे कहकहाके लगाने लगते, औरतें भी हंसने लगतीं। ओ माई ! तू तो सोने की सीढ़ी चढ़ेगी, आगे भी तुझे सोने के महल मिलेंगे, कोई बोलता। गुरदई मुस्कराने लगती। गुरदई के बगैर तो जैसे सारा मोहल्ला सूना था और आज वह इस दुनिया को छोड़ गई थी। हर कोई उस की अर्थी को कन्धा देना चाहता था। मोहल्ला तो किया, सारा गाँव श्मशान भूमि तक उस की अर्थी के साथ गया था। गुरदई के पड़पोतों-लकड़पोतों ने उस को सोने की सीड़ी चढ़ाया था।
श्मशान घाट से आते वक्त मेहर सिंह और जवाला सिंह उदास उदास आते हुए गुरदई की बातें करते आ रहे थे। जवाला सिंह ! देख ले गुरदई कितनी जिगरे वाली औरत थी, हर वक्त हंसती रहती थी, ज़िंदगी में कितना इस ने सख्त काम किया, कितने दुःख उठाये, फिर भी इस का चेहरा हसूँ हसूँ करता रहता, मेहर सिंह बोला। हाँ मेहर सिंह, गुरदई जैसा फिर कभी पैदा नहीं होगा, तीन बेटे पैदा किये और विधवा हो गई, मर्दों की तरह खेतों में काम किया, बेटों को बड़ा किया और उन की शादियां कीं, पोत्रे हुए तो किसी के साथ खून-खराबे में बेटे मारे गए, पोत्रों का पाल पोषण करते बूढ़ी हो गई लेकिन खेती का काम उसी जोश के साथ करती रही, पोत्रों की शादियां कीं, पड़पोते हुए तो पोत्रे जहरीली शराब पी कर मर गए लेकिन पता नहीं गुरदई किस मट्टी की बनी हुई थी, आज देख लो इस के पड़पोतों-लकड़पोतों ने घर को कहाँ तक पहुंचा दिया, इस के घर में फिर से बहारें आ गई हैं, कितनी जमीन खरीद ली है। लेकिन एक बात की मुझे समझ नहीं आई, कि इस को कभी किसी ने रोते नहीं देखा, मुस्कराते-हँसते ही देखा, इतनी शक्ति तो किसी देवी में ही हो सकती है, वरना कोई औरत तो किया मर्द भी टूट कर बिखर जाता, जवाला सिंह बोला। सच्ची बात है, मेहर सिंह बोला, सुना है गुरदई के पड़पोते-लकड़पोते गुरदई के नाम पर कोई जगह बना रहे हैं। जवाला सिंह बोला, भाई यह तो बहुत अच्छी बात है, बनानी चाहिए भी और इस जगह में गुरदई की सारी ज़िंदगी की जद्दोजहद की कहानी भी लिखी जानी चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ियों को कुछ शिक्षा मिल सके। मेहर सिंह ने सर हिला कर सहमति जताई।

परिचय - गुरमेल सिंह भमरा लंदन

१९६२ में बीए फाइनल की पढ़ाई छोड़ कर इंग्लैण्ड चले गए. लन्दन में निवास कर रहे हैं. किताबें पढने और कुछ लिखने का शौक बचपन से ही रहा है। पिछले १३ वर्ष से रिटायर हैं और बोलने में कठिनाई की समस्या से पीड़ित हैं. पांच वर्ष से रेडिओ एक्सेल बर्मिंघम को कहानियाँ भेज रहे हैं. 'जय विजय' के लिए लघु कथाएँ लिखते हैं. संस्मरण लिख रहे हैं.