तड़प

राखी उस रोज भी कॉलेज न जाकर अपने प्रेमी अमर के साथ शहरी आबादी से बहुत दूर उस सुनसान जगह में एक झील के किनारे उसकी आगोश में भविष्य के सुनहरे सपनों में खोई हुई थी । मधुर सपनों की मधुरता का अहसास करते हुए वह इतनी खो गयी थी कि उसे अपने जिस्म पर घूमते हुए अमर के हाथों का स्पर्श भी अब भला लगने लगा था । इससे पहले कि अमर के हाथ मर्यादा का उल्लंघन कर पाते राखी की अंतर्चेतना जागृत हो उठी । अगले ही पल अमर की बांहों से फिसलती हुई राखी उठकर खड़ी हो गयी । लेकिन यह क्या ? किसी हिंसक पशु के समान अमर ने उसे दबोच लिया । इससे पहले कि वह अपने मकसद में कामयाब हो पाता , पता नहीं कहाँ से तीन युवक प्रकट हुए । अमर की जम कर धुनाई हुई और वह वहां से भाग गया । उन तीनों में से एक राखी की तरफ बढ़ा । दुसरे ने टोका ” दादा ! ये क्या करने जा रहे हो ? कोई भले घर की लड़की लग रही है । ”
” चुप बे छोटे ! भले और शरीफ़ घरों की लड़कियां किसी लड़के के साथ यूँ अकेले में रंगरेलियां मनाने नहीं आतीं । अगर हम नहीं आते तो वैसे भी इस लड़की का ……”
और कुछ पलों बाद वहां सिर्फ राखी की चीखें और उन दरिंदों के कहकहे गूंज रहे थे ।
इस घटना के बाद राखी तबियत खराब होने का बहाना बनाकर कुछ दिन घर में ही रही । अमर से संपर्क करने का हर प्रयास विफल साबित हुआ ।
लगभग एक महीने बाद राखी की नजर अमर पर पड़ी लेकिन वह अकेला नहीं था । उसकी मोटरसाइकिल पर कोई खूबसूरत लड़की बैठी हुई थी और वे उसी एकांत झील की तरफ बढ़ रहे थे ।
अपने साथ हुई दरिंदगी के लिए अमर को माफ कर चुकी राखी उस लड़की के लिए तड़प उठी और उसके कदम पुलिस स्टेशन की तरफ बढ़ने लगे ।

परिचय - राजकुमार कांदु

मुंबई के नजदीक मेरी रिहाइश । लेखन मेरे अंतर्मन की फरमाइश ।