जीवन तब तक जब तक जल है

प्रिय बच्चो,

जय हिंद,

कविता लिखना सीखते-सिखाते एक साल पूरा हो चला है. नए साल की आहट आने लगी है. बाज़ार सजने लगे हैं. कविता लिखना सीखने के क्रम में हम आपको अनेक विषयों पर कविता लिखना सिखाते रहे हैं. साल के इस आखिरी पड़ाव पर आज हम आपको इस क्रम में जीवन के लिए सबसे अधिक आवश्यक कारक पानी पर एक कविता से अवगत करवा रहे हैं-

जीवन तब तक जब तक जल है

 

जब नल में नहीं आता पानी,
मुझे याद आ जाती नानी.
पानी बिन कैसे मैं नहाऊं/
क्या ऐसे ही शाला जाऊं?
पानी सबकी प्यास बुझाए,
पानी बिन पौधे मुरझाए.
पानी से ही गूंदें आटा,
वरना हो रोटी से टाटा.
सब्ज़ी-दाल बनें पानी से,
अन्न-फल-फूल उगें पानी से.
पानी से हो साफ-सफाई,
इससे हो कपड़ों की धुलाई.
पानी से बनती है बिजली,
चाहे भारत हो या इटली.
कल-पुर्ज़े चलते पानी से,
यातायात चले पानी से.
पानी बिन मछली मर जाए,
कूलर भी कैसे चल पाए?
पानी से ही बनते बादल,
फिर वर्षा वे करते आकर.
पानी देता जीवनदान,
करता सब जग का कल्याण.
पानी बिन जीना मुश्किल है,
जीवन तब तक जब तक जल है.

 

इस कविता में हम आपको इस कविता की दो मुख्य विशेषताएं बता रहे हैं, जिनसे आपको कविता लिखने में सहायता मिलेगी. पहली दो पंक्तियों में एक मुहावरा है, नानी याद आ जाना. आप जानते ही हैं, कि मुहावरे भाषा को अधिक सशक्त बनाते हैं. यहां भी ऐसा ही है. यह मुहावरा कम शब्दों में पानी के महत्त्व को बता रहा है.

जब नल में नहीं आता पानी,
मुझे याद आ जाती नानी.

अंतिम दो पंक्तियां हैं-

पानी बिन जीना मुश्किल है,
जीवन तब तक जब तक जल है.

ये पंक्तियां अपने आप में एक पूरी कविता हैं और पानी की इस कवित्ता के सार को बता रही हैं. अंत में ऐसे पंक्तियों का आना कविता को बहुत खूबसूरती भी प्रदान करता है. इन्हीं खूबसूरत पंक्तियों के साथ इस साल के लिए विदा. अगले साल क्या सीखना है, यह आप लोग खुद बता सकें, तो अच्छा है. आने वाले नए साल की शुभकामनाओं के साथ-

आपकी नानी-दादी-ममी जैसी

— लीला तिवानी

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।