प्यार की खुशबू

सरिता अपनी ताई जी की करुण कहानी कभी भी नहीं भुला पाई. चार बेटे डॉक्टर, चार बहुएं डॉक्टर, पॉश कॉलोनी की एक ही लाइन में पांच कोठियां, एक में ताई जी और चार में उनके बेटे-बहुएं सपरिवार. ताऊजी के जाने के बाद बेटे-बहुओं ने बुजुर्ग और बीमार मां-सास की ओर से नज़र फेर ली थी. एक कामवाली बाई ही उनकी इकलौती सहायक थी. कभी देखती कि सिंक में एक भी बर्तन नहीं है, तो समझ जाती- ”आज मां जी की उठने की हिम्मत नहीं रही होगी.” वह चाय बनाती, मां जी को पिलाती, सब्ज़ी-रोटी भी बनाकर खिलाती. दवाई भी दे देती. एक बार वह दो दिन घर से निकल ही नहीं पाई, तीसरे दिन आई तो मां जी की ठंडी देह देखकर रो पड़ी. सारा मुहल्ला इकट्ठा हो गया. पता चलने पर घर के आठों डॉक्टर भी हिस्से-पत्ती के लिए आ गए थे.

सरिता के छः बेटे थे. उसने बेटों को बचपन से ही पाठ पढ़ा दिया था, कि पढ़ाने-लिखाने का प्रबंध हम करेंगे, पर आप सबको अपना काम संभालते हुए अपना घर खुद ही बनाना होगा. मैं एक ही बहू को अपने साथ रखूंगी, दूसरे बेटे की शादी होते ही पहली को अपनी गृहस्थी अलग बसानी होगी, चाहे घर अपना ले या किराए का. आज सभी बहुओं के साथ उसका बेटी जैसा रिश्ता था, वजह थी उनको सास से जी भरकर स्नेह-प्यार का मिलना. सभी के अपने-अपने घर, अपना-अपना काम, लेकिन सभी वार-त्योहार बारी-बारी से सभी बेटों-बहुओं के घर एक साथ बड़े स्नेह-प्यार के साथ मनाए जाते थे. सभी छोटी बहू को कहते थे- ”तूने बड़े पुण्य किए हैं, तेरे साथ मम्मी-पापा बहुत समय से रह रहे हैं.” उसका कहना था- ”काश, प्यार की ऐसी खुशबू हम भी अपने परिवार में फैला पाएं!”

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।