असार संसार

real viagra online pharmacy आ रहे बादल एकाएक,
पवन-पलने पर सिर को टेक.

 

जा रहे जल्दी ये उस पार,
ढूंढते आज जगत का सार.

 

सोचते जाते बादल के दल,
आता त्वरित झकोर अनल.

 

बिखर गए अब सारे बादल,
भंग हो स्वप्न गए सब टल.

 

तभी आया मन में यह विचार,
जगत असार, नहीं कुछ सार.

 

स्वप्न-सा देख चला जाता,
मानव छोड़ जगत-जंजाल.

 

स्वप्न भी होते पूर्ण कहां?
कामना होती चूर्ण यहां.

 

रहता मानव के उर खेद,
न जाने कैसा यह भेद!

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।