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आस्तिक व नास्तिक कौन?

ओ३म्

दो शब्द आस्तिक व नास्तिक का बहुधा प्रयोग होता है। मोटे रूप से आस्तिक ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास रखने वालों को कहते हैं और नास्तिक उन लोगों को कहते हैं जो ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं रखते। प्रश्न होता है कि लोग ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास क्यों रखते हैं और जो नहीं रखते वह क्यों नहीं रखते? इसका कारण हमें यह लगता है कि सृष्टि के आरम्भ काल से महाभारत काल व उसके बाद भी लोग वेदों के आधार पर ईश्वर की सत्ता को मानते रहे हैं। वेदों में ईश्वर के सत्य स्वरूप का वर्णन है। महाभारत काल तक यही स्वरूप आर्यावर्त वा भारत सहित विश्व के सभी देशों में विद्यमान था और सभी ईश्वर को मानते थे। महाभारतकाल के बाद भारत सहित सारे विश्व में वेदों का प्रचार प्रसार बाधित हुआ जिसके कारण भारत के लोग ईश्वर को तो मानते रहे परन्तु वेदों का प्रचार न होने, ऋषि व वैदिक विद्वानों की परम्परा के बाधित हो जाने के कारण भारत में ईश्वर विषयक अनेक भ्रान्तियां उत्पन्न हो गईं। वेदों में ईश्वर को निराकार और सर्वव्यापक बताया गया है। महाभारतकाल के बाद ऋषियों व विद्वानों की कमी के कारण ईश्वर निराकार व साकार दोनों माना जाने लगा। साकार वस्तु सर्वव्यापक नहीं हो सकती। वह एक देशी ही होती है। एकदेशी वस्तु सर्वत्र एक रस न होकर परमाणुओं व अणुओं से बनी होती है जो खण्डनीय होती है। मनुष्यों के शरीर भी प्रकृति के परमाणुओं से बने होने के कारण नाशवान, खण्डनीय व विकृति को प्राप्त होने वाले हैं। साकार ईश्वर की जो कल्पना महाभारत काल के बाद की गई उसमें साकार ईश्वर को मनुष्य की आकृति के अनुरूप चित्रित व स्वीकार किया गया। ईश्वर को साकार रूप में ऐतिहासिक महापुरुषों राम, कृष्ण एवं शिव आदि के रूप में स्वीकार किया गया। यह यह अनुमान होता है कि जिन लोगों ने ईश्वर के साकार रूप की कल्पना व अनुमान किया वह वेदों के यथार्थ ज्ञान से अनभिज्ञ थे। दूसरे शब्दों में हम उन्हें भ्रान्त मनुष्य मान सकते हैं।

ऋषि दयानन्द ने कहा है कि मूर्तिपूजा जैनियों से चली है और उन्होंने इसे अपनी अज्ञानता व मूर्खता से चलाया है। जैनियों से पूर्व विश्व में कहीं भी मूर्तिपूजा प्रचलित नहीं थी। इसका अर्थ हुआ कि इससे पूर्व राम, कृष्ण व शिव आदि को ईश्वर स्वीकार कर उनका पूजन व भक्ति आदि नहीं की जाती थी। महात्मा बुद्ध व महावीर स्वामी जी के काल में देश में यज्ञों में पशु हिंसा का प्रचार था। यह अनुमान होता है कि यह आर्य धर्म के कुछ वाममार्गी लोगों ने प्रचलित किया होगा जो मांसाहार करते होंगे। वेदों में स्पष्ट विधान है कि यज्ञ पूर्णतया अहिंसक कर्म है। यज्ञों को अध्वर कहा गया है जिसका अर्थ पूर्ण अहिंसक कार्य ही होता है। यज्ञों में यदि किसी भी प्रकार की हिंसा होती है तो वह यज्ञ न होकर हिंसात्मक कृत्य ही कहा जायेगा जो निन्दनीय एवं पाप कर्म होता है। ऐसे अन्धविश्वास एवं पाप कर्म तभी प्रचलित हो सकते हैं जब कि ज्ञान का अभाव हो गया हो। ऐसा ही ऋषि दयानन्द जी और आर्य विद्वानों की मान्यता है कि महाभारत काल के बाद वेद ज्ञान का प्रचार प्रसार बन्द हो गया था जिस कारण यज्ञों में हिंसा आरम्भ हुई और यज्ञों में पशुओं की यही हिंसा, अहिंसा पर आधारित बौद्ध व जैन मत का आधार बनी। यह भी तर्क से सिद्ध किया जा सकता है कि बौद्धों एवं जैनियों में जो मूर्तिपूजा प्रचलित हुई वह महात्मा बुद्ध एवं महावीर स्वामी जी के देहान्त के बाद हुई। उनके जीवन काल व उससे पूर्व भारत में मूर्तिपूजा नहीं थी। यह मूर्तिपूजा ईश्वर के निराकार एवं सर्वव्यापक स्वरूप के विपरीत व उलटी है, अतः यह असत्य है। मूर्तिपूजा ईश्वर पूजा का पर्याय नहीं है। इसका एक कारण यह है कि ईश्वर चेतन है और चेतन पदार्थ ज्ञानवान व कर्मों का करने वाला होता है। इसके विपरीत मूर्ति चेतन न होकर जड़ होती है और उसमें ज्ञान व कर्म करने की सामर्थ्य नहीं होती। यह व ऐसे अनेक कारण थे जिससे ऋषि दयानन्द जी को मूर्तिपूजा का खण्डन करना पड़ा।

इस मूर्तिपूजा व फलित ज्योतिष आदि कारणों से ही हम पहले मुसलमानों के और उसके बाद ईसाईयों के गुलाम बने। इन अन्धविश्वासों के कारण ही कालान्तर में कुछ अज्ञानियों ने समाज में जन्मना जातिवाद का प्रचलन किया। पहले वेदों के आधार पर समाज में चार वर्ण ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र होते थे। यह वर्ण गुण, कर्म व स्वभाव पर आधारित थे। यदि किसी ब्राह्मण सन्तान में वेदों का ज्ञान व तदनुरूप कर्म नहीं होते थे तो उसके गुण, कर्म व स्वभाव के अनुसार ही उसका वर्ण निर्धारित किया जाता था। कालान्तर में अज्ञान, अन्धविश्वासों व ऐसे अनेक कारणों से जन्मना जातिवाद का आरम्भ हुआ। इस प्रकार महाभारत काल तक वेदों पर आधारित ईश्वर का सत्य स्वरूप अज्ञान व अन्धविश्वासों के कारण साकार माना जाने लगा और धारणा, ध्यान व समाधि द्वारा ईश्वर की उपासना न करके मूर्तिपूजा को भोग लगाने, शिवलिंग पर जल चढ़ाने तथा मूर्तियों पर फल, फूल, पत्र और धन चढ़ाना आरम्भ हो गया। इन पर चढ़ाये गये इन पदार्थों पर पुजारी अधिकार कर लेते थे और यह उनकी आजीविका बन गया। ईश्वर के निराकार, सर्वव्यापक, ज्ञान स्वरूप व प्रकाश स्वरूप के विपरीत होने के कारण व वेदानुरूप ईश्वर को न मानने व उपासना करने वाले मूर्तिपूजकों को आस्तिक नहीं कहा जा सकता। वस्तुतः यह नास्तिक व अर्धनास्तिक ही कहे जा सकते हैं।

मनुस्मृति में कहा गया है कि वेद निन्दक को नास्तिक कहते हैं। इसका एक अर्थ यह भी होता है कि जो वेदानुसार व वेदानुकूल ईश्वर के स्वरूप को नहीं मानता वह नास्तिक होता है। आजकल विश्व में केवल आर्यसमाज ही एक ऐसा संगठन व आन्दोलन है जिसके अनुयायी वेद व इसकी मान्यताओं को शतप्रतिशत मानते हैं। वह अपने आपको वैदिकधर्मी मानते व कहते हैं। वह न तो मूर्तिपूजा करते हैं और न मन्दिर, मठ, गुरुद्वारा, चर्च या मस्जिद की तरह भवन आदि बनाते हैं। आर्यसमाज के अनुयायी अपने उपासना गृह यज्ञशाला व सत्संग भवनों में वेद की मान्यताओं के अनुरूप ईश्वर की ध्यान व उपासना ही करते हैं। आर्यसमाज अपने जो मन्दिर व भवन बनाता है वह यज्ञ व सत्संग करने के लिए बनाये जाते हैं। आर्यसमाजों में दैनिक यज्ञ करने का विधान है और सत्संग हाल में प्रत्येक रविवार व अन्य कुछ अवसरों पर वेदकथा, सत्संग आदि होते हैं जिसका उद्देश्य अपने सदस्यों में वेदों की मान्यताओं के अनुसार जीवन व्यतीत करने की शिक्षा देना है। आर्यसमाज के ईश्वरोपासना व अन्य सभी सिद्धान्त वेद की मान्यताओं पर आधारित है जो तर्क की कसौटी पर भी पूर्णतः खरे हैं। ऋषि दयानन्द जी ने अपने जीवनकाल में सभी मतों के विद्वानों, आचार्यों को शास्त्रार्थ व वार्तालाप करने की चुनौती दी थी। प्रायः सभी प्रमुख मतों के आचार्यों से उनके शास्त्रार्थ व वार्तालाप हुए भी और उसमें ऋषि दयानन्द के वेदों पर आधारित विचार व मान्यतायें ही युक्तियुक्त व सत्य पाई गईं। अतः पूर्ण आस्तिक मत यदि कोई है तो वह आर्यसमाज द्वारा प्रचारित वैदिक धर्म ही है। अन्य मतों में कुछ बातें वैदिक मत के अनुकूल हो सकती हैं परन्तु उनमें ईश्वर संबंधी अनेक बातें वेद के विपरीत भी होने से उन्हें व उनके अनुयायियों को पूर्ण आस्तिक नहीं कहा जा सकता। वह जिस सीमा तक वेद की मान्यताओं को मानते हैं उस सीमा तक आस्तिक हैं अन्यथा वह नास्तिक ही हैं। यह भी तथ्य है कि बौद्ध व जैन मत ईश्वर को न मानने के कारण नास्तिक मत हैं। ऐसा ही ऋषि दयानन्द जी का मत हैं। ईसाई आदि इतर मतों में ईश्वर को पांचवें वा सातवें आसमान पर बताया गया है। इसका अर्थ ईश्वर का एकदेशी होना है। किसी स्थान विशेष पर रहने वाला ईश्वर सर्वव्यापक नहीं हो सकता। अतः वेद की मान्यताओं के विपरीत मान्यतायें होने से वह सब नास्तिक ही कहे जायेंगे।

संसार के सभी मनुष्यों का कर्तव्य हैं कि वह ईश्वर प्रदत्त ज्ञान वेदों का अध्ययन करें और ईश्वर विषयक मान्यताओं पर गहराई व गम्भीरता से विचार कर आर्य विद्वानों से वार्तालाप व शास्त्रार्थ करें। स्वामी शंकाराचार्य जी ने भी जैन मत के आचार्यों से शास्त्रार्थ किया था और ईश्वर के अस्तित्व को सिद्ध किया था। आज भी ईश्वर विषयक सत्य ज्ञान के प्रचार प्रसार के लिए सभी मतों के आचार्यों को सत्य के निर्णयार्थ परस्पर प्रीतिपूर्वक शास्त्र चर्चा, वार्तालाप व शास्त्रार्थ करना चाहिये। तर्क व विवेचना कर जो सत्य हो उसे सभी मतों व उनके आचार्यों को स्वीकार करना चाहिये। ईश्वर एक है और वेद वर्णित उसके गुण, कर्म व स्वभाव भी सत्य हैं। उनको मानकर ही लोग आस्तिक कहलाने के अधिकारी हो सकते हैं अन्यथा वेद निन्दा व वेद को न मानने के कारण वह नास्तिकता की श्रेणी में ही आते हैं। ‘नास्तिको वेद निन्दकः’ का यही अभिप्राय प्रतीत होता है। इसी के साथ इस चर्चा को विराम देते हैं। ओ३म् शम्।

मनमोहन कुमार आर्य