नव संवत तराना

नया संवत है सुंदर-सा तराना मिलके गाना है
मिली हैं जो मधुर यादें उन्हें संग लेके जाना है-

न मंदिर-मस्जिद के झगड़े में अपनी ताकत खोएंगे
पढ़ाकर पाठ मानवता का सारे जग को जगाना है-

नहीं है भेद कोई भी सभी को एक मानेंगे
सभी का एक ही दाता उसी के गीत गाना है-

कभी सुख है कभी दुख है न यूं ही धीरज खोएंगे
निकालेंगे कोई रस्ता दुःखों से क्या घबराना है-

भले छए घटा काली, उजालों को बिछा देंगे
ये जीवन चलता जाएगा, घटाओं को बताना है-

नया संवत है सुंदर-सा तराना मिलके गाना है
मिली हैं जो मधुर यादें, उन्हें संग लेके जाना है-

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।