बोझ

”मैं 13 साल की बच्ची नंदिता हूं, स्कूल बैग के बोझ तले पूरी तरह दबी हुई.”
”क्या कहा आपने? स्कूल बैग के बोझ भी कोई बोझ होता है?”
”सच है, आप मेरी पीड़ा महसूस कैसे कर सकते हैं? आपके जमाने में न तो इतनी मोटी किताबें होती थीं, और न ही इतनी मोटी-मोटी होम वर्क और क्लास वर्क की कॉपियां. अब आपके कंधे तो मजबूत हैं न! मैं खुद कच्ची कली और मेरे कंधे भी नाजुक-नाजुक, कोमल-कोमल. इतने भारी स्कूल बैग के बोझ को संभालना भला मेरे बस की बात कहां?”
”ममी मेरे दर्द को समझती हैं, इसलिए बस स्टॉप तक मेरा स्कूल बैग ढोकर चलती हैं, उसके बाद तो सारा दिन मुझे ही संभालना होता है न!” 
”स्कूल के अध्यापक इसे कहां समझते हैं? हर पीरियड के अध्यापक को मोटी-मोटी किताब भी हमारे बैग में चाहिए होती है, साथ ही होम वर्क कॉपी और क्लास वर्क कॉपी भी.”
”कई बार एक भी किताब-कॉपी का काम नहीं पड़ता, उस दिन तो लगता है, कि बेगार ही की है.”
”ख़ैर, अब मैंने ”स्कूल बैग” नाम की इस फिल्म में भारी बैग से होने वाली परेशानियों और बच्चों पर पड़ने वाले बोझ को दिखाया है. मेरी फिल्म को नैशनल साइंस फिल्म फेस्टिवल में स्क्रीनिंग के लिए चुना गया है. 16 अन्य फिल्मों के साथ इसे भी बच्चों के ‘डी वर्ग’ में शामिल किया गया है. आपको मौका मिले तो अवश्य देखिएगा और इसका कुछ हल निकालिएगा.”
”ऐसा न हो, कि स्कूल बैग के बोझ तले दबकर मेरे नाजुक कंधे सर्वाइकल पेन से पीड़ित हो जाएं.”
”अच्छा, अब मैं आपसे विदा ले रही हूं, स्कूल बैग के बोझ को फिर से ढोने के लिए.”

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।