धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

दलित संत और श्री राम

डॉ अम्बेडकर जी के नाम के मध्य रामजी (जो उनके पिता का नाम था) जोड़े जाने पर कुछ तथाकथित अम्बेडकरवादी हो हल्ला कर रहे है। उनके हो हल्ले का मुख्य उद्देश्य केवल सत्य को स्वीकार न करने की उनकी पुरानी आदत है। सत्य सूर्य के समान है जो कुछ काल के लिए बादलों में छुप तो सकता है मगर बादल हटने पर दोबारा से प्रकाशित होने से कोई भी नहीं रोक सकता। में इसी सिद्धांत का प्रतिपादन किया जायेगा। भारतभूमि में उत्पन्न हुए समाज सुधारकों में से तीन महात्माओं का नाम दलित समाज में बड़ी श्रद्धा से लिया जाता है। वाल्मीकि, कबीर और रविदास। ध्यान देने योग्य बात यह है कि इन तीनों के चिंतन में श्री राम इस प्रकार से व्याप्त है जैसे जल के दो गिलासों को मिला दो तो उन्हें कोई भी अलग नहीं कर सकता।
ऋषि वाल्मीकि और श्री राम
ऋषि वाल्मीकि त्रेता युग में हुए थे। आप रामायण महाकाव्यम के रचियता, श्री राम और अन्य दसरथ पुत्रों के गुरु, प्राचीन वेद विद्या के पारंगत विद्वान थे। आपके विषय में यह भ्रान्ति उड़ा दी गई कि आप चोर अथवा डाकू थे जबकि ऐसा कुछ नहीं था। आपके बारे में दूसरी भ्रान्ति यह उड़ा दी गई कि आप इतने अज्ञानी थे कि आप राम राम शब्द का उच्चारण तक न सीख सके तो आपको मरा मरा का उच्चारण सिखाया गया ताकि आप मरा मरा करते करते राम राम कहना सीख जाये। यह भी भ्रांति है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि उस काल में अयोध्याय के प्रतापी राजा दशरथ के चारों पुत्रों को शिक्षा देने का सौभाग्य उस काल के सबसे विद्वान गुरु को मिला चाहिए। यह श्रेय ऋषि वाल्मीकि को मिलना यही सिद्ध करता है कि न वे डाकू थे, न ही अज्ञानी थे। अपितु महान विद्वान थे। ऋषि वाल्मीकि ने उन्हीं के शिष्य श्री राम के महान और अनुकरणीय जीवन को लेखबद्ध कर रामायण महाकाव्यम का लेखन किया। उस काल के सबसे बड़े विद्वानों में से एक ऋषि वाल्मीकि द्वारा उस काल के धरती पर सबसे मर्यादित, पुरुषोत्तम, वैदिक धर्मी श्री राम का चरित लिखना यही सिद्ध करता हैं कि ऋषि वाल्मीकि श्री राम के जीवन से कितने प्रभावित थे। यही काव्य कालांतर में वाल्मीकि रामायण के नाम से प्रसिद्द हुआ और लाखों वर्षों से भारतीय ही नहीं वैश्विक जनमानस का मार्गदर्शन करता आया हैं। ऋषि वाल्मीकि की इतनी प्रतिष्ठा थीं कि उनके नाम से कालांतर में एक बड़ा वर्ग अपना उपनाम वाल्मीकि लिखने लगा। यह परम्परा कब, कैसे आरम्भ हुई। यह इतिहास अन्वेषण का विषय है। मगर इस परम्परा का स्पष्ट उद्देश्य श्री राम के गुरु वाल्मीकि को मान-सम्मान देना है। मुग़ल काल में जिस समाज ने ऋषि वाल्मीकि को सबसे अधिक मान दिया उसे इस्लमिक शासकों ने दो ही विकल्प दिए। पहला इस्लाम स्वीकार करने का और दूसरा अछूत या बहिष्कृत कहलाने का। इस समाज ने इस्लाम स्वीकार करने के स्थान पर मैला ढोना स्वीकार किया। जज़िया के स्थान पर अपमान स्वीकार किया। मगर अपने पूर्वजों का धर्म नहीं छोड़ा। यही कारण है कि आज भी वाल्मीकि समाज और हिन्दू राजपूतों के गोत्र एक ही मिलते है। ऐसे समाज ने जिसने श्री राम के गुरु वाल्मीकि को अपना आदर्श बनाया। उससे आप जैसे वाल्मीकि को अलग नहीं कर सकते वैसे ही श्री राम को भी अलग नहीं कर सकते।
अब चाहे कोई कितना भी हो हल्ला करे। सत्य यही है।
संत कबीर और श्री राम
कबीर दास का नाम दलित समाज में बड़े सम्मान से लिया जाता है। कबीर ने धर्म में प्रचलित कुप्रथाओं पर प्रहार किया लेकिन राम और हरि पर अटूट आस्था भी बनाये रखी। उनकी चंद साखियां नीचे दी जा रही हैं, जो साबित करती हैं कि वो श्री राम के कितने बड़े भक्त थे।
1- कबीर कूता राम का, मुतिया मेरा नाऊं ।
गले राम की जेवड़ी, जित खैवें तित जाऊं ।।
अर्थ: कबीर दास कहते हैं कि मैं तो राम का ही कुत्ता हूं और नाम मेरा मुतिया(मोती) है। गले में राम नाम की जंजीर पड़ी हुयी है। मैं उधर ही चला जाता हूं जिधर मेरा राम मुझे ले जाता है।
2- मेरे संगी दोई जण, एक वैष्णों एक राम ।
वो है दाता मुकति का, वो सुमिरावै नाम।।
अर्थ: कबीर साहिब कहते हैं कि मेरे तो दो ही संगी साथी हैं- एक वैष्णव और दूसरा राम। राम जहां मुक्तिदाता हैं वहीं वैष्णव नाम स्मरण कराता है। यहां भी डा. अंबेडकर और संत कबीर विपरीत ध्रुवों पर खड़े साबित होते हैं।
3- क्यूं नृप-नारी नींदिये, क्यूं पनिहारिन कौ मान।
मांग संवारै पील कौ, या नित उठि सुमिरै राम।।
अर्थ : कबीर साहिब कहते हैं कि रानी को यह नीचा स्थान क्यूं दिया गया और पनिहारिन को इतना ऊंचा स्थान क्यूं दिया गया? इसलिये कि रानी तो अपने राजा को रिझाने के लिये मांग संवारती है, श्रृंगार करती है लेकिन वह पनिहारिन नित्य उठकर अपने राम का सुमिरन करती है।
4 -दुखिया भूखा दुख कौं,सुखिया सुख कौं झूरि।
सदा अजंदी राम के, जिनि सुखदुख गेल्हे दूरि।।
अर्थ: कबीर कहते हैं कि दुखिया भी मर रहा है और सुखिया भी- एक बहुत अधिक दुख के कारण और अधिक सुख के कारण । लेकिन रामजन सदा ही आनंद में रहते हैं।क्योंकि उन्होंने सुख और दुख दोनों को दूर कर दिया है।
5- मैं जाण्यूं पढ़िबो भलो, पढ़िबो से भलो जोग।
राम नाम सूं प्रीति करी, भल भल नीयौ लोग ।।
अर्थ: कबीर साहिब कहते हैं- पहले मैं समझता था कि पोथियों का पढ़ा बड़ा आदमी है। फिर सोचा कि पढ़ने से योग साधन कहीं अच्छा है। लेकिन अब इस निर्णय पर पहुंचा हूं कि राम नाम से ही सच्ची प्रीति की जाये तो ही उध्दार संभव है।
6- राम बुलावा भेजिया, दिया कबीरा रोय ।
जो सुख साधु संग में, सो बैकुंठ न होय ।।
अर्थ: कबीर कहते हैं कि जब मेरे को लाने के लिये राम ने बुलावा भेजा तो मुझसे रोते ही बना। क्योंकि जिस सुख की अनुभूति साधुओं के सत्संग में होती है वह बैकुंठ में नहीं।
7- वैध मुआ रोगी मुआ, मुआ सकल संसार ।
एक कबीरा ना मुआ, जेहि के राम अधार ।।
अर्थ: कबीर दास कहते हैं कि वैद्य, रोगी और संसार नाशवान होने के कारण ही उनका रूप-रूपांतर हो जाता है।लेकिन जो राम से आसक्त हैं वो सदा अमर रहते हैं।
कबीर वाणी में ऐसे आपको अनेक उदहारण मिलते हैं जिनमें संत कबीर श्री राम को आराध्य रूप में स्वीकार करते है। श्री राम के नाम से चिढ़ने वाले अम्बेडकरवादियों क्या तुम इस सत्य को जुठला सकते हो।
संत रविदास और श्री राम
चमार (चर्मकार) कुल में पैदा हुए संत रविदास श्री राम जी के सम्मान में भक्ति इस प्रकार से करते है।
1. हरि हरि हरि हरि हरि हरि हरि
हरि सिमरत जन गए निस्तरि तरे।१। रहाउ।।
हरि के नाम कबीर उजागर ।। जनम जनम के काटे कागर ।।१।।
निमत नामदेउ दूधु पिआइआ।। तउ जग जनम संकट नहीं आइआ ।।२।।
जन रविदास राम रंगि राता ।। इउ गुर परसादी नरक नहीं जाता ।।३।।
– आसा बाणी स्त्री रविदास जिउ की, पृष्ठ 487
सन्देश- इस चौपाई में संत रविदास जी कह रहे है कि जो राम के रंग में (भक्ति में) रंग जायेगा वह कभी नरक नहीं जायेगा।
2. जल की भीति पवन का थंभा रकत बुंद का गारा।
हाड मारा नाड़ी को पिंजरु पंखी बसै बिचारा ।।१।।
प्रानी किआ मेरा किआ तेरा।। जेसे तरवर पंखि बसेरा ।।१।। रहाउ।।
राखउ कंध उसारहु नीवां ।। साढे तीनि हाथ तेरी सीवां ।।२।।
बंके वाल पाग सिरि डेरी ।।इहु तनु होइगो भसम की ढेरी ।।३।।
ऊचे मंदर सुंदर नारी ।। राम नाम बिनु बाजी हारी ।।४।।
मेरी जाति कमीनी पांति कमीनी ओछा जनमु हमारा ।।
तुम सरनागति राजा राम चंद कहि रविदास चमारा ।।५।।
– सोरठी बाणी रविदास जी की, पृष्ठ 659
सन्देश- रविदास जी कह रहे है कि राम नाम बिना सब व्यर्थ है।
क्या अम्बेडकरवादी श्री राम को वाल्मीकि, कबीर और रविदास से अलग कर सकते है? नहीं। मध्य काल के दलित संत हिन्दू समाज में व्याप्त छुआछूत एवं धर्म के नाम पर अन्धविश्वास का कड़ा विरोध करते थे, मगर श्री राम को पूरा मान देते थे। उनका प्रयोजन केवल समाज सुधार था। आज के कुछ अम्बेडकरवादी दलित साहित्य के नाम पर ऐसा कूड़ा परोस रहे है, जिसका उद्देश्य केवल हिन्दू समाज की सभी मान्यताओं जैसे वेद, गौ माता, तीर्थ, श्री राम, श्री कृष्ण आदि को गाली देना भर होता हैं। इस सुनियोजित षड़यंत्र का उद्देश्य समाज सुधार नहीं अपितु परस्पर वैमनस्य फैला कर आपसी मतभेद को बढ़ावा देना है। हम सभी देशवासियों का जिन्होंने भारत की पवित्र मिटटी में जन्म लिया है, यह कर्त्तव्य बनता है कि इस जातिवाद रूपी बीमारी को जड़ से मिटाकर इस हिन्दू समाज की एकता को तोड़ने का सुनियोजित षड़यंत्र विफल कर दे। अम्बेडकरवाद तो केवल बहाना है असली उद्देश्य तो देश की एकता को तोड़ना है।
— डॉ विवेक आर्य