कवितापद्य साहित्य

शिक्षा प्रेम की

१..शिक्षा प्रेम की पर नफरत बढ़ती रही
जिन्दा थी कभी अब लाश होती रही |

२..बेइज्जत नारी की भरे बाजार कर दी
कोफ़्त उस कामी के प्रति जगती रही |

३..हिम्मत दिखाती तो बचा लेती शायद
दिन रात बस यही सोच सोच कुढ़ती रही |

४..अहम् मार सर झुकाए खड़ी चौराहें पर
बुद्धू कह हम पर ही उँगलियाँ उठती रही |

५..स्नेह का आँचल फैला दिया था अम्बर तक
मासूमियत ही अपनी खता बनती रही |

६…कलियों को मसल फेंक दिया अँधेरे में
दरिंदगी के पाश में कई जकड़ती रही |

७..शैतान के अन्दर का जाग उठा इंसान
हैवानियत फिर भी अपार होती रही |

८…दोजख का भी डर काफूर होता गया
दुनिया बढ़-चढ़ कर पाप करती रही |

९…जींस टाप पहन रहती माएं फिगर बनाए
ऐसी नार पुरुषो की नजर में चुभती रही |

१०..दूध का कर्ज चुकाना हुआ मोहाल अब
पिलाया क्या दुनिया कुतर्की होती रही |

११.. क्या हाल तूने अपना बना डाला सविता
मजलूम कोई तू खुद को ही कोसती रही |
–००–

*सविता मिश्रा

श्रीमती हीरा देवी और पिता श्री शेषमणि तिवारी की चार बेटो में अकेली बिटिया हैं हम | पिता की पुलिस की नौकरी के कारन बंजारों की तरह भटकना पड़ा | अंत में इलाहाबाद में स्थायी निवास बना | अब वर्तमान में आगरा में अपना पड़ाव हैं क्योकि पति देवेन्द्र नाथ मिश्र भी उसी विभाग से सम्बध्द हैं | हम साधारण गृहणी हैं जो मन में भाव घुमड़ते है उन्हें कलम बद्द्ध कर लेते है| क्योकि वह विचार जब तक बोले, लिखे ना दिमाग में उथलपुथल मचाते रहते हैं | बस कह लीजिये लिखना हमारा शौक है| जहाँ तक याद है कक्षा ६-७ से लिखना आरम्भ हुआ ...पर शादी के बाद पति के कहने पर सारे ढूढ कर एक डायरी में लिखे | बीच में दस साल लगभग लिखना छोड़ भी दिए थे क्योकि बच्चे और पति में ही समय खो सा गया था | पहली कविता पति जहाँ नौकरी करते थे वहीं की पत्रिका में छपी| छपने पर लगा सच में कलम चलती है तो थोड़ा और लिखने के प्रति सचेत हो गये थे| दूबारा लेखनी पकड़ने में सबसे बड़ा योगदान फेसबुक का हैं| फिर यहाँ कई पत्रिका -बेब पत्रिका अंजुम, करुणावती, युवा सुघोष, इण्डिया हेल्पलाइन, मनमीत, रचनाकार और अवधि समाचार में छपा....|