चंद्रमा

दादी कहती थी, ”चंदा में,
बुढ़िया चरखा चलाती है”,
नानी कहती थी, ”नहीं-नहीं,
उसमें खरगोश का नाती है”.

जब मानव पहुंचा चंद्रलोक,
बुढ़िया भी न थी, खरगोश भी न था,
बस ऊबड़-खाबड़ क्रेटर थे,
वायुमंडल तक तो भी न था.

अब चंद्रमुखी कहलाने में,
आएगी शर्म ललनाओं को,
हम सुधानिधि और कलानिधि में,
खोज न पाए कलाओं को.

औषधिपति कैसे कहें इसे?
इसमें औषधि का नाम नहीं,
दीर्घायु बनाना पतियों को,
है इसके बस का काम नहीं.

सागर का पुत्र कहें कैसे?
इसका भी कोई प्रमाण नहीं,
ज्वालामुखी पर्वत तो हैं,
जल का तो कहीं भी नाम नहीं.

कवि ढूंढ रहे नव उद्दीपन,
बच्चे भी सबसे पूछ रहे,
अब दूध-मलाई लाने को,
चंदामामा से कौन कहे?

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।