लेख

शब्दों में बहुत शक्ति है। शब्द मरते हुए व्यक्ति को संजीवनी प्रदान कर सकते हैं तो किसी स्वस्थ व्यक्ति के लिए विष का कार्य भी कर सकते हैं। किसी को आकाश की ऊँचाई तक ले जा सकते हैं तो किसी को रसातल में भी पहुंचा सकते हैं। ये सब हमारे प्रयोग पर निर्भर है। हमारे शब्दों के तरकश में जो सबसे अमोघ बाण हैं उसका हम सही ढंग से प्रयोग नहीं करते और वो बाण है प्रशंसा के कुछ शब्द। आज लगभग हर दंपति जिनके विवाह को एक अंतराल बीत गया है उन्हें साधारणतया ये शिकायत रहती है कि हमारा दाम्पत्य जीवन नीरसता की कगार पर पहुंच गया है। जीवन एक बंधे-बंधाए ढर्रे पर चलने लग रहा है जिसमें से प्रेम, रोमांच इत्यादि सब तत्व वाष्पीभूत हो गए हैं। ये सब इसलिए हो रहा है कि हम एक-दूसरे की प्रशंसा करना भूल गए हैं। पति ये समझता है कि पत्नी जो भी कर रही है उसके एवं परिवार के लिए ये तो उसका धर्म है, उसका कर्तव्य है एवं कर्तव्य के लिए क्या धन्यवाद देना। यही बात पत्नी पर भी लागू होती है। प्रसिद्ध विचारक मार्क ट्वेन ने एक बार कहा था कि प्रशंसा के एक वाक्य से मैं दो महीना जीवित रह सकता हूँ। इससे प्रशंसा के महत्व का ज्ञान होता है। ये समस्या यूँ तो वर्षों-वर्ष से चली आ रही है परंतु सोशल मीडिया के अधिक प्रचलन से इसका रूप विकृत होता जा रहा है। पति की या जवान होते बच्चों की या सास-ससुर की उपेक्षा का शिकार किसी नारी की जब कोई दूसरा व्यक्ति प्रशंसा करता है तो न चाहते हुए भी उस व्यक्ति के प्रति उस नारी के मन में कोमल भावनाएँ उत्पन्न हो जाती हैं। यही स्थिति अपने घर में उपेक्षित अनुभव कर रहे पुरूष की भी होती है। कभी-कभी कोई समान रूचि भी इन दो अनजान व्यक्तियों को समीप लाने का कार्य करती है। इन संबंधों में कुछ संबंध निर्दोष भी होते हैं परंतु प्रायः इन दोनों में से एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति का आर्थिक, शारीरिक या मानसिक शोषण करने की निश्चित योजना के तहत धीरे-धीरे उसको जाल में फंसाता है। इस प्रकार के संबंधों के अंत में दोनों में से एक व्यक्ति को जीवन भर न भरने वाला घाव ही मिलता है। कभी-कभी तो अपराध बोध से वो अवसाद ग्रस्त भी हो जाता है। अब प्रश्न ये उठता है कि इन सबसे बचने का क्या उपाय है? मेरे विचार में तो सबसे सरल और सीधा उपाय ये है कि पति-पत्नी को थोड़ा समय एक-दूसरे को अवश्य देना चाहिए और छोटी-छोटी बातों पर प्रशंसा करने से चूकना नहीं चाहिए। मैं झूठी प्रशंसा या खुशामद करने को नहीं कह रहा हूँ परंतु पत्नी द्वारा सख्त परिश्रम से बनाए गए खाने के स्वाद का बखान करना कोई ज्यादा कठिन कार्य नहीं है। इसी प्रकार पति द्वारा अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए अथक प्रयासों की या गृह-कार्य में उसके द्वारा की गई छोटी-मोटी सहायता की प्रशंसा करने में कोई हानि नहीं है। किसी खास अवसर पर तैयार हुए पति या पत्नी की प्रशंसा में कहे गए कुछ शब्द उनको कितनी प्रेरणा और प्रसन्नता दे सकते हैं आप अनुमान भी नहीं लगा सकते। आप सब अपने फेसबुक के किसी मित्र की या वाट्सअप्प पर परिचय में आए किसी मित्र की जितनी प्रशंसा करते हैं आप स्वयं सोचिए क्या आप उतनी प्रशंसा अपने पति या पत्नी की करते हैं? यदि इसका जवाब ना है तो आप बहुत बड़ी गलती कर रहे हैं। ये भी हो सकता है जिस समय आप अपनी प्रशंसा सुनकर इतरा रहे हों या किसी की प्रशंसा के पुल बाँधने में व्यस्त हों ठीक उसी समय आपका जीवनसाथी भी यही कर रहा हो। और आप विश्वास रखिए कि आपके बीमार होने की स्थिति में या अन्य किसी कठिनाई में आपका जीवनसाथी ही आपके साथ खड़ा रहेगा और आपको उबरने में सहयोग देगा। ये तथाकथित बौद्धिक संबंध किसी काम नहीं आने वाले। मैं ऐसे सोशल मीडिया में बनने वाली मैत्री के विरूद्ध नहीं हूँ। स्वयं मुझे भी बहुत अच्छे मित्र यहां मिले हैं परंतु इस प्रकार के संबंधों की एक सीमा तय होनी चाहिए एवं किसी भी परिस्थिति में उस सीमा को लांघने का प्रयास न स्वयं करना चाहिए एवं न किसी को करने देना चाहिए। यदि आपके वास्तविक जीवन के संबंधों में उष्मा होगी तो आप कभी भी इन आभासी संबंधों के जाल में उलझेंगे नहीं जिसमें अंततः हाथ रीते ही रह जाते हैं। छोटी-छोटी बातों पर जीवनसाथी की प्रशंसा इन संबंधों की उष्मा बनाए रखने में बहुत सहायक है। इसलिए जब भी आपका जीवनसाथी कुछ अच्छा काम करिए उसकी मुक्त कंठ से प्रशंसा करिए। फिर देखिए वो कैसे प्रेम की रस-वर्षा में आपको सराबोर कर देता है।

मंगलमय दिवस की शुभकामनाओं सहित आपका मित्र :- भरत मल्होत्रा।