गज़ल

जीवन मेरा बस एक ढलती शाम होकर रह गया
अपने ही मैं शहर में गुमनाम होकर रह गया
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खुदा को इंसान से कितनी उम्मीदें थीं मगर
अपनी ख्वाहिशों का ये गुलाम होकर रह गया
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मिट्टी में मिल गए इरादे आसमां छूने के सब
कुछ भी न कर पाया मैं नाकाम होकर रह गया
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इश्क के चक्कर में जो पड़ा वो गया काम से
कोई मजनूं तो कोई गुलफाम होकर रह गया
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दिन ढला तो सायों के कद भी बड़े होने लगे
सूरज तमाशा-ए-लब-ए-बाम होकर रह गया
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आभार सहित :- भरत मल्होत्रा।