“छन्द हो गये क्ल्ष्टि”

जब बालक की पीठ पर, लदा दुआ हो भार
पढ़ने के सपने कहाँ, फिर होंगे साकार।।

चमत्कार से के फेर में, छन्द हो गये क्ल्ष्टि।
होते नहीं विशिष्ट वो, जो होते हैं श्लिष्ट।।

पूरब से होता शुरू, प्रतिदिन जीवन सत्र।
दिनचर्चा के भेजता, सूरज लिखकर पत्र।।

टंकण करने में लगा, काम जरूरी छोड़।
गुणा-भाग के फेर में, भूल गया हूँ जोड़।।

जिसके सिर पर ताज हो, होता उसका नाम।
जोड़-तोड़ से चल रहे, अब तो सबके काम।।

मुखपोथी पर बढ़ रहे, आभासी अनुबन्ध।
सोच-समझ कर कीजिए, लोगों से सम्बन्ध।।

आ जाते हैं जब कभी, पीड़ा के आयाम।
अधरों पर तब थिरकता, परमपिता का नाम।।

नहीं हमेशा फूलता, चोरी का व्यापार।
चोरी के बल पर नहीं, होता बेड़ा पार।।

श्रम करके भी श्रमिक तो, रहा मजे से दूर।
खाता नहीं हराम का, जो होता मजदूर।।

टाँग अड़ाने के लिए, टाँगों का उपयोग।
अच्छे लोगों पर सदा, लगते हैं अभियोग।।

खाते-पीते खूब है, मगर न करते काम।
अफसर-जनसेवक हुए, मानो अक्षरधाम।।

जिनका केवल रह गया, रिश्वतखोरी काम।
वो जनसेवक कर रहे, सत्ता को बदनाम।।

कृषक हमारे देश में, करते चीख-पुकार।
तेल डालकर कान में, बैठी है सरकार।।

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

परिचय - डॉ रूपचन्द शास्त्री 'मयंक'

एम.ए.(हिन्दी-संस्कृत)। सदस्य - अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग,उत्तराखंड सरकार, सन् 2005 से 2008 तक। सन् 1996 से 2004 तक लगातार उच्चारण पत्रिका का सम्पादन। 2011 में "सुख का सूरज", "धरा के रंग", "हँसता गाता बचपन" और "नन्हें सुमन" के नाम से मेरी चार पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। "सम्मान" अब तक दूसरों को ही सम्मानित करने में संलग्न हूँ। सम्प्रति इस वर्ष मुझे हिन्दी साहित्य निकेतन परिकल्पना के द्वारा 2010 के श्रेष्ठ उत्सवी गीतकार के रूप में हिन्दी दिवस नई दिल्ली में उत्तराखण्ड के माननीय मुख्यमन्त्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक द्वारा सम्मानित किया गया है▬ सम्प्रति-अप्रैल 2016 में मेरी दोहावली की दो पुस्तकें "खिली रूप की धूप" और "कदम-कदम पर घास" भी प्रकाशित हुई हैं। 2017 में मेरी दो पुस्तकें "ग़ज़लियात-ए-रूप" और बाबा नागार्जुन के संस्मरणों पर आधारित पुस्तक "स्मृति उपवन" भी प्रकाशित हो चुकीं हैं। -- मेरे बारे में अधिक जानकारी इस लिंक पर भी उपलब्ध है- http://taau.taau.in/2009/06/blog-post_04.html प्रति वर्ष 4 फरवरी को मेरा जन्म-दिन आता है