आखिरी कहानी (भाग 4/5)

अध्याय 4 – औघड़ बाबा

निरंजन का संकलन लगभग-लगभग पूरा हो गया था। उसे अपनी आखिरी कहानी की जितनी ही शिद्दत से तलाश थी, उतनी ही वह उससे दूर जा रही थी। काफी खोजने के बाद भी उसे कोई ऐसा सिरा नहीं मिल रहा था जिसे पकड़कर वह अपनी आखिरी कहानी तक पहुँच सके।

वह किसी भी हालत में रहा हो, चाहे वह मालती के नशे में था या हिरोइन के या औघड़ बाबा की चिलम के, मगर किसी भी नशे ने उसे कहानी लिखने के नशे से दूर नहीं किया। कहानी लिखने की धुन हमेशा उस पर सवार रहती थी। तभी तो उसका संकलन पूरा होने के कगार पर है। मगर अभी कगार पर ही है, पूरा कहाँ हुआ।

अब तो समय भी हाथों से निकला जा रहा है। कथामहोत्सव का समय भी नज़दीक आ रहा है। वह करे तो क्या करे? अभी तो आखिरी कहानी, जो कि सबसे धमाकेदार होनी ही चाहिए; बाकी है। उस कहानी को लिखने के अलावा पूरा संकलन छपवाने के लिए बहुत कम समय बचा है। तभी तो वह कथामहोत्सव में अपनी एंट्री भेज पाएगा।

अपनी कलम को खाली पन्ने पर पीट-पीटकर निरंजन यही सब सोच रहा था। वह अगली कहानी लिखे तो लिखे कैसे? अभी पिछली लिखी हुई कहानियाँ ही उसके दिमाग से नहीं निकल पा रही थीं। वे वीभत्स दृश्य उसके मस्तिष्क से निकल ही नहीं पा रहे तो नए विषय को मस्तिष्क में जगह कैसे मिले? लगता है अघोरियों के साथ बिताए पिछले कुछ महीने उसे सारी ज़िंदगी जीने नहीं देंगे। बदन को कोई मच्छर भी काटता है तो वह चौंककर ऐसे जाग जाता है जैसे कोई अघोरी उसके बदन में अपना नाखून धँसाकर उसकी चमड़ी चीर डालने की कोशिश कर रहा हो।

वह सब-कुछ उसी दिन शुरू हुआ था न, जिस दिन विपुल की चिता को अग्नि दी गई थी। रात के अँधकार में भी निरंजन उस श्मशानघाट से हिल नहीं पा रहा था कि कहीं से विपुल आ जाए। चिता में अंतिम जल रहे शोलों से कहीं वह प्रेत बनकर निकल आए। उसके शरीर के जल जाने के बाद वह नहीं रहा, ये तो सब जानते थे, इसीलिए सब लौट गए।

पर निरंजन उस सुनसान श्मशान से टस से मस नहीं हुआ। घर भी जाएगा तो क्या और यहाँ बैठा भी रहे तो क्या? रात कितनी बीत गई थी, उसे पता नहीं। श्मशान से बहुत दूर, खेतों के पार जो एक-दो घरों की बत्तियाँ जल भी रही थीं, अब बुझ चुकी थीं। शून्य में दूर तक केवल अँधेरा ही अँधेरा व्याप्त था। अंधकार में भी अगर कुछ दिख रहा था तो वो विपुल की चिता में बुझ रहे शोले थे। उन्हीं शोलों की रोशनी में निरंजन ने अचानक कुछ देखा।

भस्म में रमे, धूल-धूसरित से दो पैर शोलों के पास खड़े हैं और छड़ी से विपुल की राख उलट-पलट रहे हैं। निरंजन ने अँधेरे में आँखें गड़ाकर देखीं। कोई लंगोटी भर शरीर पर पहने, भस्म में लिपटा, बड़ी-बड़ी जटाओं और दाढ़ी वाला हड्डियों का ढाँचा जैसा आदमी विपुल की चिता में बड़ी तत्परता से कुछ खोज रहा था।

क्या खोज रहा है? कर क्या रहा है ये पगला घुप्प अँधेरे में?

निरंजन अभी यह सब सोच भर ही रहा था कि उस भस्मधारी की खोज व्यग्र हो उठी और वह पागलों की तरह अपनी छ्ड़ी चिता में घुमाने लगा। निरंजन को लगा जैसे वह छ्ड़ी उसके दिमाग में घुमा रहा हो। भला विपुल की चिता से छेड़-छाड़ करने की धृष्टता वह कैसे कर सकता है? विपुल की धूल तक को छूने की हिम्मत कैसे हुई इस भूतहा हड्डी के ढाँचे की?

निरंजन आग बबूला हो उसकी ओर लपका। निरंजन के करीब पहुँचने तक वह घिनौना आदमी घुटने के बल बैठ गया और दोनों हाथों ही से गर्म चिता में कुछ खोजने लगा। उसके करीब पहुँचने पर निरंजन की नाक भारी बदबू से भर गई और दुर्गंध से सिर घूम गया। जाने कितने दिन से यह पगला नहाया नहीं होगा?

“ऐ! क्या कर रहा है?”

निरंजन की आवाज़ में भरी घृणा और उपेक्षा पर ध्यान न देते हुए और अपना सिर उठाए बिना या निरंजन को देखे बिना ही वह यंत्रवत्‌ बोल उठा – ‘खोपड़ी, खोपड़ी, इसकी खोपड़ी कहाँ है? खोपड़ी?

निरंजन समझ गया कि यह कोई पागल है। इसके मुँह लगना बेकार है। अभी वह अपनी जगह वापस बैठने के लिए मुड़ा ही था कि वह विक्षिप्त चहक उठा। निरंजन ने चौंककर फिर पीछे देखा तो पाया कि वह विपुल की खोपड़ी लेकर खुशी से नाचने लगा और वहाँ से जाने लगा।

निरंजन को यह बर्दाश्त नहीं हुआ। उसकी आँखों में खून उतर आया। विपुल की खोपड़ी उसे ज़िंदा विपुल के सिर जैसी लगी जबकि उसमें न विपुल का चेहरा था, न आँखें, न माँस, न चमड़ी ही। जो बचा था वह केवल असंज्ञेय सा नर कंकाल का हिस्सा था। पर निरंजन के भीतर उस खोपड़ी से तुरंत अपनत्व की भावना उत्पन्न हुई।

उसने लपककर श्मशान के द्वार की ओर भागते उस भूत का रास्ता रोक लिया और उसके हाथों से खोपड़ी छीनने की कोशिश की।

लाल आँखें किए वह घिनौना आदमी भी क्रोध से बिलबिला उठा।

“हट जा छोकरे। मुझे साधना के लिए देर हो रही है।“

निरंजन का माथा ठनका।

“मैं यह नहीं ले जाने दूँगा। यह मेरा साथी है।“

“तेरा साथी नश्वर था। वह नष्ट हो गया। यह मेरे श्मशान साधना के लिए खोपड़ी है, खोपड़ी, और कुछ नहीं।“

निरंजन का ठनका हुआ माथा अब ‘अघोरी’ शब्द से गूँज उठा। यह कोई पागल नहीं है बल्कि कोई अघोरी है जो अपनी श्मशान साधना करने जा रहा है और विपुल की खोपड़ी लिए जा रहा है। अघोरियों के बारे में जो कुछ भी निरंजन जानता था, वह यादकर काँप उठा। लगभग गिड़गिड़ाते हुए बोला।

“और भी चिताएँ जलाई गई हैं यहाँ। किसी और की खोपड़ी ले लो। मेरे दोस्त को छोड़ दो।“

“ नहीं। नहीं ले सकता।“

“लेकिन क्यूँ?”

“वह जो श्मशान के उत्तर में चिता जल रही है। वह एक प्रसूति के दौरान मृत औरत की है।“

फिर उसने श्मशान के दूसरे कोने की ओर ऊँगली उठाकर कहा – “उधर जो राख ठंडी हुई पड़ी है, एक सत्तर साल के वृद्ध की है।“

उसे बीच में ही टोकते हुए निरंजन बोला।

“हाँ तो उस बूढ़े की ले लो। चाहिए तो मैं लाकर दे देता हूँ।“

इतना कहकर निरंजन उस ठंडी चिता की ओर बढ़ गया।

“नहीं। मुझे ब्रह्मचारी की खोपड़ी चाहिए। तेरा दोस्त तो ब्रह्मचारी था न?”

“वो तो बेचारा बच्चा था अभी।“

“तो हुआ न ब्रह्मचारी।“

निरंजन हक्का-बक्का रह गया। उस अघोरी को रोकने के लिए अब निरंजन के पास कोई तर्क नहीं बचा और न ही उसमें इतना साहस था कि उस घनघोर अघोरी से विपुल की खोपड़ी छीन सके।

अघोरी उसकी उपेक्षाकर आगे बढ़ गया। तभी श्मशान ‘राम नाम सत्य है’ की आवाज़ से गूँज उठा। निरंजन को आशा की किरण नज़र आई। उसने मन ही मन प्रार्थना की कि श्मशान में आनेवाला यह नया शव उसके काम का हो।

उसने उस भीड़ में घुसकर करीब जाकर देखा तो 14-15 साल के बालक का शव था। उसकी प्रार्थना स्वीकार हुई। उसने अघोरी को खोजा तो वह अभी अधिक दूर नहीं गया था। वह दौड़कर उस भागते भूत जैसे लग रहे अघोरी के पास जा पहुँचा।

“अभी-अभी जो बालक श्मशान में आया है उसकी खोपड़ी ले जाना। मेरे दोस्त को छोड़ दो।“

“इतना समय नहीं है मेरे पास। अभी तो बस खोपड़ी मिली है। अभी तो मुझे बहुत सी तैयारियाँ करनी बाकी हैं। अभी तो यज्ञ-हवन कुंड का सारा सामान जुटाना है मुझे। सिर्फ खोपड़ी के पीछे मैं अमावस की ये पूरी रात नहीं जाने दे सकता।“

इतना कहकर अघोरी फिर आगे बढ़ गया। निरंजन सोच में पड़ गया। करे तो क्या करे? श्मशान में नया शव भी मौजूद है और उसकी खोपड़ी से विपुल को बचाया जा सकता है। कुछ सोचकर वह फिर अघोरी के रास्ते में जाकर खड़ा हो गया।

“आप अपने यज्ञ की तैयारी कीजिए। मैं यहाँ श्मशान में उस नए शव के जलने का इंतजार करूँगा और जैसे ही खोपड़ी मिलेगी, आपके पास ले आऊँगा।“

अघोरी ने शंकालु दृष्टि निरंजन पर डाली।

“अगर अगले दो पहर के भीतर तूने मुझे खोपड़ी लाकर नहीं दी तो मैं मंत्र पढ़कर तेरी खोपड़ी के एक सहस्र टुकड़े कर दूँगा। स्मरण रहे, ब्रह्मचारी खोपड़ी। तभी तू अपने दोस्त की खोपड़ी मुझसे ले जा पाएगा।“

निरंजन अभी श्मशान की ओर मुड़ा ही था कि अघोरी फिर गरजा।

“श्मशान के पीछे वाले जंगल में एक मील भीतर की ओर, कच्चे रास्ते के सहारे तालाब तक चले आना। वहीं एक बरगद के नीचे मैं साधना करता मिलूँगा।“

अघोरी की आज्ञा शिरोधार्य कर निरंजन वापस श्मशान के भीतर पहुँच गया। वह विपुल की राख के पास वापस जाकर बैठ गया और वहीं बैठकर दूर चल रहे क्रिया-कर्म को देखने लगा।

कुछ घंटों के ही अंतराल पर लोग वहाँ जलती चिता छोड़कर जा चुके थे। कोई खास रोना-धोना भी नहीं हुआ। शायद उस शव का कोई खास-संबंधी वहाँ नहीं था। क्या किसी अनाथ बच्चे का शव था वह?

जो भी हो, निरंजन के हरकत में आने का समय आ गया था। कुछ घंटे पहले जैसे वह अघोरी विपुल की खोपड़ी खोज रहा था वैसे ही अब निरंजन ने खोजबीन शुरु कर दी। चिता में अभी भी आग बहुत थी। मगर लकड़ी की दो एक टहनियाँ जला लेने के बाद निरंजन सफल हुआ।

उस गरम खोपड़ी को टहनी से बाँधकर और अपनेआप को जलने से बचाते हुए वह जंगल में घुस पड़ा। अच्छा है कि मोबाइल में बैटरी बची है नहीं तो रात के इस घने अंधकार में रास्ता ढूँढ़ना कितना मुश्किल हो जाता। जाने वो अघोरी इस रास्ते पर कैसे गया होगा। कैसे भी गया हो? उसे तो बस विपुल की खोपड़ी छुड़ा लानी है और काम खत्म करना है।

जैसे-जैसे जंगल घना होता जा रहा था विपुल को संदेह होने लगा कि कहीं वह अघोरी उसे बेवकूफ बनाकर तो नहीं चला गया। वैसे तो भूत-प्रेत, जादू-टोने में वह विश्वास नहीं करता था। मगर…मगर समझ नहीं आता कि अघोर पंथ के करिश्मों पर विश्वास करे या नहीं करे। वैसे तो करिश्मे होते नहीं हैं। मगर ….अगर होते हों तो? ये दिखने में भी तो इतने भयानक हैं कि अनायास ही भय व्याप्त हो जाता है कि कुछ न कुछ पराशक्ति तो इनके पास ज़रूर है जिसके बल पर सारे समाज को भयभीत करके रखते हैं।

कच्चे रास्ते से होते हुए वह करीब एक मील भीतर तक जा पहुँचा। उसे लगा वह दो मील चला आया है और उसे गुमराह कर दिया गया है। उसने घने जंगल में चारों ओर नज़रें गड़ाकर देखा और हताश होकर लौटना चाहा। तभी उसे पेड़ों के घने झुरमुट में से दूर कुछ जलता हुआ सा दीख पड़ा। उसी का करीब आधे मील तक पीछा करते हुए वह तालाब के किनारे पहुँच गया।

देखा तो तालाब के एक ओर बरगद के नीचे वही अघोरी हवनकुंड जलाए बैठा है। हवनकुंड के आस-पास दो-चार और लोग बैठे और खड़े थे। निरंजन को उन अजनबियों के बीच जाने में थोड़ी हिचक तो हुई मगर विपुल के लिए वह उनके बीच जा पहुँचा।

वहाँ जाकर देखा तो दंग रह गया। हवन कुंड के एक ओर तो अघोरी था मगर उसके बाईं ओर बैठे शख्स को निरंजन अच्छी तरह पहचानता था। हवन कुंड से उठ रही लपटों में उस व्यक्ति का तेजोमय चेहरा दप-दप चमक रहा था।

जब निरंजन खोपड़ी लिए करीब आया तो वह व्यक्ति अचंभित हुआ। वह नहीं चाहता था कि उसकी इस गुप्त साधना का किसी को पता चले। मगर निरंजन के हाथ में खोपड़ी देख वह समझा कि यह अघोरी का कोई आदमी है और यज्ञ में तल्लीन हो गया।

वैसे तो निरंजन जल्द से जल्द विपुल की खोपड़ी लेकर वहाँ से चले जाना चाहता था। मगर शहर के प्रतिष्ठित राजनेता और उसके चेले-चपाटों को वहाँ देखकर निरंजन की भी इस कर्म-कांड में रुचि बढ़ गई। चाहता तो था कि चुपके-चुपके वीडियो बना ले। मगर फोन में इतनी बैटरी नहीं थी। और कुछ बैटरी तो वापस लौटने के लिए भी चाहिए थी। उसने उस तिलकधारी यजमान को बड़ी दिलचस्पी के साथ देखा।

अच्छा! तो इस धीर-गंभीर राजनेता की अपार प्रसिद्धि और सफलता के पीछे इस तरह के कर्म-कांड हैं। बड़े-बड़े लोग और व्यापारी इस आदमी के आगे सिर नवाते हैं।इस जैसा सुलझा और शालीन व्यक्तित्व वाला जाना-माना व्यक्ति अगर इन बातों पर विश्वास करता है तो ज़रूर अघोरी में कोई जादू होगा ज़रूर।

निरंजन, जिसे विपुल की खोपड़ी मिल जाने के बाद वहाँ से चले जाना चाहिए था, वहीं चिपककर बैठ गया और उत्सुकता से सारी प्रक्रिया देखने लगा। उस राजनेता को भी निरंजन का इस तरह ताकते रहना अजीब लगा। मगर वह बर्दाश्त करता रहा।

लगातार मंत्रोच्चार के दौरान कई घंटे तक चली पूजा के अंत में अघोरी ने अपने त्रिशूल से बँधे मेमने को खोल दिया और तिलक-माला करने के बाद उसे उस राजनेता के हट्टे-कट्टे, दाढ़ी-मूँछ वाले भीमकाय बंदे को सौंप दिया। और उसने तुरंत एक गँडासे से खटाक कर उसकी गर्दन अलग कर दी। इसी बीच अघोरी ने एक खोपड़ी के ऊपर कटी हुई गर्दन लगाकर उसका रक्त खोपड़ी में इकठ्ठा करना शुरु कर दिया। यह वही खोपड़ी थी जो निरंजन श्मशान से लाया था।

अघोरी ने उसमें से कुछ रक्त हवन कुंड मे छिड़कते हुए, उन्हीं खूनी उँगलियों से राजनेता का तिलक किया और खोपड़ी उसे सौंपते हुए घोर गर्जन किया और राजनेता को आदेश दिया।

“जा इस खोपड़ी को रक्त सहित अपने घर के आँगन में गाड़ दे। तेरी मनोकामना पूर्ण होगी।“

राजनेता और चेले-चपाटे सब अघोरी को प्रणाम करते हुए ‘औघड़ बाबा की जय’ बोलते हुए चले गए। परंतु निरंजन वहीं बैठा रहा। अघोरी भी शायद निरंजन की दिलचस्पी देख अचंभित हुआ। सारे नीले-काले-पीले दाँत बाहर निकाल अघोरी ने आखिर निरंजन से पूछ ही लिया।

“क्या देखता है रे पगले?”

निरंजन जैसे अपनी घोर तंद्रा से बाहर निकला हो।

“अं..अय… वो…. क्या इस श्मशान साधना से सचमुच कार्य सिद्ध होते हैं?”

अघोरी अट्टहास करने लगा।

“ह हा हा हा, दुष्कर से दुष्कर कार्य भी।“

“लेकिन यह तो कोई श्मशान नहीं। फिर श्मशान साधना कैसी?”

“दो सौ साल पहले इसी जंगल में एक भयंकर युद्ध हुआ था। यहाँ के राजा के सिपाहियों और अंग्रेज़ों में घमासान छापामार युद्ध हुआ। दोनों ओर के जितने आदमी यहाँ बिना क्रिया-कर्म के दफन हैं उतने तो पिछले दो सौ साल में शहर के श्मशान में भी नहीं जलाए गए होंगे। यहाँ कई फिरंगियों की तड़पती आत्माएं घूम रही हैं जो अपने देश जाने को बेचैन हैं।“

कुछ देर के लिए अघोरी खो सा गया। फिर उसी तंद्रा के भीतर ही भीतर कुटिल मुस्कान लेते हुए बोला।

“बड़ा मज़ा आता है उन्हें सोते से जगाने में और फिर रोते हुए देखने में।“

कहकर अघोरी फिर खो गया।

निरंजन फटी आँखों से उसे देखता ही रहा।

वर्तमान में वापस लौटते हुए अघोरी ने निरंजन को कुरेदते हुए पूछा।

“तेरी क्या अभिलाषा है, जिसे पूरी करने को तड़प रहा है?”

निरंजन ने मन ही मन सोचा कि इच्छाएँ तो बहुत सारी हैं। लगभग अथाह। लेकिन इस बाबा को कौन सी वाली बताएँ?

उधेड़बुन में ही था कि उसके मन में उस राजनेता का चेहरा दमक उठा और वह अनियंत्रित तरीके से बोल गया।

“प्रसिद्धि हासिल करना चाहता हूँ….लेखक के रूप में।“

अघोरी फिर अट्टहास करने लगा और जंगल की ओर मुड़ गया। कोई उत्तर न पाकर निरंजन किंकर्तव्यविमूढ़ सा बस उसे जाते हुए देखता रहा। मगर कुछ दूर जाके अघोरी बिना मुड़े, जंगल की ओर जाते हुए ही बोला।

“कल श्मशान में प्रतीक्षा करना। अपने दोस्त की खोपड़ी के साथ।

घनघोर अँधेरे में, हल्की ठंड पसरी थी और श्मशान में आज एक भी चिता नहीं जल रही थी। कोई नहीं था। क्यूँ होगा भला कोई श्मशान में? मगर निरंजन था, विपुल की खोपड़ी लेकर चुपचाप बैठा था, घने अंधकार में आँखें गड़ाए।

रात से भी ज्यादा काली एक मूरत उभरी और निरंजन प्रणाम कर एक ओर खड़ा हो गया। जबकि अघोरी एक पत्थर पर टिककर बैठ गया और एक पाँव दूसरे घुटने पर चढ़ाकर हुँकारने लगा।

“यदि कुछ पाना है तो सब कुछ खोने के लिए तैयार रहना पड़ेगा। किसी एक चीज़ के लिए बाकी सब चीज़ें त्याग देनी होंगी। हम अघोरियों को देखो। ईश्वर में लीन होने के लिए सब कर्मकांडों को त्याग देते हैं। हर मोह-माया से मुख मोड़ लेते हैं। इतने विरक्त हो जाते हैं कि अन्न और मल में अंतर ही नहीं रखते।“

निरंजन की ओर लाल आँखें कर अघोरी ने पूछा।

“कर सकोगे?”

“अं…हाँ….कोशिश ….तो ….”

“तो चल! एक पाँव पर खड़ा हो जा अपने दोस्त की खोपड़ी पर।“

निरंजन एकदम काँप उठा।

“नहीं, नहीं यह तो मेरा दोस्त …”

“अभी-अभी क्या कहा मैंने? त्याग दे मोह-माया। भूल जा सब रिश्ते नाते। साधना करना इतना आसान थोड़े न है। सिद्धि और प्रसिद्धि इतनी आसानी से थोड़े न मिलती है। चल हो जा खड़ा।“

निरंजन अभी भी ‘ना-ना’ में सिर हिला रहा था।

अघोरी गरजा।

“देख इधर।“

निरंजन ने अघोरी की लाल-लाल फटी आँखें देखीं और डर से नज़र घुमा लिया।

“इधर देख मूर्ख।“

निरंजन ने घबराकर फिर अघोरी को देखा। इस बार अघोरी ने आँखों से ही निरंजन को बाँध लिया। उसका शरीर चाहकर भी बगावत नहीं कर पा रहा था। उसकी चेतना जागृत थी मगर वह अपनी इच्छा से उँगली तक नहीं हिला पा रहा था। सब समझ रहा था, सब जान रहा था, मगर…

“जा खड़ा हो जा।“

निरंजन जमीन पर रखी खोपड़ी पर खड़ा हो गया। एक पैर दूसरे घुटने पर चढ़ाकर, दोनों हाथ सर के ऊपर जोड़ लिए और इस प्रकार खोपड़ी पर ही वृक्षासन में खड़ा हो गया।

“मेरे पीछे-पीछे मंत्र का उच्चारण कर ….. अघोर ऋषि: त्रिष्टुप छंद: अघोर रुद्रो देवता। ऊँ हीं स्फुर स्फुरहृदयाय नम: …..”

न चाहते हुए भी वह अघोरी द्वारा उच्चरित मंत्र को रटने लगा। कुछ समय बाद अघोरी ने मंत्रोच्चार बंद कर दिया लेकिन अब तक मंत्र निरंजन के सिर माथे चढ़ चुका था और वह स्वत: उच्चारण करने लगा। उसका उद्वेलित मन एकदम शांत हो चुका था और आँखें बोझिल होकर बंद हो चुकी थीं।

जाने कब तक निरंजन उसी अवस्था में मंत्रोच्चार करता रहा और जब उसके शरीर ने स्वत: हाथ और पैर ढीले कर दिए तो वह खोपड़ी से नीचे उतर आया। उसने आँखें मलकर इधर-उधर देखा।

पौ फट चुकी थी और श्मशान में कौवों और चिड़ियों की चहचहाहट सुनाई पड़ रही थी। अजीब बात है कि अब तक क्यों नहीं सुनाई दी। उसने आँखें घूमाकर चारों ओर देखा। अघोरी बाबा गायब थे। कहीं नहीं थे। उसका शरीर थकान से टूट रहा था। वह घर जाकर सो गया।

अब निरंजन अपने वश में ही नहीं रहने लगा। जब-तब बेचैन सा होकर श्मशान पहुँच जाया करता था। इतनी बेचैनी और आतुरता तो उसे मालती के पास जाने में भी महसूस नहीं होती थी। मालती तो सिर्फ उसका माल उड़ाती थी। अघोरी ने तो उसकी आत्मा ही उड़ा ली। उससे जब-तब उल्टे-सीधे काम करवाने लगा।

उसे धीरे-धीरे गाँजे का नशा होने लगता तो आहार के रूप में उसे क्या-क्या अप्राकृतिक चीज़ें न खिलाईं। सड़े गले इंसानी शव से लेकर मल-मूत्र-मिट्टी तक। एक सीमा के बाद निरंजन के लिए कुछ भी असहज नहीं रहा।

एक दिन तो हद कर दी। शव पर बिठाकर पूजा तक करवाई। मगर अब निरंजन को डर या अस्वाभाविक सा कुछ भी नहीं लगता था। अब निरंजन काफी हद तक अपने को उस अघोरी के वश से मुक्त महसूस करता था। उस बेढब जीवन में ढल चुका था और वाममार्ग के रहस्यों को समझने की कोशिश में लग गया था।

मगर यह अंत नहीं था। एक दिन अघोरी किसी नाले से एक लड़की की लाश घसीट लाया था और चाहता था कि निरंजन उससे सहवास करे। पहले का कोई समय होता तो निरंजन उस आधी सड़ चुकी लाश की बदबू से ही घृणा से भर उठता। मगर अब तक सड़ी लाशों को वह खाने का काम भी कर चुका था। उसकी घृणा सब चीज़ों से खत्म हो चुकी थी।

मगर सामाजिक नैतिकता अभी भी कहीं बाकी थी। इस अघोर के साथ रहते हुए समाज के नियम उसने तोड़ दिए थे और अघोर पंथ की सरलता-सहजता को मानने भी लगा था।

मगर आज उसने विरोध किया।

“इसके साथ मैं यह अन्याय नहीं कर सकता। यह गलत है। यह घृणित है। मैं बहुत बुरा हूँ और मैंने बहुत से लोगों के साथ बुराई की है। मगर किसी की इच्छा के बगैर किसी को हाथ नहीं लगाया है। बुरा हूँ, मगर इतना भी बुरा नहीं हूँ। इतना भी घृणित कार्य नहीं कर सकता।“

अघोरी अट्टहास करने लगा और करता रहा। फिर धीर-गंभीर होकर ऐसा बोला, ऐसा बोला कि निरंजन के दिमाग में उसके कहे शब्द कई दिनों तक गूँजते रहे।

“घृणित!!! घृणित तो तुम लोग हो जो इंसान को जीते जी कोई सम्मान नहीं देते और मरने के बाद उस मृत शरीर के लिए लाखों कर्म-कांड करते हो। अरे इसका थोड़ा भी अगर जीते जी करो तो उस जीवित इंसान को कोई फर्क भी पड़े…..जीते जी उसे भले खाने को न दो मगर मरने के बाद उसके नाम पर भोज करो। …….वाह!! ये घृणित नहीं है। जीवित इंसान के लिए कुछ मत करो मगर मरे हुए के लिए सब कुछ करो। ……तुम लोग जिंदा इंसान के गुर्दे निकालकर बेच देते हो। चंद पैसों के लिए। जबकि उसको कितनी ज़रूरत है उसकी। और हम अगर मरे हुए का भी गुर्दा ले लें तो घृणित है। वाह रे तुम्हारी दुनिया और वाह रे तुम दुनियावाले।….चंद पैसों के लिए अपने आप को दूसरों का नौकर बना देते हो, अपने पर पूरा अधिकार दे देते हो, कुछ भी करने के लिए तैयार हो जाते हो, कितना भी गिर जाते हो। हम तुम्हारे मृत शरीर पर अधिकार कर लें तो घृणित है। ….घर की औरतों को भेड़-बकरी की तरह बाँधकर रखते हो और गाय को माँ कहते हो। यह घृणित नहीं है……और यह लड़की…..”

गंभीरतापूर्वक कहे इन शब्दों के बाद अघोरी फिर अट्टहास करने लगा और देर तक अट्टहास करने के बाद ही आगे बोल पाया।

“और यह लड़की….इसके बारे में क्या जानते हो। इसके मृत शरीर से घृणा हो रही है? जीते जी जो इसके साथ पाँच-पाँच दरिंदों ने किया वो घृणित नहीं था। उसके बाद मारकर नाले में फेंक दिया। कतई घृणित नहीं था। और तुम बात करते हो घृणा की…..ह हा हा…..घृणा…..टट्टी-पेशाब, लाश से घृणा……ह हा हा……मगर कुकर्मों से घृणा नहीं…… ह हा हा….”

निरंजन को लगा जैसे किसी ने उसके सामने एक दूसरी ही दुनिया का दरवाज़ा खोल दिया। अब तक जो दुनिया वह देख रहा था वह कोई और ही थी और अब जो अपने गुरु की दृष्टि से देख रहा था वह सही, सच्ची, स्पष्ट दुनिया थी। किसी ने उसकी आँखें उघाड़ दीं और जैसे ज्ञानचक्षु खुलने जैसा आभास कराया हो।

उस क्षण से निरंजन उस अघोर का अनन्य भक्त हो गया। अघोर ने भी उसे अपना शिष्य स्वीकार कर लिया।

और कुछ दिन दीक्षा देने के बाद एक दिन अघोरी ने कहा कि आगे की साधना के लिए तारापीठ जाना होगा। वहीं साधना का प्रभाव अधिक होगा और सही से होगा। यहाँ अब मन नहीं लगता।

निरंजन ने सोचा भी नहीं था कि तारापीठ जाकर इतनी मुश्किल से जमी जमाई अघोरपंथी जीवन की शृंखला से उसका नाता टूट जाएगा।

वहाँ पहुँचकर निरंजन ने देखा कि अन्य स्थानों के विपरीत यहाँ श्मशान घनी आबादी के बीचोंबीच और मंदिर के निकट ही है। जबकि आज तक के सारे श्मशान इंसानी बस्तियों से दूर ही बनाए गए थे।

इस श्मशान में तरह-तरह के अघोरियों को तरह-तरह की साधना में लीन देख निरंजन एकटक ताकता रहा। गुरु तो और भी बच्चे हो गए थे। धीर गंभीर रहने वाले उसके गुरु ऐसे उछल-कूद कर रहे थे जैसे कोई बच्चा स्कूल से घर लौटकर करता है। भस्म में उन्हें लोटते देख तो निरंजन को हँसी ही आ गई।

लेकिन फिर अचानक वे एक ओर चल पड़े। निरंजन भी पीछे-पीछे चल दिया। एक चट्टान के पास पहुँचकर गुरु पीछे मुड़े और निरंजन को अपनी स्थिति समझाई।

“मैं चाहता तो था कि तुम्हें पूरा अघोरी बनाकर छोडूँ। मगर क्या करूँ? विवश हूँ। अभी-अभी मेरे गुरु ने मेरी अंतरात्मा को आदेश दिया है कि मैं समाधि में लीन हो जाऊँ और उनसे साक्षात्कार करूँ। हो सकता है निरंजन कि इस समाधि में लीन होने के बाद मैं फिर संसार में वापस न आऊँ। देह भी त्याग दूँ। इसलिए अब तुम वापस चले जाओ। हमारा साथ बस यहीं तक का था।“

अपने अघोरी जीवन में अचानक आए इस परिवर्तन से निरंजन हक्का-बक्का रह गया।

“यह कैसे संभव है? मैं आपके बिना क्या करूँगा? कैसे रहूँगा?”

“सब संभव है निरंजन। तुम्हें तो अभी प्रसिद्धि हासिल करनी है। और फिर, सोचता हूँ कि मैं भी तुम्हारे बिना कैसे रहूँगा? इसलिए दूसरी दुनिया में जाने के बाद अगर ज़रूरत हुई तो तुम्हें भी वहीं बुला लूँगा।“

“मुझे प्रतीक्षा रहेगी।“

निरंजन गुरु के चरणों में गिर पड़ा। मगर गुरु तो चट्टानों पर चढ़ते चले गए और एक ऊँची चट्टान में बनी गुफा में गायब हो गए।

अब निरंजन क्या करता अकेला? वह अपने शहर लौट आया। पहले तो उसका कहीं भी मन नहीं लगा। वह अपने गुरु को लगातार याद करता रहा। फिर उसे गुरु की कही बात याद आई – ‘तुम्हें तो अभी प्रसिद्धि हासिल करनी है’। साथ ही याद आया वह अधूरा संग्रह जो उसे पूरा करना था। अब तो वह ऐसी-ऐसी अद्‌भुत कहानियाँ लिखने में सक्षम था जिसे कोई नहीं लिख सकता था। उसने उन कहानियों को नाम दिया ‘जलती धूनी’।

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परिचय - नीतू सिंह

नाम नीतू सिंह ‘रेणुका’ जन्मतिथि 30 जून 1984 साहित्यिक उपलब्धि विश्व हिन्दी सचिवालय, मारिशस द्वारा आयोजित अंतरराष्ट्रीय हिन्दी कविता प्रतियोगिता 2011 में प्रथम पुरस्कार। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेख, कहानी, कविता इत्यादि का प्रकाशन। प्रकाशित रचनाएं ‘मेरा गगन’ नामक काव्य संग्रह (प्रकाशन वर्ष -2013) ‘समुद्र की रेत’ नामक कहानी संग्रह (प्रकाशन वर्ष - 2016), 'मन का मनका फेर' नामक कहानी संग्रह (प्रकाशन वर्ष - 2017) एवं 'क्योंकि मैं औरत हूँ?' नामक काव्य संग्रह प्रकाशनाधीन। रूचि लिखना और पढ़ना ई-मेल n30061984@gmail.com