कारगिल विजय दिवस की बेला

आज विजय दिवस की बेला है,
हम इसकी खुशी मनाएंगे,
इससे पहले हम फिर खुद में,
कुछ साहस और जुटाएंगे.

कारगिल के युद्ध में सबसे पहले,
चरवाहा बना था सेनानी,
उसने ही सेना को सूचना दी थी,
संभलो, दुश्मन ने युद्ध की ठानी.

कारगिल में भले ही दुश्मन ने,
घुटने टेके और हार गया,
पर आज भी नव-नव मोर्चों पर,
वह हमको रोज सता ही रहा.

फन सांप का जब तक कुचले नहीं,
वह बार-बार भय देता है,
दुश्मन भी ऐसा होता है,
वह सतत धमकियां देता है.

सोचो तो पाक क्यों हारा था?
थी कमी एकता की उसमें,
हम जीते थे यह युद्ध तभी,
हो गए एक थे पल भर में.

हम आज भी यह संकल्प करें,
नहीं कमी एकता की होगी,
अंदर-बाहर के दुश्मन जब,
हारेंगे तब ही विजय होगी.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।