वही लालिमा

सूर्य 
अखिल विश्व को
प्रकाश का
अनंत उपहार देते हुए
गर्माहट का
सुखद अहसास देते हुए
अपने 
चिर गांभीर्य को
चिरस्थायी रखता है.

प्रातःकाल 
उदयाचल से आते हुए
वह अपनी
सुरम्य लालिमा बिखराते हुए 
प्रकट होता है
जिसे हम 
मुस्कुराहट की संज्ञा से
विभूषित करते हैं.

पुनः
सायंकाल
वही लालिमा छितराते हुए
अस्तांचल की ओर
पदार्पण करता है
जो हमें 
उदासी से पूर्ण
प्रतीत होती है.

पर
सूर्य निर्लिप्त है
अपने वंशज
वाल्मिकि-तुलसी के राम की तरह
जिसे 
न राज्याभिषेक के समाचार से
हर्ष हुआ
न ही वनवास की आज्ञा से
तनिक भी विषाद
उसके लिए 
प्रातः-सायं की लालिमा
एक-सी ही है
हर्ष-विषाद से रहित लालिमा
केवल लालिमा
वही लालिमा.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।